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छत्तीसगढ़ छोड़ सभी चार चुनावी राज्यों में महिला विधायकों की सीटों में आई गिरावट

राजनीतिक पार्टियों में एक धारणा है कि महिलाएं पुरुषों की तरह मजबूती से चुनाव नहीं लड़ सकतीं और इसलिए पार्टियां स्वतंत्र महिला उम्मीदवारों को टिकट देने से कतराती हैं

Updated On: Dec 27, 2018 08:25 AM IST

Nitesh Ojha

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छत्तीसगढ़ छोड़ सभी चार चुनावी राज्यों में महिला विधायकों की सीटों में आई गिरावट

हाल ही में जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं उनमें छत्तीसगढ़ को सबसे पिछड़ा राज्य माना जा रहा है. लेकिन महिलाओं के लिहाज से देखा जाए तो ये बाकी के चार राज्य (मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना) से कई मायनों में बेहतर है. इन पांचों राज्यों में से सिर्फ एक छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी राज्यों में महिला उम्मीदवारों की संख्या में गिरावट हुई है.

महिलाओं के रोजगार से संबंधित मानकों पर काफी अच्छे स्थान पर रहने वाले छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में 13 महिला उम्मीदवारों की जीत हुई है. इस बार साल 2013 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में महिला उम्मीदवारों ने तीन अतिरिक्त सीटों पर जीत हासिल की है. पिछली बार सिर्फ 10 महिला उम्मीदवार ही विधानसभा पहुंची थीं.

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के साथ मध्य प्रदेश, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना में भी विधानसभा चुनाव हुए थे. इन चारों राज्यों में पिछली बार की तुलना इस बार कम महिला उम्मीदवार निर्वाचित हो सकीं. इंडिया स्पेंड के आंकड़ों के मुताबिक पांच राज्यों में कुल 8,249 उम्मीदवारों में से 696 (8.4 प्रतिशत) महिलाएं थीं. इनमें से सिर्फ 62 (9.1 प्रतिशत) ही विधायक बनीं.

पिछड़ा होने के बाद भी कई मायनों में आगे है छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ को नीती आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने अप्रैल 2018 में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में एक संबोधन के दौरान 'पिछड़ा' राज्य बताया था. हालांकि, यह राज्य देश में महिलाओं के रोजगार संकेतकों जैसे कि श्रमिक-जनसंख्या अनुपात (worker-population ratio) के मामले में देश में टॉप पर है. जो प्रति 1,000 व्यक्तियों में से नौकरी मिलने वालों की संख्या दर्शाता है. साथ ही यह भारत का पहला राज्य है जहां चुनाव आयोग ने पांच महिला-मतदान केंद्रों की स्थापना की. जिन्हें संगवारी भी कहते हैं.

मिजोरम विधानसभा में इस बार कोई महिला विधायक नहीं

मिजोरम की साक्षरता दर 89.27 प्रतिशत है. जो कि, साक्षरता की राष्ट्रीय औसत 74.4 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है. महिलाओं के रोजगार और प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो यह पांच चुनावी राज्यों में दूसरे स्थान पर है. यहां डब्लूपीआर (श्रमिक-जनसंख्या अनुपात) 52.2 प्रतिशत है. वहीं प्रति व्यक्ति आय 1,28,998 रुपए है. पांचों राज्यों में से अगर तुलना की जाए तो मिजोरम कई मायनों में आगे रहेगा. लेकिन विधानसभा चुनावों में इस राज्य से एक भी महिला विधायक नहीं बन सकी.

इस राज्य में पुरुषों की तुलना में 19,399 महिलाएं ज्यादा हैं. लेकिन इसके बाद भी पिछले 31 वर्षों में केवल दो महिला ही राज्य में मंत्री पद तक पहुच पाई हैं. 1987 में लालह्लीमपुई हमर और 2014 में लालवमपुई सी ही मंत्री बन सकीं. यहां ध्यान देने वाली बात ये भी है कि घरेलू फैसलों में स्वायत्तता जैसे महिला सशक्तीकरण संकेतकों पर मिजोरम पांच राज्यों में सबसे ज्यादा 96 प्रतिशत स्कोर करता है.

मध्य प्रदेश में पिछली बार 29 तो इस बार सिर्फ 21 महिला विधायक

साल 2013 में मध्य प्रदेश में महिला विधायकों की संख्या 29 थी जो की इस बार घटकर 21 रह गई. मध्य प्रदेश महिलाओं को रोजगार देने और महिला सशक्तिकरण के मामले (जैसे संपत्ति का स्वामित्व आदि) में सबसे पीछे है. मध्य प्रदेश का डब्ल्यूपीआर 15.9 प्रतिशत है. पांच राज्यों में से मध्य प्रदेश में ही सबसे कम प्रति व्यक्ति आय 74,590 रुपए है.

महिला आबादी को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश में महिलाओं के लिए एक अलग घोषणा पत्र तक जारी किया था. 'नारी शक्ति संकल्प पत्र' के तहत बीजेपी ने मेधावी छात्राओं को अन्य चीजों के अलावा ऑटो-गियर बाइक देने का वादा किया था.

क्षेत्रफल में बड़ा लेकिन महिला अधिकारों के मामले में छोटा है राजस्थान

राजस्थान में 2013 में 27 महिला विधायक निर्वाचित हुई थीं. हालांकि साल 2018 में महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे द्वारा शासित होने के बावजूद भी इस बार महिला विधायकों की संख्या में गिरावट हुई है. इस बार सिर्फ 23 महिलाएं ही विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो सकीं.

राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या में भी काफी गिरावट दर्ज की गई है. राज्य में साल 2013 के विधानसभा चुनावों में 75 फीसदी महिलाओं ने मतदान किया था. जबकि इस बार सिर्फ 73.23 फीसदी महिलाओं ने ही अपने मत का प्रयोग किया

राजस्थान में पांच राज्यों की तुलना में सबसे कम महिला साक्षरता दर 56.5 प्रतिशत है. 10 से11 वर्ष की शिक्षा पूरी करने वाली महिलाओं की सूची में तो यह राज्य अंतिम स्थान पर है. महिलाओं को रोजगार देने के मामले में भी राजस्थान काफी पीछे है. राज्य का डब्ल्यूपीआर तो 8.8 प्रतीशत है.

सबसे युवा राज्य तेलंगाना में भी महिला विधायकों कि संख्या में गिरावट

तेलंगाना भारत का सबसे युवा राज्य है, जिसमें अब तक केवल दो बार ही विधानसभा के चुनाव हुए हैं. हालांकि इसमें भी महिला विधायकों की संख्या में कमी दर्ज की गई है. राज्य की 119 विधानसभाओं में से सिर्फ छह पर ही महिला उम्मीदवारों को जीत मिल सकी है. जबकि पिछले विधानसभा चुनावों में यहां 9 महिलाएं विधानसभा पहुंची थीं.

प्रभावशाली साबित हुई विरासतें

पांच राज्यों के इन विधानसभा चुनावों में विरासतों ने काफी अहम भूमिका निभाई है. विरासत की सीटें वे हैं जो लंबे समय से एक ही राजनीतिक परिवार के सदस्यों या राजनीतिक कनेक्शन वाले उम्मीदवारों के कब्जे में रह हों. 7 दिसंबर 2018 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 67 उम्मीदवार ऐसे थे जिन्हें विरासत में उम्मीदवारी मिली. इनमें से 35 (52 प्रतिशत) ने जीत भी हासिल की.

मध्य प्रदेश में 36 विरासत से संबंधित सीटें थीं और नौ पर महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा. 2018 में चुने गए 21 विधायकों में से सात निर्वाचित महिलाएं विरासत से संबंध रखने वाली उम्मीदवार थीं. राजस्थान में छह महिला उम्मीदवारों ने 23 विरासत वाली सीटों पर चुनाव लड़ा था. जीतने वाले सभी छह महिलाएं मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि से थीं. छत्तीसगढ़ में निर्वाचित 13 महिला विधायकों में से पांच महिलाएं विरासत से ताल्लुक रखने वाली उम्मीदवार थीं.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के राजनीतिक विश्लेषक प्रवीण राय ने इंडिया स्पेंड को बताया, 'राजनीतिक पार्टियों में एक धारणा है कि महिलाएं पुरुषों की तरह मजबूती से चुनाव नहीं लड़ सकतीं और इसलिए पार्टियां स्वतंत्र महिला उम्मीदवारों को टिकट देने से कतराती हैं.' जिन महिलाओं ने लंबे समय तक पार्टी में सेवा की है या जिनके पास अपना समर्थन का आधार है. उन्हें ही टिकट दिया जाता है.

आरक्षण से मिलेगी मदद

विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों के लिए महिला उम्मीदवारों के लिए अलग सीटें निर्धारित करने का कोई नियम नहीं है. जैसा कि पंचायत स्तर पर होता है, जहां कम से कम 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं. गौरतलब है कि पार्टियां पुरुष उम्मीदवारों की पक्षपाती होती हैं.

पंचायत चुनावों के परिणामों पर हुए अध्ययन से पता चलता है कि उस स्तर पर कोटा के कारण चुनाव लड़ने वाली महिलाएं राज्य विधानसभाओं और संसद में उच्च स्तर के पदों के लिए सक्षम हो जाती हैं. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के निदेशक संजय कुमार बताते हैं, 'राजनीतिक दलों के लिए एक निश्चित संख्या में महिला उम्मीदवारों को टिकट देने को अनिवार्य करना चाहिए.

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