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डोकलाम से ग्राउंड रिपोर्ट-3: सीमा पर कायम तनाव की कहानी एक रिपोर्टर की जुबानी

सैनिकों में से एक ने कहा कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी की सप्लाई लाइन बेहतर है.

Manoj Kumar Updated On: Aug 12, 2017 09:31 AM IST

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डोकलाम से ग्राउंड रिपोर्ट-3: सीमा पर कायम तनाव की कहानी एक रिपोर्टर की जुबानी

(संपादकीय नोट: भारत और चीन के बीच जारी तनातनी की घट-बढ़ के बीच डोकलाम के जमीनी हालात का जायजा लेती ऋंखला की यह तीसरी और अंतिम रिपोर्ट है)

मन में इच्छा थी सो उसके पूरे होने की राह भी निकल आई. आखिर मैं एक पत्रकार हूं और भारत-चीन के बीच भूटान के सीमा-क्षेत्र को लेकर चल रहे विवाद की बातें व्हाट्सऐप पर हर तरफ पसरी हुई हैं. मैं भी इन खबरों में खोया हुआ था. इन खबरों में खोये-खोये मैंने बस यूं ही सेना मुख्यालय के पास मंजूरी के बारे में लिख भेजा और व्हाट्सऐप पर ही यह मंजूरी मुझे मिल भी गई.

इसके बाद हुआ यूं कि मैं बागडोगरा एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट से रवाना हो गया. इस यकीन के साथ कि बस चंद घड़ी के इंतजार के बाद मेरे कदम डोकलाम में होंगे. मैंने एयरपोर्ट से एक कैब ली. मैं चिकन नेक कहलाने वाले इलाके से होकर गंगटोक बेस की तरफ तीर की तरह सनसनाता हुआ चला जा रहा था.

यारी-मिजाज हूं सो मैंने कैब ड्राइवर से बातचीत शुरु कर दी. मैंने उससे नाथू ला के बारे में पूछा, जानना चाहा कि वहां मैं कैसे पहुंच सकता हूं. उसने अपने एक साथी ड्राइवर से बात की और उससे कहा कि इन साहब को बेस से नाथू ला दर्रे तक ले जाओ. रात के आठ बज रहे थे और उस वक्त मैं गंगटोक बेस पर अपने लिए एक दूसरी कैब बुक कर रहा था. इस कैब के चालक ने मुझसे कहा कि आपके पास फौज का एक वैध ‘पास’ होना चाहिए. मैंने उसे बताया कि मुझे दिल्ली मुख्यालय से मंजूरी मिली हुई है. अगले दिन मैं छह बजे सुबह उठा और मुकामी आर्मी यूनिट की तरफ बढ़ा. गेट पर खड़े गार्ड ने मुझे रोका. मैंने उसे सेना मुख्यालय से हासिल चिट्ठी दिखाई.

उसने कहा कि फिलहाल तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. क्योंकि मेरे सभी सीनियर गश्त पर गए हैं. वह गार्ड एवरेस्ट पर मौजूद बर्फ की मानिन्द सख्त था, जरा भी पिघलने को तैयार नहीं था.

नाथू ला में पहला कदम

मेरे कीमती चार घंटे बर्बाद हुए. मैंने ये बात कैब-चालक नोरबू हाकशी को बताई. वह थोड़ा चतुर निकला, उसने कहा कि बौद्ध लोगों के रोजमर्रा के सरोकार से जुड़ी बातों, खासकर वहां चल रहे उपवास पर दिल्ली में कोई रिपोर्ट छपनी चाहिए. मैंने उसकी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए हामी भरी. उसने मुझे नाथू ला पहुंचाने के लिए 'बोर्डर-कैब' को बुलाया.

बोर्डर-कैब आजादी से आ जा सकते हैं. उन्हें मुकामी तौर पर इसके लिए पास मिला होता है. इस कैब-चालक का नाम शांगू दोरजी था. हमारे बीच में किराए को लेकर थोड़ी देर-तक मोल-तोल होता रहा. मुझे पहुंचने की जल्दी थी सो मैंने जल्दी ही एक खास रकम के लिए हां कर दी और हम मंजिल की तरफ चल पड़े. अगला आर्मी बैरियर पार करना आसान साबित हुआ. मुकामी पास ने अपना काम कर दिखाया.

कैब ने नाथू ला दर्रे पहुंचाने वाली सड़क का रुख किया. लगभग 30 मिनट के बाद हम एक गांव में पहुंचे. मैंने कैब चालक से रुकने को कहा. मैं कैब से बाहर निकला. कैमरे से कुछ तस्वीरें क्लिक कीं और गांववालों से बातचीत शुरु की. लेकिन कैब-चालक मुझ पर चिल्लाया, उसने कहा कि झटपट आकर कैब में बैठो. यह भी कहा कि तुम एक 'गलत-टाइप' आदमी हो. मैंने उसे अपने कागजात दिखाये, इसपर उसने मुझसे कहा कि मैं वापस तुम्हें गंगटोक बेस लेकर चला जाऊंगा.

मशक्कत भरे दिन के बाद उम्मीद का उजाला

डोका ला की अपनी यात्रा पर निकले दो दिन हो चले थे. लेकिन मेरे हाथ अभी कुछ नहीं लगा था. गंगटोक लौटने पर मेरी नजर एक चायवाले पर पड़ी. मैने कैब-चालक से रुकने को कहा. मैंने एक कप चाय ली और चुस्की भरने लगा. जल्दी ही तकरीबन एक दर्जन सैनिक वहीं आ पहुंचे. वे डोका ला की बातें कर रहे थे. मैंने अपने होठ चाय की प्याली पर लगा रखे थे. लेकिन मेरे कान सैनिकों की तरफ लगे थे. सैनिकों की बात से पता चला कि गंगटोंक बेस के 70 फीसद सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा की ओर रवाना कर दिए गए हैं.

एक सैनिक ने कहा कि चीनी सैनिकों के बंकर स्टील के बने हैं. इसके बाद उन लोगों ने चीनी और हिन्दुस्तानी सप्लाई लाइन की तुलना की. सैनिकों में से एक ने कहा कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी की सप्लाई लाइन बेहतर है. मैंने उससे कहा कि अपनी बात को साबित कीजिए. उसने अपने मोबाइल पर कुछ तस्वीरें दिखाईं. मैंने तस्वीरों को देखा और मुझे भान हुआ कि ये लोग मुझे चीनियों का मुखबिर समझ रहे हैं. उस जगह का काम-धाम देख रहे सेवादार(आर्डरली) ने कहा कि तुम यहां से तुरंत अपना रास्ता नापो.

दूसरा रास्ता

मैं क्या करता, अपना सा मुंह लेकर फिर नोरबू के पास लौट आया. मुझे ठंड लग रही थी. घर से जो जैकेट खरीदकर चला था वह जिस्म पर किसी पन्नी की तरह बेकाम की साबित हो रहा थी. यह जानकर कि मुझे कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई, नोरबू मेरी मदद करने को राजी हो गया. लेकिन उसने शर्त रखी कि मैं बौद्ध लोगों के जारी उपवास पर कुछ ना कुछ जरुर लिखूंगा. मैंने उसके इस ब्लैकमेल की बात मान ली. उसने मुझसे कहा कि कुछ रुपए मिल जाएं तो वह मेरी खातिर कुपुक गांव तक जाने के लिए एक पुलिस-पास का जुगाड़ कर देगा.

मैं रात 11 बजे सोने गया और तड़के 4 बजे उठ गया. यह 22 जुलाई की सुबह थी. हमलोग नोरबू के साथ रवाना हुए. उसने वादा किया था कि वह पुलिस-पास मेरे व्हाट्सअप्प पर भेज देगा. तकरीबन 60 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हमलोग ओल्ड सिल्क रुट पर आ गए. कैब-चालक ने मुझे बताया कि चीन इसी सड़क पर नजर गड़ाए हुए है. मैंने देखा की सड़क खस्ताहाली की शिकार है.

photo: Firstpost/ Manoj Kumar.

photo: Firstpost/ Manoj Kumar.

फिर नोरबू का फोन आया कि उसने जिस पुलिस ऑफिसर की बात कही थी वह छुट्टी पर चला गया है सो अब पास का जुगाड़ नहीं हो सकेगा. कैब-चालक ने कहा कि वह मुझे आर्मी बैरियर के पार पहुंचा देगा. हमलोग बैरियर पार करके कुपुक गांव पहुंच गए. लेकिन किसी ने टोका-टाकी नहीं की. कैब एक वीरान जगह पर रुकी. उस वक्त दोपहर के एक बज रहे थे. मुझे सेना के बंकर नजर आए, लाल झंडे और चेतावनी के बोर्ड भी दिखे. मैंने तस्वीर खींची और वीडियो बनाया. तकरीबन 5 किलोमीटर आगे हम फिर रुके. लेकिन वहां बड़ी मनहूस किस्म की शांति छाई हुई थी. मुझे किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी सो मैंने वहां से वापस लौटना ही ठीक समझा.

रात में कुपुक की चाय दुकान पर

हमारे कुपुक गांव पहुंचने तक काफी देर हो चुकी थी. मेरे कैब चालक ने टीन के पत्तरों से बनी एक चाय की दुकान के सामने सामान उतारा. इसके पीछे तीन खानों में बंटे कमरे थे. मैंने सामने वाले कमरे में सामान टिकाया. वहां कुछ सैनिक आ जुटे. इन सैनिकों में से कुछ अभी बस सीमा पर की अपनी ड्यूटी से वापस लौटे थे. बाकी सैनिकों को अभी ड्यूटी पर जाना था. वे लोग आपस में बात कर रहे थे. मैं सुन रहा था.

उनमें से एक फौजी ने कहा कि जाट रेजिमेंट मोर्चे पर सिर्फ कैमरा लेकर डटी है. बातचीत से मुझे यही जान पड़ा कि युद्ध होकर रहेगा. एक नौजवान फौजी दूसरे फौजियों से समझाने के अंदाज में कह रहा था कि चीनियों ने रोड बनाने वाली मशीन किस तरह हिन्दुस्तानियों की मिट्टी हटाने वाली मशीन के साथ आड़ा-तिरछा करके लगा रखी है. उसने कहा, 'हमें आदेश मिला है कि उन्हें हर कीमत पर रोकना है'. एक सैनिक चाय-दुकान में आधी रात तक रुका.

वह जगह...

नाथू ला में पैठने की अपनी नाकाम कोशिशों के दौरान मुझे लोगों की सिर्फ एक बस्ती दिखी. जहां से सेना के बंकर शुरु होते हैं वहां से 'नो-मैन्स लैंड' (निर्जन इलाका) का भी आरंभ हो जाता है. इसके बाद हर किलोमीटर पर सेना की चौकी है. चेतावनी की सूचना के लिए थोड़े-थोड़े से अंतराल पर हूटर लगाए गए हैं.

आपको ऐसी जगहों पर बर्फ मिलेगी, कोहरा मिलेगा और बर्फानी झंझावात नजर आएगा. सबकुछ एक में गुत्मगुत्था, कुछ इस तरह कि एक पल में नजरों के आगे धुंध छा जाती है तो दूसरे पल सबकुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है. ऐसे में सतर्क निगहबानी करना मुश्किल है. लेकिन सैनिकों के पास हर मौसम में काम करने वाले आंखों के उपकरण होते हैं.

इन उपकरणों के सहारे आप कोहरे को भेदते हुए किसी संदिग्ध गतिविधि को भांप सकते हैं. यहां लोग चावल और आलू के सहारे भूख मिटाते हैं. चावल, गाय-भैंस और याक का मांस, यही यहां जीने का आधार है. जिन सैनिकों से मेरी मुलाकात हुई वे सब नौजवान और खुशमिजाज थे. इनमें से ज्यादातर अभी-अभी श्रीनगर से आए थे. घाटी के कठिन हालात का सामना करने के कारण उनका दम-खम खास नजर आ रहा था. इनमें से कई विशेष सैन्य-सेवा के थे. काफी लंबे, बांके और मजबूत कदमों वाले.

और फिर आखिर राज फाश हो गया...

अगली सुबह यानी 23 जुलाई को मैं तस्वीर उतारने के लिए एक पहाड़ी पर गया. लेकिन दुर्भाग्य कहिए कि मैं सैनिकों की नजर में आ गया. मुझसे सवाल पूछे गए. मैंने उन्हें सेना मुख्यालय से मिली चिट्ठी दिखाई. लेकिन मुझसे कहा गया कि आप इस जगह से चलते नजर आइए. मैं तेज डग भरता पहाड़ी से नीचे उतरा. मैं थका हुआ था. नींद से आंखें बोझिल थीं और भूख भी लगी थी. कार में मुझे झपकी आ गयी. लेकिन फिर मैं एक तेज झटके से जगा. कैब को सैनिकों ने चारों तरफ से घेर लिया था.

मैंने अपना कैमरा और मोबाइल कार में छुपा दिया. मुझसे कहा गया कि कार से बाहर आओ. मेरा लैपटॉप और दूसरा मोबाइल जब्त कर लिया गया. सैनिकों ने मेरी जामा-तलाशी ली. मेरे सामान को देखा-खोजा, मेरे लैपटॉप और मोबाइल की चीजों को स्कैन किया गया. उन्हें कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिसके बारे में माना जाय कि वह चीज मैं पीपल्स लिबरेशन आर्मी तक पहुंचा सकता हूं.

सो सैनिकों ने मेरे होशो-हवाश दुरुस्त करने के ख्याल से मुझे चाय पिलाई. फिर मुझे कहा गया कि आप यहां से जितनी जल्दी हो निकल जाइए. मैं भारी मन से वहां से विदा हुआ. बागडोगरा से निकलने वाली फ्लाइट दो घंटे लेट थी. मुझे यकीन था कि अब मैं अपने घर सुरक्षित पहुंच जाऊंगा.

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(मनोज कुमार फ्रीलांस लेखक हैं, चंडीगढ़ में रहते हैं और जमीनी स्तर से रिपोर्टिंग करने वाले संवाददाताओं के एक अखिल भारतीय नेटवर्क 101Reporters.com के सदस्य हैं.)

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