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क्या संघ के स्वयंसेवक हैंडग्रेनेड चलाना सीखते हैं?

क्या हमारी सेनाओं की ट्रेनिंग इतनी 'आसान' है कि तीन दिन के क्रैश कोर्स से कोई भी उसकी बराबरी कर ले

Updated On: Feb 12, 2018 08:33 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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क्या संघ के स्वयंसेवक हैंडग्रेनेड चलाना सीखते हैं?

मोहन भागवत का कहना है कि अगर आपदा आई तो संघ के स्वयंसेवक 3 दिन में सेना की मदद करने लायक बन सकते हैं. जबकि आम लोगों को कम से कम छः महीने लगेंगे. इस कथन के बाद किसी के भी मन में ढेर सारे सवाल उठते हैं. इन सवालों में दो सवाल खास हैं. सबसे पहला तो ये कि क्या संघ की शाखा में सैन्य प्रशिक्षण जैसा कुछ होता है. मतलब क्या आरएसएस अपने सैनिकों को ऑटोमेटिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग देता है? अगर हां, तो क्या ऐसा करना कानूनी है?

इससे भी महत्वपूर्ण दूसरा सवाल है. क्या हमारी सेनाओं की ट्रेनिंग इतनी 'आसान' है कि तीन दिन के क्रैश कोर्स से कोई भी उसकी बराबरी कर ले. अगर ऐसा है तो ये खतरनाक है.

पहले बात करते हैं सेना की ट्रेनिंग की. सैनिक या जवान शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में जो पहली तस्वीर बनती है वो फिल्मों, टीवी और ऐसी ही जगहों से छनकर आई होती है. असल सेना और सैनिकों को करीब से देखने वाले कम ही लोग होते हैं.

संघ की यूनीफॉर्म में नितिन गडकरी और देवेंद्र फणनवीस

संघ की यूनीफॉर्म में नितिन गडकरी और देवेंद्र फणनवीस

सेना में रहने के लिए फिट होना पहली शर्त है. ये शर्त जवानों के लिए अलग हैं, अफसरों के लिए अलग. जैसे सैनिकों की भर्ती के लिए दौड़ और लंबाई पहली शर्त है. जबकि अफसर बनने के लिए एसएसबी में बिलकुल दूसरे तरीके के टेस्ट होते हैं. जिन्हें करने के लिए ताकत से ज्यादा धैर्य चाहिए.

सेना की फिटनेस शर्तों पर खरे उतरने वाले इन तमाम युवाओं को एक साल से ज्यादा की ट्रेनिंग दी जाती है. एनडीए में मियाद 4.5 साल है, आईएमए में 18 महीने और ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकैडमी में 10 महीने.

सेना में जाने का मतलब सिर्फ बंदूक उठाकर गोली चलाना नहीं होता. सैनिकों की दौड़ने की स्पीड किसी भी राष्ट्रीय स्तर के एथलीट के बराबर होती है, वो भी 15-25 किलो के बोझ के साथ. इसके अलावा ड्रोन, तमाम मशीनें, नेटवर्क और प्लानिंग जैसे तमाम काम है जिसमें तेज दिमाग चाहिए वो भी जान पर बनी आने वाली परिस्थितियों में. ये सैनिक भी जब एनएसजी और गरुड़ जैसी कमांडो ट्रेनिंग में जाते हैं तो कई महीनों का फिर से प्रशिक्षण लेते हैं. उसके बाद भी ज्यादातर को रिजेक्ट कर दिया जाता है. घूम-फिरकर फिर वही बात दिमाग में आती है कि आखिर शाखा में ऐसा क्या सिखाया जाता है जो हमारे सैनिकों की पूरी ट्रेनिंग को स्वयंसेवक 3 दिन में जज़्ब कर लेंगे.

ट्रेनिंग करता एनएसजी का एक कमांडो

ट्रेनिंग करता एनएसजी का एक कमांडो

बचपन में घर के पास के संघ कार्यालय में तमाम तरह के बौद्धिक और शाखा देखने के खूब मौके मिले थे. इसमें कबड्डी और खो-खो खेलना सबसे ज्यादा होता था. इसके अलावा थोड़ा बहुत लाठी चलाना और मार्शल आर्ट के बेसिक दांवपेंच (जो कराटे या ताईक्वांडो में पहले स्तर से ऊपर नहीं जाएंगे) बताए जाते हैं.

क्या संघ ने पिछले कुछ सालों में एके 47 चलाने, स्नाइपर बनने, रॉक क्लाइंबिंग करने, डार्क नेट पर काम करने, ड्रोन ऑपरेट करने की ट्रेनिंग अपनी शाखाओं में देना शुरू कर दिया है. अगर नहीं तो क्या ये बयान संघ को सेना जैसी 'पवित्रता' दिलवाने का एक प्रयास है.

फिट रहना अच्छी बात है. मगर थोड़ा बहुत कसरत करना आपको एथलीट नहीं बना देता. गली क्रिकेट में छक्के मारने वाले को 3 दिन ट्रेनिंग देकर कोई विराट कोहली नहीं बना सकता, इसी तरह बेहतरीन फिटनेस वाले स्वयंसेवकों को भी तीन दिन में सैनिक नहीं बनाया जा सकता. और जो नेता बन गए हैं उनकी तो बात ही छोड़ दीजिए.

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