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सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे बैन किए हैं, दिवाली की रौनक नहीं

ऐसे पढ़े लिखे लोगों को भारीभरकम जमात है जो धर्म की आड़ लेकर इस फैसले को मानने से इनकार करते हैं. फैसले की नाफरमानी के लिए मुस्लिम धर्म के रीति रिवाजों का सहारा लेकर बहस की दिशा ही बदल दी जा रही है

Updated On: Oct 10, 2017 11:44 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे बैन किए हैं, दिवाली की रौनक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन लगा दिया है. यानी इस बार दिल्ली और उसके आसपास वाले इलाकों में दिवाली की रौनक तो होगी. लेकिन पटाखों के धूमधड़ाके वाली कानफोड़ू आवाज, दमघोंटू धुंआ और दिवाली के दूसरे दिन पटाखों के जलने के बाद निकला ढेरों टन कूड़ा नहीं होगा. पटाखे चलाने पर कोई रोक नहीं है. लेकिन वो आपके आसपास बिकेंगे ही नहीं तो आप खरीदेंगे कैसे और खरीदेंगे नहीं तो चलाएंगे कैसे. हां, अगर आप पटाखे चलाने के इतने बड़े जुनूनी हैं कि आपने पहले से आलूबम, रॉकेट, अनार और चटाई बम स्टोर कर रखे हैं तो फिर अलग बात है. अगर स्टोर नहीं कर रखे हैं तो फिर आपको दिल्ली के बाहर मेरठ, मुरादनगर या हिसार, जयपुर से जाकर पटाखे खरीदने होंगे. सुप्रीम कोर्ट की कोशिश बस इतनी है कि पटाखे चलाने वालों को इतना हत्सोहित कर दिया जाए कि वो स्वच्छ हवा की कीमत आजिज आकर ही जान लें.

कई लोगों को जबरदस्ती की जागरुकता वाली पटाखों बिना दिवाली की कल्पना निराश कर सकती है. लेकिन प्रदूषण ने दिल्ली-एनसीआर की जो हालत कर रखी है उसके हिसाब से ये फैसला ठीक ही मालूम पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक साल बिना पटाखों वाली दिवाली मनाने में क्या हर्ज है. कम से कम एक बार देख लें कि बिन पटाखों वाली दिवाली से प्रदूषण पर कितना असर पड़ता है. सांस लेने लायक हवा बचाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन दिवाली की चकाचौंध, त्योहार का जश्न, धार्मिक परंपरा और करोड़ों के कारोबार का हवाला देकर इस फैसले को दाएं-बाएं करके किसी भी तरह से टालने या पलटने की कोशिशें भी हो सकती हैं.

ये भी पढ़ें: दिवाली पर पटाखा बैन: चेतन भगत! दम घुटने का दर्द आप नहीं समझ पाए

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सोशल मीडिया में इसके समर्थन और विरोध में अपने अपने तर्क के साथ लोगों ने विचार रखने शुरू कर दिए हैं. कई लोगों का मानना है कि बैन किसी समस्या का समाधान हो ही नहीं सकता है. ऐसे आप कितनी चीजों को बैन करोगे? फिर तो आपको धार्मिक जुलूसों पर भी बैन लगाना होगा. हर त्योहार पर किसी न किसी तरह का प्रदूषण तो फैल ही रहा है. दुर्गा पूजा और गणेश पूजा में प्रतिमा विसर्जन से नदियां प्रदूषित हो रही हैं. होली में पानी की बर्बादी होती है, कृत्रिम रंगों से नुकसान होता है.

पटाखा बैन को धार्मिक चश्मे से बाहर निकलकर देखना होगा

लोगों की सेहत से जुड़े सवाल की गंभीरता को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बैन तो लगा दिया है. लेकिन कुछ लोग इसे अलग ही चश्मे से देखने लगे हैं. खासकर सोशल मीडिया पर इसे जबरदस्ती धार्मिक रंग दिया जा रहा है. लोगों के तर्क हैं कि अगर पटाखे बैन किए जा सकते हैं तो फिर बकरीद में बकरे की कुर्बानी भी बैन हो. मशहूर लेखक चेतन भगत तक ने सोशल मीडिया पर इसी तर्क के साथ अपनी लेखकीय रचनात्मकता के प्रदर्शन की कोशिश की है. एक लेखक के बतौर वो अपने नॉवेल के किरदारों के जरिए प्यार-मोहब्बत के फसानों में मजहब जात-पात और स्थानीयता की हर दीवार को तोड़ते हुए दिखते हैं. लेकिन निजी जिंदगी में अपनी रचनाधर्मिता को ऐसे संकीर्ण सोच में समेटने की उनकी क्या मजबूरी है इसे समझना होगा.

A Border Security Force (BSF) soldier lights sparklers on the eve of Diwali, near the border with Bangladesh on the outskirts of Agartala, capital of India's northeastern state of Tripura October 22, 2014. The festival will be celebrated across the country on Thursday. REUTERS/Jayanta Dey (INDIA - Tags: RELIGION MILITARY SOCIETY TPX IMAGES OF THE DAY) - GM1EAAM1TSM01

क्या बिना पटाखे चलाए दिवाली की रौनक अधूरी होगी

ऐसे पढ़े लिखे लोगों की भारीभरकम जमात है जो धर्म की आड़ लेकर इस फैसले को मानने से इनकार करते हैं. फैसले की नाफरमानी के लिए मुस्लिम धर्म के रीति रिवाजों का सहारा लेकर बहस की दिशा ही बदल दी जा रही है. कुछ लोग तर्क देते हैं कि मुहर्रम के जुलूस में जो लोग मातम में खून बहाते हैं वो किसी ब्लड बैंक में अपना खून क्यों नहीं देते? तर्क अनेक हैं. लेकिन सोचने वाली बात है कि ऐसे तर्क हर बार ऐसे किसी जागरुक कदम को उठाने से हमें रोकेंगे और ऐसे में हालात के बदलने की कल्पना नहीं की जा सकती.

क्या दमघोंटू हवा की कीमत पर दिवाली का जश्न ठीक है?

पिछले साल दिवाली के दौरान दिल्ली-एनसीआर की हवा की क्वालिटी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक की थी. दिल्ली के अलावा उत्तर भारत के कई शहरों की हवा इस हद तक प्रदूषित थी जो किसी स्वस्थ इंसान को बीमार करने के लिए काफी थी. हर साल बढ़ते प्रदूषण के आंकड़े भयावह होते जा रहे हैं. ऐसे में अगर कुछ सख्ती नहीं बरती गई तो दिल्ली जैसे शहरों को गैस चैंबर बनने से कैसे रोका जा सकेगा?

ऐसा नहीं है कि प्रदूषण की एकमात्र वजह पटाखे ही हैं. लेकिन दिवाली के बाद के प्रदूषण के लिए कुछ हद तक पटाखों से निकला धुंआ तो जिम्मेदार है ही. क्या त्योहार की रौनक सिर्फ पटाखों की तेज आवाज और दमघोंटू धुंआ से ही आएगी. इस पर जिम्मेदारी से सोचना होगा.

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एक बात समझ में नहीं आती कि हम हर साल दिवाली में पटाखों की वजह से हवा में घुले जहर को महसूस करते हैं. पटाखों की वजह से सांस तक लेने में तकलीफ होती है. बीमार आदमी छोड़िए एक स्वस्थ आदमी भी पटाखों की वजह से प्रदूषित हवा के तकलीफ को महसूस करता है. लेकिन इसके बावजूद हम पटाखे चलाना बंद नहीं कर सकते. होना तो ये चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट के बैन की जरूरत ही नहीं पड़ती. हम स्वेच्छा से दिल्ली-एनसीआर की हवा को सांस लेने लायक बचाए रखने के लिए पटाखे नहीं चलाने का संकल्प लेते. लेकिन सरकारी-गैरसरकारी सभी तरह की जागरुकता फैलाए जाने के बाद भी हम पटाखे चलाना नहीं छोड़ सकते.

Men light firecrackers while celebrating the Hindu festival of Diwali, the annual festival of lights in New Delhi, India, November 11, 2015. REUTERS/Adnan Abidi - GF20000055466

पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण से इनकार नहीं किया जा सकता

आजकल सुबह सवेरे रोज एफएम रेडियो चैनल तक में दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते पॉल्यूशन की जानकारी दी जा रही है. आने वाले खतरनाक वक्त की दुहाई देकर पटाखे की जगह सिर्फ रोशनी वाली दिवाली मनाने की अपील की जा रही है. लेकिन ऐसी सलाह को लोग गंभीरता से नहीं लेते. हर दिवाली में पटाखों को न चलाने की अपील का हश्र पिछले दो-तीन सालों से तो यही दिखने में आ रहा है.

बदलते वक्त के साथ त्योहार मनाने के तरीके बदलने होंगे

दिल्ली-एनसीआर के सबसे प्रदूषित जगहों में से एक आनंद विहार से थोड़ी दूर पर है वैशाली. पिछले साल दिवाली के मौके पर जब मैं बाहर निकला तो देखा यहां आमने-सामने की दो बिल्डिंगों में होड़ लगी थी. पटाखे चलाने के इस अजीबोगरीब कॉम्पिटिशन में एकदूसरे से तेज और ज्यादा दमदार आवाज वाले पटाखे चलाने का नतीजा ये हुआ था कि पूरा इलाका धुंआ-धुंआ हो चुका था. रात 8 बजे से शुरू हुआ ये कॉम्पटीशन देर रात तक चलता रहा. देर रात इस इलाके में सांस लेना मुश्किल हो रहा था. बंद कमरों तक में जहरीली हवा घुस चुकी थी. ऐसे हालात दिल्ली और उसके आसपास के करीब हर इलाके में होती है.

आज की तुलना में हम अपने बचपन को याद करें तो मुझे याद है कि दिवाली में हमारे पटाखों का बजट कोई 15-20 रुपए का होता था. उसमें 5 रुपए का मिर्ची पटाखा, एकाध पैकेट सुतली बम, दो चार अनार और रॉकेट आ जाया करते थे. दिवाली इतने पैसों में शानदार होती थी. अपनी हैसियत के हिसाब से लोग पहले भी इससे कहीं अधिक पटाखों में अपनी दमदार दिवाली मनाते होंगे. लेकिन इससे दिवाली की रौनक में फर्क आता हो इसमें मुझे संदेह है.

आज के दिनों में ऐसा लगता है कि पटाखों का खेल बच्चों से ज्यादा बड़ों का हो गया है. जो कार की डिक्की में भर-भरके पुरानी दिल्ली से पटाखे ले आते हैं. फिर तेज आवाज, तेज रोशनी और जहरीले धुंए का सार्वजनिक प्रदर्शन होता है. मामला शानोशौकत दिखाने का हो जाता है. पुराने दिनों में बड़े बुजुर्ग इसे पैसों में आग लगाना कहते थे, आज ऐसी सीख देने वाला कोई नहीं है. सुप्रीम कोर्ट सीख देना चाहे तो इसे जबरदस्ती की जागरुकता बता दिया जाता है.

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