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तीन तलाक पर बेवजह उंगली उठाई जा रही है : मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

एआईएमपीएलबी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा- तलाक का सबसे अधिक इस्तेमाल ईसाई समाज में है

Updated On: Apr 08, 2017 11:40 PM IST

Bhasha

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तीन तलाक पर बेवजह उंगली उठाई जा रही है : मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. असमा जोहरा ने कहा कि, एक साथ तीन बार तलाक बोलना सामाजिक मुददा है, धार्मिक नहीं. पिछले ढाई साल से बेवजह तलाक के मुद्दे पर उंगली उठाई जा रही है.

डॉ. जोहरा ने शनिवार को बोर्ड की पांचवीं सालाना बैठक के बाद कहा कि, तलाक को शरीयत के मुताबिक देखा जाना चाहिए. पिछले ढाई साल से इस मुद्दे को बिना वजह तूल दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि, तीन तलाक का मतलब है कि उस पुरुष से दोबारा शादी नहीं हो सकती. तीन तलाक को सही तरीके से समझने की जरूरत है.

उन्होंने ये भी कहा कि, इस्लाम में महिला सुरक्षित है. उन्हें पूरी सुरक्षा दी गई है. सरकार जानबूझकर इस मुद्दे को हवा दे रही है. सच्चर कमेटी में तीन तलाक का जिक्र तक नहीं है.

सबसे अधिक ईसाई समाज में इस्तेमाल हुआ 

जोहरा ने इस मौके पर सूचना के अधिकार कानून के तहत 26 परिवार अदालतों से मांगी गई सूचना के आधार पर बताया कि तलाक का इस्तेमाल सबसे अधिक ईसाई समाज में हुआ है. मुस्लिम समाज में इसकी संख्या कम है. जो मामले हैं उनमें भी महिलाओं द्वारा आगे होकर पुरुषों से ‘खुला’ लेने का मामला है.

उन्होंने देश के 8 जिलों कन्नूर, नासिक, करीमनगर, गुंटुर, सिकंदराबाद, मल्लापुरम, अर्नाकुलम और एक अन्य जिले के आंकड़े का हवाला देते हुए कहा कि, यहां तलाक लेने वाले सबसे अधिक 16,505 हिंदू, 1307 मुस्लिम, 4827 ईसाई और 8 सिख समुदाय से हैं. यह आंकड़े साल 2011 से 2015 के हैं.

लैंगिग समानता की सबसे बड़ी मिसाल 

जोहरा ने मुस्लिम समाज की प्रबुद्व महिलाओं की एक वर्कशॉप को संबोधित करते हुए कहा कि, दुनिया में इस्लाम ही ऐसा मजहब है जो महिलाओं की संपत्ति में अधिकार की बात करता है. यह लैंगिक समानता की सबसे बड़ी मिसाल है. अगर इसे सही ढंग से लागू किया जाए तो महिलाओं की बेहतरी की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा.

उन्होंने कहा कि, लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय हासिल करने के लिए कुरानिक ज्यूरिपूडेंस (इस्लामिक न्याय शास्त्र) को भारतीय कानून का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

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