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RIP जावेद आबिदी: खामोश हुई दिव्यांगों को अधिकार दिलाने वाली आवाज़

जावेद के काम को दुनिया भर में पहचाना गया, उनके सुझावों पर कई सुधार हुए

Updated On: Mar 04, 2018 10:19 PM IST

FP Staff

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RIP जावेद आबिदी: खामोश हुई दिव्यांगों को अधिकार दिलाने वाली आवाज़

दिव्यांगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले जावेद आबिदी नहीं रहे. 53 साल की उम्र में रविवार को उनकी मृत्यु हो गई. बताया जा रहा है कि उन्हें चेस्ट इन्फेक्शन था. जावेद के परिवार में मां छोटा भाई और छोटी बहन है.

आबिदी ने 1996 में दिव्यांगों के रोजगार की व्यवस्था के लिए नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एंप्लॉयमेंट फॉर डिसएबल पीपल की स्थापना की थी. वो ग्लोबल चेयर ऑफ डिसएबल्ड पीपल भी थे. ये संस्था यूनाइटेड नेशन्स को भी विकालांगो से जुड़े मामलों में सलाह देती है.

भारत में इस तरह की मुहीम चलाने वाले लोगों में जावेद पहले थे. जावेद खुल के कहते थे कि हमें (विकलांगों) को शामिल किए बिना, हमारी कोई बात नहीं की जाएगी. उनके प्रयासों से दिसंबर 2016 में दिव्यांगों से जुड़े कानून में काफी बदलाव किए गए. इसमें डिसएबिलटी की परिभाषा भी बदली गई है. इसके साथ ही उनके लिए नौकरी, सार्वजनिक जगहों पर आने जाने की सुविधाओं के नियमों में भी बदलाव हुआ है.

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में पैदा हुए जावेद को पैदाईशी स्पाइन बाईफिडा नाम की समस्या थी. बचपन में इसका इलाज न होने से उनको नर्वस सिस्टम को नुक्सान पहुंचा. आबिदी का परिवार उन्हें लेकर अमेरिका शिफ्ट हो गया. अपनी समस्याओं के बाद भी जावेद ने राइट स्टेट यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी की और भारत वापस आए.

1993 में उन्होंने राजीव गांधी फाउंडेशन में काम करना शुरू किया. इसके बाद जावेद ने अपनी संस्था शुरू की. इसका लक्ष्य संसद में डिसेबल्ड लोगों के लिए बिल लाना था.

जावेद की अर्जी पर ही सुप्रीम कोर्ट ने पोलिंग बूथों को दिव्यांगों के लिए सहज बनाने का निर्देश दिया था. जावेद ने कई बड़ी कंपनियों के लिएकाम किया. उनकी मुहीम के असर में ही लाल किला, कुतुब मीनार और ऐसी तमाम दूसरी ऐतिहासिक इमारतों पर व्हील चेयर रैंप लगाए गए. इसके अलावा जावेद साइन लैंग्वेज को आधिकारिक दर्जा दिलवाने, विकलांगों के उपकरणों को जीएसटी से बाहर रखने, शिक्षा, रोजगार, जानकारी बढ़ाने जैसे तमाम कामों में सक्रिय रहे. आबिदी की संस्था ने सिविल सर्विस परीक्षाओं में दिव्यांगों की भागीदारी सुनिश्चित करवाई.

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