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इन फैसलों की वजह से चर्चित रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा अब भारत के 45वें मुख्य न्यायाधीश का पद संभालने जा रहे हैं

FP Staff Updated On: Aug 10, 2017 10:46 AM IST

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इन फैसलों की वजह से चर्चित रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

जस्टिस दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट की उस खंडपीठ के प्रमुख रहे थे, जिसने दिल्ली गैंगरेप मामले में मौत की सजा पर मुहर लगाई. वे उस खंडपीठ का भी हिस्सा रहे, जिसने सिनेमा हॉल में फिल्म की शुरुआत से पहले राष्ट्रगान गाने का आदेश सुनाया था. उनका करियर उन मामलों से जुड़ा रहा है, जिसने समाज पर व्यापक असर डाला है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस मिश्रा अब भारत के 45वें मुख्य न्यायाधीश का पद संभालने जा रहे हैं. वे वर्तमान चीफ जस्टिस जे एस केहर की जगह लेंगे.

भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस मिश्रा का कार्यकाल 28 अगस्त को पदभार संभालने के बाद 13 महीने का होगा. हाईकोर्ट बेंच में आने से पहले उन्होंने उड़ीसा हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल में संवैधानिक, सिविल, क्रिमिनल, रेवेन्यू, सर्विस और सेल्स टैक्स मामलों में प्रैक्टिस की है. 1977 में उन्होंने वकालत शुरू की थी.

क्यों कहे जाते हैं प्रो सिटिजन जज

जनवरी 1996 में वे उड़ीसा हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए गए. उसके बाद मार्च 1997 में उनका तबादला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट कर दिया गया. 2009 में जस्टिस दीपक मिश्रा पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने और 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का दायित्व संभाला. 10 अक्टूबर 2011 को वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त किए गए.

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जस्टिस मिश्रा को ‘प्रो सिटिजन जज’ यानी ‘आम नागरिकों की ओर झुकाव रखने वाला न्यायाधीश’ माना जाता रहा है. उनकी अदालत ने सरकार के खिलाफ मामले में ये आदेश दिया था कि प्रथम सूचना रिपोर्ट यानी FIR दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर उसे दिल्ली पुलिस वेबसाइट पर दर्ज हो जाना चाहिए ताकि अभियुक्त उसे डाउनलोड कर सके और अपनी शिकायतों के समाधान के लिए अदालत के सामने आवेदन दे सके.

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इन अहम मुकदमों में सुनाया है फैसला 

‘द हिंदू' मुताबिक उन्होंने पहले भी कई महत्वपूर्ण केस देखे हैं और वर्तमान में भी उनके पास कई मामले हैं जिनमें भारतीय क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता को लेकर बीसीसीआई का केस और सेबी-सहारा विवाद शामिल हैं. वे उस खंडपीठ की भी अगुवाई कर रहे हैं जो केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का अधिकार दिलाने के मामले की सुनवाई कर रही है.

जस्टिस मिश्रा उस खंडपीठ के भी प्रमुख रहे थे जिन्होंने 2015 में याकूब मेमन की फांसी रोकने के लिए आखिरी मिनट तक की गई कोशिश के दौरान अहले सुबह तक अभूतपूर्व सुनवाई की थी. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस मिश्रा ने ही अदालत का आदेश सुनाया था. उन्होंने कहा था, 'मौत की सजा पर स्थगन न्याय का उपहास होगा. याचिका खारिज की जाती है.'

जस्टिस मिश्रा ने उस तीन सदस्यीय खंडपीठ की भी अगुवाई की, जिसने दिल्ली में 16 दिसंबर को गैंगरेप और हत्या के मामले में चार अभियुक्तों को मौत की सजा देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. जस्टिस मिश्रा ने फैसले में कहा था कि ‘क्रूर, बर्बर और पैशाचिक प्रकृति’ वाले इस अपराध से ‘सदमे की सुनामी’ पैदा हो सकती है जो पूरे सभ्य समाज को बर्बाद कर देगा.

जस्टिस मिश्रा सर्वोच्च न्यायालय की उस खंडपीठ का भी नेतृत्व कर चुके हैं जिसने 156 साल पुराने अवमानना के कानून की वैधता को बरकरार रखा था और कहा था, 'किसी एक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए किसी और की प्रतिष्ठा को सूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता.'

राष्ट्रवादी संगठनों ने जस्टिस मिश्रा के उस आदेश का स्वागत किया था जिसमें उन्होंने सिनेमा हॉल में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान गाना अनिवार्य कर दिया था. वे सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की पीठ का भी हिस्सा रहे थे जिसने कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस सीएस कर्णन को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया.

जस्टिस मिश्रा की असली चुनौती

‘द वायर’ ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया है कि जस्टिस मिश्रा ऐसे जज हैं जो शब्दों से खेलते हैं और जिनकी अपनी शब्दावली है. फिर भी उनके सामने राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामलों में फैसला देना बड़ी चुनौती है. उनके नेतृत्व में विशेष खंडपीठ लंबे समय से लंबित इस विवाद पर 11 अगस्त से सुनवाई करने जा रही है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि जब जस्टिस केहर ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर जस्टिस मिश्रा के नाम की सिफारिश की घोषणा की, तो इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ ज्यूरिस्ट्स के अध्यक्ष आदिश सी अग्रवाल ने तर्क दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर उनकी नियुक्ति ‘न्यायिक स्वतंत्रता के साथ समझौता’ होगी.

द वायर’ के मुताबिक इसका संबंध लंबे समय से लगते रहे उन आरोपों से है जिसमें कहा गया है कि जस्टिस मिश्रा ने गलत हलफनामा देकर भूमिहीनों के लिए रखी गई सार्वजनिक जमीन पर कब्जा कर रखा है.

हालांकि प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि जस्टिस मिश्रा के खिलाफ आरोप गंभीर हैं, लेकिन यह मामला इतना पुराना है कि इस पर कुछ कर पाना मुश्किल है.

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