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नोटबंदी बड़े काम का छोटा सा हिस्सा है: बिबेक देवरॉय

देवरॉय कहते हैं कि ये तो पूरी अर्थव्यवस्था को साफ सुथरा बनाने का पहला कदम भर है.

Updated On: Dec 29, 2016 10:20 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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नोटबंदी बड़े काम का छोटा सा हिस्सा है: बिबेक देवरॉय

मशहूर अर्थशास्त्रियों जगदीश भगवती और अरविंद पनगरिया से काफी पहले बिबेक देवरॉय ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की बहुत तारीफ की थी. देबरॉय ने मोदी के विकास के गुजरात मॉडल को सराहा था. उस वक्त बिबेक देबरॉय कांग्रेस से जुड़े थिंक टैंक राजीव गांधी फाउंडेशन में काम करते थे. मोदी की तारीफ करने की वजह से देबरॉय को फाउंडेशन को छोड़ना पड़ा था. लेकिन उन्होंने मोदी के बारे में अपनी राय जाहिर करनी नहीं बंद की.

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बिबेक देबरॉय मोदी के और करीब आ गए. उन्होंने मोदी की आर्थिक नीतियां तय करने में बड़ा रोल अदा किया. योजना आयोग के खात्मे के बाद बिबेक देबरॉय को नीति आयोग का सदस्य बनाया गया. इस बीच उन्हें रेलवे के कामकाज की समीक्षा का जिम्मा भी दिया गया था.

इस वक्त बिबेक देबरॉय कई जिम्मेदारियां निभा रहे हैं. उनमें से एक है नोटबंदी के फैसले का बचाव करने की. वो बड़ी बहादुरी से सरकार के इस कदम का बचाव कर रहे हैं. देबरॉय कहते हैं कि ये तो पूरी अर्थव्यवस्था को साफ सुथरा बनाने का पहला कदम भर है.

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हमसे बातचीत में बिबेक देबरॉय ने तमाम मसलों पर खुलकर अपनी बात कही. इस बातचीत के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं:

फ़र्स्टपोस्ट: अब जबकि नोटबंदी का अभियान खात्मे के करीब आ पहुंचा है. तो आपको क्या लगता है कि इसका क्या मकसद था. क्या फायदे हैं और क्या दिक्कतें इस वजह से हुईं. अर्थशास्त्री और विश्लेषक के तौर पर आपकी क्या राय है?

बिबेक देबरॉय: किसी को 8 नवंबर की तारीख को बाकी चीजों से अलग करके नहीं देखना चाहिए. मैं आपको बताना चाहूंगा कि 8 नवंबर से पहले भी कई चीजें चल रही थीं और उस तारीख के बाद भी कई चीजें हुई हैं. इसीलिए 8 नवंबर को नोटबंदी के एलान को हमें एक व्यापक नजरिए से देखना होगा.

मसलन नए नोट आने से नया काला धन बना. एक अर्थशास्त्री के तौर पर मुझे पता है कि काला धन पहले से भी देश में मौजूद था. फिर नोटबंदी की वजह से जो नई संपत्ति बन रही है, जो लोगों की आमदनी हो रही है.

जहां तक नया काला धन जमा होने का मसला है, तो, नोटबंदी उस पर रोक लगाने के लिए नहीं थी. उसके लिए दूसरे तरीके हैं और वो अपना काम कर रहे हैं. जैसे कि हम मॉरीशस से सहयोग के लिए बातें कर रहे हैं.

समझौते में बदलाव कर रहे हैं. ये पहले से ही हो रहा है. अब जैसे बीस हजार से ऊपर के नकद लेन-देन पर पाबंदी लगी है. जैसे कि रियल एस्टेट बिल बना है.

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इसका मकसद रियल एस्टेट सेक्टर में बदलाव लाकर उसे बेहतर बनाना है. ये रातों-रात नहीं होगा. मगर हो तो रहा है. प्रधानमंत्री ने पहले ही संकेत दिए हैं कि ऐसे बहुत से और कदम उठाए जाएंगे. और याद रखिए कि काला धन बाहर लाने के लिए सरकार ने आमदनी घोषित करने की योजना पहले ही शुरू कर दी थी.

उन लोगों की ज्यादा जांच हो रही है जिनके पास काला धन होने की आशंका थी. तो जब लोग नोटबंदी की निंदा कर रहे हैं तो ये समझना होगा कि काले धन की जमाखोरी रोकने के लिए और भी कदम उठाए जा रहे हैं. हमें ये नहीं समझना चाहिए कि सिर्फ नोटबंदी से कालेधन की जमाखोरी रोकी जा रही है.

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चलिए पहले काले धन की परिभाषा तय करते हैं. काले धन के लिए दो अलग-अलग दायरे हैं. पहला जो अपराध और ड्रग की तस्करी के जरिए जमा किया जाता है. दूसरा तरीका है जिसमें कोई काम गैरकानूनी नहीं होता. ऐसे में आमदनी तो जायज है, मगर उस पर टैक्स न देकर उस आमदनी को काला धन बनाया जाता है.

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कोई ये नहीं कह रहा कि काला धन सोने चांदी और जमीन-मकान के तौर पर नहीं है. कई और तरीके सरकार ने शुरू किये हैं जो इस काले धन से भी निपट रहे हैं. सिर्फ इसलिए कि काले धन का एक बड़ा हिस्सा नकदी के अलावा दूसरे तरीकों से जमा किया गया है, नोटबंदी को लागू न किया जाए, ये कहना गलत है.

भारत में नकदी का बहुत इस्तेमाल होता है. साफ है कि भारत एक विकसित देश नहीं है. कोई ये नहीं कह रहा है कि भारत में नकद लेन-देन रातों-रात खत्म हो जाएगा. लेकिन इसका दायरा बहुत बड़ा है. जीडीपी और नकदी का अनुपात 13 फीसद है. 15 साल पहले ये नौ फीसद ही था.

हमें ये समझना होगा कि जब कोई देश विकसित होता है तो वो नकदी का कम इस्तेमाल करता है. फिर हमने अगर 15 सालों में विकास किया तो नकदी का इस्तेमाल तो कम होना चाहिए था. पर हमारे देश में ये बढ़ कैसे गया?

बांग्लादेश, श्रीलंका या पाकिस्तान की मिसाल लीजिए. वहां पर जीडीपी और नकद के बीच का अनुपात तीन से पांच फीसद ही है. पाकिस्तान में नौ फीसद है. तो हमें ये मानना होगा कि भारत में नकदी बहुत ज्यादा है बाजार में. ऐसा माहौल बनाया गया है कि हम नकदी का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं.

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जैसे कि वेतन भुगतान का कानून. इस कानून का सेक्शन 6 कहता है कि आपको तनख्वाह नकद ही देनी है, जब तक आपका कर्मचारी खुद न कहे कि उसे नकदी नहीं चाहिए. ये नियम बरसों से है. कौन करेगा ऐसा? आज के दौर में क्या हमें ऐसे कानून की जरूरत है? अब जो चीजें बदल रही हैं, वो तो बरसों पहले बदलनी चाहिए थीं.

फिर जो लेन-देन कैश में नहीं है उसका चार्ज बहुत ज्यादा है. किसी को ये सवाल उठाना चाहिए था कि कार्ड या डिजिटल पेमेंट पर इतना जुर्माना क्यों रखा गया है? यानी ऐसा माहौल था जो हमें नकद लेन-देन की तरफ धकेलता था.

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फिर याद रखिए कि सरकार ने पहले ही जन-धन योजना शुरू की थी. तो अब हमारे यहां 26 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते हैं. इनमें से कई के पास रूपे कार्ड हैं. लेकिन अफसोस की बात है कि लोग उसे बस एटीएम से पैसे निकालने के लिए ही इस्तेमाल करेंगे. क्योंकि उन्हें सिखाया ही नहीं गया कि वो कार्ड से भी पेमेंट कर सकते हैं. इस कार्ड का कोई और इस्तेमाल उन्हें नहीं बताया गया.

कोई भी आकर ये कह सकता है कि देश में बड़ी आबादी की बैंकों तक पहुंच नहीं. वो जन-धन खातों के आंकड़ों को भी खारिज कर सकता है. मेरा कहना है कि इन आंकड़ों पर भरोसा मत कीजिए. लेकिन अभी अगस्त में ही एक प्राइवेट संस्था ने एक सर्वे किया, जो कहता है कि 97-98 फीसद शहरी और ग्रामीण आबादी के पास बैंक खाते हैं.

अब कोई ये कहे कि सभी तो बैंक खातों का इस्तेमाल नहीं कर रहे, तो मैं उसकी बात से सहमत हो जाऊंगा. लेकिन ये तो मत कहो कि उनके पास बैंक खाते नहीं.

फ़र्स्टपोस्ट: 500-1000 के नोट हमारी अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा हैं? इनमें से कितना नोटबंदी के बाद वापस आया है?

बिबेक देबरॉय: इस बारे में बहुत कनफ्यूजन है. लोग दो आधार पर आंकड़े बता रहे हैं. एक तो रिजर्व बैंक के आंकड़े हैं, तो पुराने हैं और कहते हैं कि 500-1000 के 14 लाख करोड़ के नोट चलन में थे. दूसरा 8 नवंबर का आंकड़ा है. ये सबसे ताजा आंकड़ा है जिसके मुताबिक ये तादाद 16 लाख करोड़ है.

फोटो: आसिफ खान, फ़र्स्टपोस्ट

फोटो: आसिफ खान, फ़र्स्टपोस्ट

चलो हम मान लेते हैं कि 16 लाख करोड़ का आंकड़ा सही है. इसमें से कितना काला धन था? ये वापस बैंकिंग सिस्टम में कितना आ रहा है? मेरी जानकारी के मुताबिक सरकार की तरफ से किसी ने कोई आंकड़ा इस बारे में नहीं पेश किया है. कितना सिस्टम में वापस आया है हमें नहीं पता. तमाम तरह के आंकड़ों के दावे किए जा रहे हैं. मगर ये आखिरी नहीं हैं और सब सही हों ये भी जरूरी नहीं.

अब नकली नोटों की ही मिसाल लीजिए. नकली नोटों की तीन स्तरों पर पड़ताल होती है. मुझे नहीं लगता कि तीनों घेरों को पार करके नकली नोट बैंक में जमा होते हैं. लेकिन जो आंकड़े हम देख रहे हैं, उनके हिसाब से कुछ नकली नोट पहले जरूर जमा की गई थी.

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या फिर आप पेट्रोल पंप जाते हैं और पुराने नोट लेते हैं. वो नोट पेट्रोल पंप के आंकड़ों में दर्ज होंगे. ये उस रिपोर्ट में भी होंगे जो तेल कंपनियां सरकार को देती हैं. तो हमें आखिरी आंकड़े अभी नहीं मालूम हैं.

लेकिन मुझ जहां तक आखिरी आंकड़ा याद है, वो 12 या 12.5 लाख करोड़ का है. मेरे हिसाब से जिन लोगों के पास पुराने नोट थे, उनमें से ज्यादातर ने ये रकम जमा करा दी है. तो अब अगर मैं रिजर्व बैंक के आंकड़े पर जाऊं और ये कहूं कि 30 दिसंबर तक 14 लाख करोड़ भी जमा हो जाएंगे, तो बचे हुए दो लाख करोड़ भी कोई कामयाबी की मिसाल नहीं कहे जा सकते.

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बहुत से लोग कह रहे हैं कि केवल दो लाख करोड़ रुपए ही सिस्टम में वापस नहीं आएंगे. सरकार में किसी ने नहीं कहा कि ये नोटबंदी की कामयाबी का पैमाना है. क्योंकि जो भी पैसा सिस्टम में वापस आ रहा है. वो सफेद धन नहीं है. इस पर टैक्स और जुर्माना भी लगेगा और इसकी पड़ताल भी होगी. ये बैंकिंग सिस्टम में आने भर से कानूनी रकम नहीं बन गई.

मैंने पहले भी कहा था कि जो लोग नकदी जमा करके बैठे हैं. उन्हें ऐसा न करने के लिए समझाया जा रहा है. तो अच्छी बात है कि नकदी सिस्टम में वापस आई है. लोग सरकार की गंभीरता को समझ रहे हैं, यही हमारी कामयाबी है. लोग समझ रहे हैं कि नकदी जमा करके रखना अच्छी बात नहीं.

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मेरी समझ से ये पूरी व्यवस्था की सफाई की कोशिश है. तो मैं इसे सिर्फ अर्थशास्त्री के नजरिए से देखूंगा तो मुझे पूरी तस्वीर नजर नहीं आएगी.

ये सोने के बाजार की सफाई की दिशा में उठा कदम है. मेरा मतलब गहनों के बाजार से नहीं, वो अलग है. ये शेयर बाजार की सफाई का कदम है. ये रियल एस्टेट सेक्टर की सफाई का भी कदम है. साथ ही नोटबंदी से चुनाव सुधार की चर्चा होना भी इसकी कामयाबी ही है.

मैं ये नहीं कह रहा हूं कि बहुत बड़ा बदलाव आ गया है. लेकिन कम से कम उस दिशा में हम आगे तो बढ़े हैं. चर्चा तो हो रही है. आप नोटबंदी पर हो रहे सर्वे पर सवाल उठा सकते हैं. एक सर्वे कहता है कि 60 प्रतिशत लोग इसके समर्थन में हैं. दूसरा कहता है कि 80 फीसद इस फैसले के साथ हैं. कमोबेश सारे सर्वे ये कह रहे हैं कि नोटबंदी को जनता का एक बड़ा तबका समर्थन दे रहा है.

मुझे लगता है कि लोगों को ये समझ में आ गया है कि 8 नवंबर को नोटबंदी का एलान, बड़े सुधारों के सफर का एक पड़ाव भर है.

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एक और बात जो मुझे कहनी है वो ये है कि नोटबंदी जैसे फैसले की प्लानिंग के वक्त आप बहुत एहतियात से काम लेकर शानदार योजना तैयार कर सकते हैं. मगर, ऐसी प्लानिंग को खुफिया रख पाना बेहद मुश्किल होगा. इसे गोपनीय रखने के लिए मुझे कुछ फैसले लेने पड़ सकते हैं.

अगर आप ऐसा करते तो शायद आप भी कुछ फैसले लेते. मैं ये नहीं कह सकता कि मेरे सारे फैसले आलोचना से परे होंगे या पूरी तरह सही होंगे. मेरी जगह आप भी हों तो शायद आप भी यही कहेंगे.

जाहिर है लोगों को दिक्कतें हुई हैं. हम इन दिक्कतों को अलग-अलग हिस्सों में बांट सकते हैं. पहली चुनौती पर्याप्त मात्रा में नकदी बैंकों तक पहुंचाने की थी. अब जबकि नोटों की कमी थी तो, उस पर कुछ पाबंदियां लगानी भी जरूरी थीं. ऐसे हालात में तय ये हुआ कि छोटे नोट ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाए जायें.

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अच्छा, तीसरी बात ये है कि बैंकों तक नोट पहुंचाने और एटीएम में नोट डालने में फर्क है. सरकार का इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं कि बैंक अपने एटीएम तक नोट कैसे पहुंचाते हैं. क्योंकि ये काम ठेके पर होता है. तो बैंक और एटीएम तक पैसे पहुंचाने की समस्या है.

मैं ये तो कह सकता हूं कि हर गुजरते दिन के साथ बैंकों में नकदी का संकट कम हुआ है. दिल्ली और मुंबई में तो ये साफ दिखा. हां, एटीएम में अभी पर्याप्त मात्रा में नोट नहीं डाले जा रहे हैं. मुझे नहीं पता कि इसमें कितना वक्त लगेगा.

फ़र्स्टपोस्ट:ये बताएं कि सरकार को नोटबंदी से 'विंडफाल गेन' होगा, ये बात कैसे चर्चा में आ गई?

बिबेक देबरॉय: मैं शुरू से ही वित्त मंत्री और वित्त मंत्रालय की बात पर भरोसा करता आ रहा हूं. मैं ये मानता हूं कि तीन स्रोतों से पैसे आने की उम्मीद है. पहला तो वो पैसा जो लौटेगा ही. जो पैसा लौटेगा वो रिजर्व बैंक की देनदारी कम करेगा.

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फोटो: आसिफ खान, फ़र्स्टपोस्ट

अब इसका मतलब ये नहीं कि जो रिजर्व बैंक की देनदारी कम होगी, वो सीधे सरकार के खाते में जाएगी. ये फैसला रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय को करना है. हम यहां बैठकर ये अंदाजा नहीं लगा सकते कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक मिलकर इस देनदारी के मसले से कैसे निपटने वाले हैं.

दूसरी बात ये कि कुछ पैसा बैंकों के पास वापस आएगा. ये खास तौर से सरकारी बैंकों में आएगा. ये बैंकों की परिसंपत्तियों में आई कमी को पूरा करेगा. वो ज्यादा खुलकर कर्ज दे सकेंगे. लेकिन, बैंक, चाहे वो सरकारी ही क्यों न हों, सरकार नहीं हैं. तीसरा, वो पैसा होगा, जो टैक्स और दूसरे जुर्माने के तौर पर सीधे भारत सरकार के खजाने में आएगा.

अब मैं दो बातें कहना चाहूंगा. पहली तो ये कि सरकार ने पहले ही इनकम डिक्लेरेशन स्कीम की घोषणा कर रखी है. इसके अलावा आयकर विभाग, काले धन के जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है. इससे काफी पैसा सिस्टम में आया है.

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दूसरी बात ये कि अगर मैं अपनी आमदनी सौ रुपए ज्यादा घोषित करता हूं, तो इसका ये मतलब नहीं कि पूरा पैसा सरकार के खाते में जाएगा. इस पर जो टैक्स और जुर्माना लगेगा वही सरकार को मिलेगा. ये पैसा सरकार दूसरे कामों में इस्तेमाल कर सकती है.

अब ये पैसा सरकार कैसे इस्तेमाल करेगी, ये हमें एक फरवरी को पता चलेगा जब वित्त मंत्री बजट पेश करेंगे. हम अभी भी इस पैसे के कुछ हिस्से की ही बात करेंगे क्योंकि नोटबंदी और काले धन के लिए घोषित स्कीम से कितना पैसा आया ये हमें मार्च में जाकर पता चलेगा. जहां तक 'विंडफाल गेन' की बात है तो सरकार ने कभी ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया.

फ़र्स्टपोस्ट: जब प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का एलान किया, तो उन्होंने इसके लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए थे. जैसे काला धन, नकली नोट और आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाना. लेकिन ऐसा लगता है कि वक्त के साथ ये निशाने बदलते जा रहे हैं.

बिबेक देबरॉय: नहीं, मुझे नहीं लगता कि सरकार के लक्ष्य में कोई बदलाव आया है. मैं आपको एक मिसाल दूंगा. मैंने इस मुद्दे पर कई लोगों को इंटरव्यू दिए हैं. किसी में मैंने किसी खास सवाल का स्पष्ट उत्तर दिया होगा और किसी और इंटरव्यू में मैंने एक व्यापक सवाल का उसी तरह से जवाब दिया होगा. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मेरी बात बदल गई.

आप देखिए कि नोटबंदी का कोई एक लक्ष्य नहीं है. बहुत से लोग प्रधानमंत्री के 8 नवंबर के भाषण का हवाला दे रहे हैं. मेरी गुजारिश है कि आप उस पर भी तो गौर करें, जो उन्होंने रेडियो पर अपने कार्यक्रम 'मन की बात' में कहा. इन लक्ष्यों की बात वो लगातार कर रहे हैं. ऐसे में ये कहना कि नोटबंदी के मिशन के गोलपोस्ट बदल रहे हैं, गलत है.

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अब नकली नोटों का मसला ही ले लीजिए. मेरे हिसाब से दिक्कत नकली नोटों की सही संख्या को लेकर नहीं है. 2014 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान ने कहा था कि भारत में 400 करोड़ के नकली नोट चलन में हैं. वहीं खुफिया ब्यूरो के मुताबिक ये आंकड़ा 2400 करोड़ है.

ये चुनौती नकली नोटों की तादाद की नहीं. परेशानी ये है कि आतंकवादी इन पैसों के जरिए आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं. ऐसी घटनाओं के लिए केवल दस करोड़ की रकम भी पर्याप्त है.

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अगर मैं नकली नोटों के कारोबार का खात्मा कर रहा हूं, तो इसका ये मतलब नहीं कि आगे चलकर नकली नोटों का धंधा फिर से नहीं शुरू होगा. नकली नोटों के खिलाफ अभियान तो लगातार चलने वाली प्रक्रिया है.

फ़र्स्टपोस्ट: तो आपका ये कहना कि नोटबंदी के लक्ष्य बार-बार बदलने का आरोप लगाना गलत है?

बिबेक देबरॉय: मुझे यही लगता है. मैं लगातार प्रधानमंत्री मोदी को सुन रहा हूं. मुझे लगता है कि नोटबंदी का सबसे बड़ा मकसद पूरे सिस्टम की सफाई है.

फ़र्स्टपोस्ट: तो अब सरकार का अगला वार बेनामी संपत्ति पर होगा. आपको क्या लगता है कि इस चुनौती से सरकार कैसे निपटेगी? इसका रियल एस्टेट सेक्टर पर क्या असर होगा? क्या इसका कोई अंदाजा लगाया गया है?

बिबेक देबरॉय: लोग ये शिकायत कर रहे हैं कि नोटबंदी की वजह से रियल एस्टेट सेक्टर तबाह हो गया है. मैं पूछता हूं क्या तबाह हो गया? क्या संपत्ति की कीमत खत्म हो गई? क्या जिस कीमत पर रजिस्ट्री हुई है वो कम हो गई? दोनों के बीच बहुत फर्क है. ये काला धन है या सफेद पैसा?

फोटो: आसिफ खान, फ़र्स्टपोस्ट

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मैं इस मसले पर जिससे भी बात करता हूं वो कहता है कि रियल एस्टेट में काले धन का सफाया हो गया है. दिल्ली में किसी भी संपत्ति के लेन-देन में पचास फीसद काला धन होता था. अभी रियल एस्टेट का कारोबार सदमे में है. लेकिन मैं समझता हूं कि जब हालात में सुधार होगा, तो ये आधा काला धन और आधा सफेद पैसे का कारोबार नहीं होगा.

ये पूरी तरह से तो खत्म नहीं होगा. मगर इसमें कमी आएगी ये तय है. जैसे ही जीएसटी लागू होगा तो ये और चीजों को भी अपने दायरे में लाएगा. तो ये एक व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है. सिर्फ नोटबंदी से इसे जोड़ना ठीक नहीं.

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अब राजनैतिक मामले की बात करें तो चुनाव सुधारों पर चर्चा की जरूरत है. ये आसान नहीं होगा. आपको ये भी देखना होगा कि बहुत से लोग अब कार्ड और दूसरे तरीकों से लेन-देन करने लगे हैं. यानी नकदी का इस्तेमाल भी कम हो रहा है. तो मुझे लगता है कि पूरी व्यवस्था से दलालों का सफाया हो रहा है.

फ़र्स्टपोस्ट:आपको क्या लगता है कि इससे टैक्स के दायरे पर कितना असर होगा?

बिबेक देबरॉय: GST की वजह से अप्रत्यक्ष करों का बोझ तो बढ़ेगा. कर चोरी और कर देने से बचने में फर्क है. टैक्स बचाना तो कानूनी है मगर करों की चोरी गैरकानूनी है. ऐसे में आयकर का दायरा बढ़ाने के लिए आपको रियायतें कम करनी होंगी.

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आज जब कोई चार्टर्ड एकाउंटेंट टैक्स नहीं भरता तो वो टैक्स चोरी कर रहा हो ऐसा नहीं. शायद वो तमाम रियायतों के जरिए टैक्स बचा रहा हो. मुझे लगता है कि आगे चलकर इस बात पर जोर होगा कि कुछ लेन-देन आप नकदी में नहीं कर पाएंगे. ऐसे लोगों में वकील, चार्टर्ड एकाउंटेंट और डॉक्टर आएंगे. मुझे लगता है कि हम बजट में इस दिशा में कुछ बढ़ते हुए दिखेंगे.

फ़र्स्टपोस्ट:आप उन खबरों पर क्या कहना चाहेंगे कि लोग गैरकानूनी तरीके से नोट बदल रहे हैं. क्या आपको लगता है कि बैंकों ने अपनी जिम्मेदारी उस तरह से नहीं निभाई जैसे उन्हें करनी चाहिए थी?

बिबेक देबरॉय: जी हां, जो नोटों के बदलने का विकल्प था, उसका बेजा इस्तेमाल हुआ है. ये रिजर्व बैंक को देखना चाहिए था. मुझे लगता है कि कई बैंकों के साथ दिक्कत थी. वो बहुत सतर्क नहीं थे. वो एटीएम के चलन को लेकर भी चौकस नहीं थे. वो एटीएम के कैलिबरेशन का सवाल उठा रहे थे.

दूसरी बात ये कि नोटबंदी के दूसरे ही दिन से बैंकों के कर्मचारियों ने काफी मेहनत की. लेकिन कई ने धोखाधड़ी भी की. हम ये कैसे जान गए कि वो फर्जीवाड़ा कर रहे थे? हमें ये बात इसलिए पता चली क्योंकि कई लोग पकड़े गए. तो हमें इसे सकारात्मक नजरिए से देखना होगा.

मुझे समझ में नहीं आता कि जब सबको पता है कि नोटों की कमी है तो इसके लेन-देन और वितरण में निगरानी की जरूरत तो होगी ही, ये बात समझने में किसे दिक्कत है? रिजर्व बैंक आखिर किस आधार पर बैंकों को नोट दे रहा है और किस आधार पर एटीएम तय किए जा रहे हैं जहां नोट डाले जा रहे हैं?

मेरे पास इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. पर मुझे नहीं लगता कि इसे बहुत सलीके से किया जा रहा है. अगर एसबीआई जैसे बैंक के पास तमाम एटीएम हैं, तो उसे पता होगा कि किस एटीएम का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है. इसलिए जहां से लोग ज्यादा पैसे निकाल रहे हैं, वहां नोटों की सप्लाई ज्यादा होनी चाहिए.

क्या बैंक ये काम सही तरीके से कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि वो ऐसा कर रहे हैं. मुझे लगता नहीं कि कई लोगों ने पूरी ईमानदारी से काम किया है. लेकिन ये मेरा अपना अनुमान है और ये सुनी हुई बातों पर आधारित है.

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मैं अक्सर खेलगांव और अरबिंदो मार्ग से जाता हूं. इस रास्ते में करीब 20 एटीएम हैं. दो दिन पहले मैंने देखा कि उनमें से दस काम कर रहे थे. अब अगर नोटों की कमी है तो सारे के सारे एटीएम काम नहीं करने चाहिए थे. तो मुझे लगता है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि एटीएम में पैसे डालने का फैसला किस आधार पर लिया जा रहा था.

फ़र्स्टपोस्ट: ऐसी भी खबरें आईं कि दस से पंद्रह प्रतिशत कमीशन लेकर पुराने नोटों के बदले नए नोट दिए जा रहे थे. बाद में ये दर पांच फीसद होने की खबरे भी आईं.

बिबेक देबरॉय: अब अगर उनके पास नए नोटों की कमी है, तो ऐसा हुआ होगा. मैंने तो सुना कि शुरुआत में कमीशन की दर 35 फीसद थी. और अब ये दर घटकर 5 प्रतिशत रह गई है. यानी कुछ तो एक्शन का असर हुआ है. मगर अभी और किए जाने की जरूरत है. ये भी हो सकता है कि कुछ पुराने नोट नष्ट किए गए हों. क्योंकि लेन-देन में जो कमीशन कट रहा था उतने ज्यादा नोट तो नष्ट ही किए जा रहे थे न.

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फ़र्स्टपोस्ट: नोटंबदी के बारे में बाकी दुनिया से जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं, उन पर आप क्या कहना चाहेंगे? खास तौर से कुछ लोगों ने इसे अनैतिक करार दिया.

बिबेक देबरॉय: मेरी समझ में नहीं आता है कि इसमें अनैतिक क्या है. चलिए इसे समझते हैं. आपका पैसा बैंक में है. किसी ने नहीं कहा कि आप उस पैसे का इस्तेमाल नहीं कर सकते. सरकार ने बस निकासी पर पाबंदियां लगाई हैं. अगर आप चेक से भुगतान करना चाहते हैं, तो आप आराम से कर सकते हैं.

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आप डिजिटल लेनदेन के लिए भी आजाद हैं. तो ये कहना गलत है कि लोगों को उनकी संपत्ति से बेदखल किया जा रहा है. आप ये भी समझिए कि जो लोग विदेश में हैं वो यहां हो रही घटनाओं से पूरी तरह वाकिफ नहीं. वो मीडिया में आ रही खबरों के आधार पर अपनी राय बना रहे हैं.

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