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नोटबंदी: मोदी का पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक

यह कदम भ्रष्टाचार की लड़ाई में जनता की सामूहिक भावना को एक सूत्र में बांधता है.

Updated On: Nov 18, 2016 03:17 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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नोटबंदी: मोदी का पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक

कुछ लोग नोटबंदी के फैसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह की खाने का इंतजार कर रहे हैं. इन्हें जल्दी ही अपनी राजनीतिक समझ पर पछतावा होगा.

भारतीय समाज की मानसिकता को समझने की कला मोदी में भरपूर है. इसी समझ के सहारे वो जोखिम भरे कदम उठाते रहते हैं. ये गलत भी हो सकता है और ये कदम मोदी की लिए अपार सफलता भी ला सकता है. फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि पीएम मोदी ने जनता की सही नब्ज पकड़ रखी है.

जापान के साथ सफल परमाणु करार करके लौटने के बाद, गोवा में अपनी भावनाओं की अश्रुपूर्ण इजहार के द्वारा उन्होंने पहले से सोची-समझी रणनीति के तहत इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध में बदल दिया. उन्होंने अपने नि:स्वार्थ भाव को व्यक्त करते हुए कहा कि वह सिर्फ “प्रधानमंत्री बनने के लिए” पैदा नहीं हुए हैं. इसमें कोई शक नहीं कि गोवा में चतुराई से भरे नाटकीय प्रदर्शन से मोदी की छवि जोश से भरे एक मसीहाई नेता की बन गई.

एक चतुर नेता (जो वो वास्तव में हैं) की तरह मोदी ने जापान में अपने तीन दिन के पड़ाव के दौरान भी, जहां वो नोटबंदी की घोषणा के ठीक अगले दिन गए थे, भारत की जमीनी सच्चाई पर नजर रखा. वह इस बात से वाकिफ थे कि उनके राजनीतिक विरोधी उनके इस कदम के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने के लिए जनता की नाराजगी को हवा देंगे. सोशल मीडिया के द्वारा सोची-समझी साजिश के तहत झूठ और आधी-अधूरी बातों को लोगों में नाराजगी पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फैलाया गया.

मोदी अपनी धुन पर जनता को नचाना जानते हैं

मोदी की राजनीतिक प्रतिभा को हमने ऐसी कई कठिन लड़ाइयों में देखा है. इस घोषणा के समय से ही मोदी की बातों से यह साफ था कि उनका यह कदम आम जनता में बेचैनी पैदा करेगा. लेकिन उन्होंने समाज की सामूहिक बेहतरी की अपील करके इस असुविधा को बड़ी सामाजिक और राष्ट्रीय हित के साथ जोड़ दिया. अपने चतुराई भरे कदम से उन्होंने नोटबंदी को ‘ईमानदार बनाम बेईमान’ की लड़ाई में बांट दिया.

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जाहिर है, मोदी का यह सोचा-समझा कदम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में आम जनता की सामूहिक भावना को एक सूत्र में बांधता है. यह आजमाया हुआ तरीका है. मोदी ने समय लिया और यह समझा कि तब तक कोई सरकारी फैसला सफल नहीं हो सकता, जब तक जनता उसमें अपना हित नहीं देख रही हो. इस समझदारी से जो लोग एटीएम और बैंकों के बाहर लंबी कतारों में अपनी दैनिक जरूरतों के लिए नकद निकालने के लिए खड़े हो रहे हैं, वो मोदी की इस योजना के वास्तविक हिस्सेदार हैं. मोदी की समझदारी में, भारत के लोगों में एक जन्मजात ताकत है जिसकी राजनेता अनदेखी करते रहे हैं.

यहां पर मोदी की इस समझ को समझने के लिए एक इंटरव्यू का हिस्सा दिया जा रहा है, जिसे मैंने गवर्नेंस नाउ के फरवरी 2011 के अंक के लिए लिया था, उस वक्त वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे...

सवाल: तब क्या आप इस मत को नहीं मानेंगे कि गुजरात का समाज आपके विकास के मॉडल को भारत के अन्य हिस्सों से खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल, से अधिक समझता है?

जवाब: यह सोच पूरी तरह से गलत है. इस देश के पास एक ताकत है जिसे स्वीकार करना चाहिए.

सवाल:आपका मतलब आंतरिक ताकत से है...

जवाब: नहीं, मेरा मतलब प्रत्यक्ष और साफ-साफ दिखने वाली ताकत से है. कुंभ मेले के समय, हर दिन लगभग ऑस्ट्रेलिया की आबादी जितने लोग जमा होते हैं, धार्मिक संस्कार को पूरा करते हैं और काफी अनुशासित ढंग से वापस चले जाते हैं. अगर नीति-निर्माता इस ताकत को समझ लें तो उन्हें लोगों को समझाने में आसानी होगी और उनके विकास के मॉडल को स्वीकार करने में भी.

राजनीतिक ही नहीं अर्थव्यवस्था के लिए भी मास्टरस्ट्रोक होगी नोटबंदी

यह सटीक कारण कि क्यों मोदी ने इस योजना में लोगों के उद्देश्य के लिए साफ खाका खींचा. अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद पहली बार मोदी ने लोगों के भीतर सामाजिक स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की सामूहिक भावना को फिर से उभारा. लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन के विपरीत जिसका नेतृत्व एनजीओ और एक्टिविस्टों ने किया था, सरकार की इस योजना में आम लोगों की भागीदारी, उनके भागीदार होने के उद्देश्य को समझ दे रही है. ठीक इसी समय, मोदी ने इस कठिन परीक्षा की घड़ी के गुजर जाने के बाद, “खुशहाल, भ्रष्टाचार-मुक्त और सशक्त भारत” के सपने को पूरा करने का शपथ लिया.

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हालांकि मोदी के तौर-तरीके समाज के इस मनोवैज्ञानिक इच्छा के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं कि कोई मसीहाई जोश वाला नेता समाज से दुष्टों को खत्म करे. उन्होंने अपनी इस छवि पर जोखिम लिया है, अगर नोटबंदी की यह योजना असफल हो जाती है. आर्थिक बाजार के विश्लेषकों के अनुसार सरकार को बैंकिंग क्षेत्र में इससे अप्रत्याशित लाभ होगा, जिसका श्रेय इस योजना को जाएगा. पहली नजर में ही, इस योजना द्वारा देशभर के मध्यवर्गीय और उच्च-मध्यवर्गीय घरों में अब तक भारी मात्रा में जमा की हुई पूंजी बाजार में आएगी. हर गृहिणी को ढाई लाख तक की जमा पर छूट, इस बंद पूंजी को बाहर निकालने के लिए ही दिया गया है. इसी तरह गैर-कानूनी तरीके से अर्जित धन अगर गरीब लोगों की खातों (जन-धन योजना के खाते) द्वारा बंटता है तो इस धन का एक बड़ा हिस्सा बैंकिंग क्षेत्र में आएगा.

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, सरकार को इससे भी बहुत बड़ा लाभ होगा, अगर काले धन को रखने वाले इसे आयकर विभाग के डर से बांटने की जगह रद्दी के कागज की तरह इस्तेमाल करें. उन्होंने यह बताया कि “यह रिजर्व बैंक की देनदारियों को काफी कम करेगा.” इसके साथ ही सरकार व्यवस्था से इतने धन को निकाल पाएगी कि अगले दो साल के राजकोषीय घाटे को खत्म किया जा सके. ठीक इसी वक्त सरकार के खर्च करने की ताकत भी काफी बढ़ेगी. निःसंदेह मोदी का यह अतिसाहसी कदम है क्योंकि यह काफी राजनीतिक खतरे से भरा है, मगर यह कदम उल्टा ना पड़ जाए. लेकिन उनके अतीत को देखते हुए कहा जा सकता है कि मोदी सोच-समझकर जोखिम लेने वाले हैं, जो उन्हें कभी झुकने नहीं देता.

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