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शराबबंदी, नोटबंदी की मार पर बेगूसराय गुलजार

लफंडरों और निठल्लों के बीच रंथी एक्सप्रेस की बड़ी धाक थी

Updated On: Nov 24, 2016 12:27 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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शराबबंदी, नोटबंदी की मार पर बेगूसराय गुलजार

एक ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुलेट ट्रेन की बात कर रहे हों बिहार की 'रंथी एक्सप्रेस' बहुत कुछ सिखा सकती है. 'रंथी एक्सप्रेस’ से बेगूसराय का प्रेम कुछ यूं ही नहीं था.

पर ये 'रंथी एक्सप्रेस' है क्या बला?

‘रंथी एक्सप्रेस’ दरअसल देशी शराब का एक ब्रांड था. इस शराब को राजनीतिक पकड़ रखने वाले स्थानीय कारोबारी बनाते थे. ये शराब इस कदर तेज थी कि इसका एक पाउच पीने के बाद आदमी कुछ घंटों के लिए लाश जैसा हो जाता था.

इसी वजह से इस ब्रांड को अपना नाम मिला -रंथी. बेगूसराय में बोली जाने वाले अंगिका भाषा में 'रंथी' का मतलब होता है 'अर्थी'.

जब तक बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने शराब बंदी नहीं की थी तब तक लफंडरों और निठल्लों के बीच रंथी एक्सप्रेस की बड़ी धाक थी.

हजारों लोग इस वादे पर निछावर हो जाते थे कि 'एक पाउच मुरीदों को दीन-दुनिया से परे एक दूसरे ही जहां में ले जाता है.

Begusarai रामदिरी गांव के लोग

बिहार का बेगूसराय विरोधाभासों का बसेरा है. बिहार का यह  बेहद उपजाऊ समतल क्षेत्र अब काफी औद्योगिक भी है. जब तक नरेंद्र मोदी की बाढ़ में सब बह ना गया, इसे बिहार में मार्क्सवादियों का लेनिनग्राद कहा जाता था.

यहाँ वर्ग संघर्ष नहीं था अमीर और गरीब एक साथ थे. दरअसल दोनों को ये अहसास था कि ताकत बंदूक की नाल से होकर गुजरती है.

अब यहां के लोग दोतरफा मार सह रहे हैं. एक तरफ शराबबंदी दूसरी ओर नोटबंदी.

शराब ठेकेदारों ने भट्टियां बंद कर दीं. शराब के ठीये की जगह चाय के ठेले लग गए. कभी यहाँ की सड़कों पर निठल्ले घूमने वाले शराबी नदारद हैं.

बरौनी में लाइफलाइन हॉस्पिटल चलाने वाले डॉ. हेमंत कहते हैं, 'हादसों में जबरदस्त कमी आई है और गलियों में होने वाले झगड़े भी कम हुए हैं.' जिले में शराबबंदी का सकारात्मक प्रभाव साफ दिखता है.

पर नोटबंदी से क्या हुआ?

ऐनफील्ड मोटरसाइकिल की एजेंसी और केडीएम होटल चलाने वाले राजकुमार सिंह बताते हैं कि शुरुआत में जिंदगी पर प्रभाव पड़ा था लेकिन अब यह पटरी पर लौट रही है.

वह कहते हैं, 'बिहार एक छोटी अर्थव्यवस्था वाला राज्य है, जहां कोई अनौपचारिक अर्थव्यवस्था जिंदगी को काफी हद तक बाधित नहीं होने देती.' होटल में शुरुआती मंदी के बाद अब बिजनेस रफ्तार पकड़ रही है.

हाँ, इस बीच बुलेट मोटरसाइकिल के ग्राहकों में दोगुनी बढ़ोतरी हुई है.

राजकुमार सिंह राजकुमार सिंह

इसकी वजह जानने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है. राजकुमार सिंह ने बताया, कि जिन लोगों के पास उनकी जरूरत से ज्यादा पैसा दबा हुआ था, उन्होंने  बैंकों में अपना पैसा जमा कराया. सिंह के अनुसार बैंक में पैसा जमा करते ही लोग ड्राफ्ट बनवा रहे हैं और दौड़ कर बुलेट ले रहे हैं.

सिंह बताते हैं,'हमें इस महीने करीब 200 मोटरसाइकिल बिकने की उम्मीद है, जो पिछले महीने की बिक्री से दोगुनी है.'

इसी तरह, बेगूसराय के ग्रामीण इलाकों में, जिंदगी नोटबंदी से थमी नहीं है. लोगों ने काम धंधा चलाने के लिए ‘जुगाड़’ निकाल लिया है.

अब भी दुकानदार और फेरीवाले बंद हुए पुराने नोट ले रहे हैं. इनमें से अधिकतर इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि यह पैसा उनके अकाउंट में जमा हो जाएगा और स्थिति सामान्य होने पर उन्हें पैसा वापस मिल जाएगा.

हर कोई आश्वस्त नहीं

पर इसका मतलब ये नहीं कि इस इलाके में हर कोई आश्वस्त है. सबसे बड़ी चिंता किसानों को है. वे रबी की फसल के लिए खाद और बीज नहीं खरीद  पा रहे हैं.

जिला मुख्यालय से महज 10 किमी दूर, रामदिरी गांव में,  गांंव वाले रोजमर्रा की जिंदगी के लिए भी पैसे न होने को लेकर बेवजह चिंतित नहीं दिख रहे.

एक निजी कार्यक्रम में उन्होंने मुझे बताया, 'ग्रामीण समाज में आपसी संबंधों की मजबूती से हमें सहारा मिलता है.' वो बताते हैं कि इलाके में माइक्रो-एटीएम भी काम कर रहे हैं.

फिर भी वे खेती को लेकर चिंतित हैं. वे कहते हैं, 'अगर पैसों की कमी बनी रहती है तो, इसका गेहूं की बुवाई पर बुरा असर पड़ेगा.'

क्या वे नोटबंदी के बाद किसी आपदा का अंदाजा लगा रहे हैं? वे बताते हैं, 'बिल्कुल नहीं, जो हम मीडिया में देख रहे हैं, वह जमीन पर कहीं नहीं दिखता.'

हालांकि, भीड़ के बीच से एक कम्युनिस्ट नेता ने इस आशावादी सोच का खंडन किया और कहा कि यह कदम बेकार है और गरीबों के लिए मुसीबतें खड़ी कर रहा है.

क्या मोदी, भगवान कृष्ण हैं

इस वाद-विवाद के शोर में, स्थानीय बीजेपी सांसद भोला सिंह भी शामिल हो गए और इसे आध्यात्मिक स्तर पर ले गए.

मुझसे इस बारे में बात करते हुए, भोला सिंह ने अपनी आंखें बंद की और वर्तमान अग्निपरीक्षा की तुलना पौराणिक कथा से की. उन्होंने कहा, 'कुंती ने भगवान कृष्ण से उन्हें निरंतर दुख देने का आशीर्वाद मांगा था ताकि वह भगवान को याद कर सकें.'

मैंने पूछा, 'लेकिन क्या मोदी, भगवान कृष्ण हैं?' उन्होंने कहा, 'नहीं, वह नहीं हैं, लेकिन यह दर्द लोगों की भलाई के लिए है.'

सिंह एक मशहूर दल-बदलू हैं, जिन्होंने एक कम्युनिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत की जो बीजेपी में आकर खत्म हुआ।

रामदिरी गांव के पास ही मशहूर कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्मस्थान सिमरिया है. रामधारी सिंह दिनकर ने वीरतापूर्वक आपातकाल के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और लिखा था,' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.'

साम्यवादियों के इस पूर्व गढ़ में, नोटबंदी और शराबबंदी पर शायद ही त्योरी चढ़ी हों.  सांसद भोला सिंह की बोली में, यह तो अभिशाप में आशीर्वाद जैसा लगता है.

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