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नोटबंदी के आंकड़े: 500 और 1000 के 99% नोट वापस आए तो कहां है कालाधन?

अब कालेधन को ढूंढ निकालने के लिए सरकार और उसके टैक्स विभाग को ओवरटाइम काम करना होगा, ताकि नोटबंदी के सियासी फैसले को सही ठहराया जा सके

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Sep 01, 2017 01:06 PM IST

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नोटबंदी के आंकड़े: 500 और 1000 के 99% नोट वापस आए तो कहां है कालाधन?

नोटबंदी के ऐलान के करीब 10 महीने बाद आरबीआई ने बैंकिंग सिस्टम में वापस आए 500 और1000 के पुराने नोटों के आंकड़े जारी कर दिए हैं. इसके मुताबिक 500 और 1000 के 99 फीसदी नोट वापस आ गए हैं. इससे पता चलता है कि लगभग पूरा पैसा वापस लौट आया है. जाहिर है इस संख्या से न तो सरकार खुश होगी और न ही सेंट्रल बैंक.

सत्यापन प्रक्रिया के बाद 30 जून 2017 तक 15.28 लाख करोड़ रुपए की कीमत के 500 और 1000 के पुराने नोट प्राप्त हुए. नोटबंदी के वक्त अवैध ठहराए गए 500 और 1000 के नोटों की कुल कीमत 15.44 लाख करोड़ रुपए थी. यह उस वक्त चलन में मौजूद कुल मुद्रा की 86 फीसदी था. इसका मतलब ये है कि नोटबंदी का 99 फीसदी हिस्सा बैंकिंग सिस्टम में वापस आ चुका है. यानी 15.44 लाख करोड़ रुपये में से सिर्फ 16 हजार करोड़ रुपये ही वापस नहीं लौटे हैं. हमें भूलना नहीं चाहिए कि ये अंतिम आंकडे नहीं हैं. आरबीआई ने अभी तक सहकारी बैंकों में प्राप्त पुराने नोटों और नेपाल से प्राप्त पुराने नोटों की गणना नहीं की है. आखिर में जब इन नोटों की संख्या भी जोड़ी जाएगी तब बैंकिंग सिस्टम में वापस आए पुराने नोटों का आंकड़ा 100 फीसदी के काफी करीब पहुंच सकता है. इसके बारे में कई रोचक विवरण हैं.

दोगुनी हुई नोटों की छपाई की लागत

आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, नोटबंदी के बाद नए नोटों की छपाई की अनुमानित लागत 7,965 करोड़ रुपये आई है, जोकि साल 2016 में नोटों की छपाई की लागत 3,421 करोड़ रुपये के मुकाबले में दोगुने से भी ज्यादा है. आरबीआई ने इसकी वजह 2000 और 500 के नोटों की नई डिजायन बताई है.

नोटबंदी से आरबीआई को नुकसान

नोटबंदी के दौरान पकड़े गए जाली या नकली नोटों की संख्या भी काफी कम रही. नोटबंदी में जहां महज 7.6 लाख नकली नोट पकड़े गए. वहीं उससे सिर्फ एक साल, पहले बिना किसी अभियान के 6.3 लाख नकली नोट जब्त किए गए थे. सामने आए आंकड़ों के मद्देनजर अब कॉस्ट-प्रॉफिट एनालिसिस के आधार पर ये कहा जा सकता है कि मोदी सरकार के निर्देश पर हुई नोटबंदी की कवायद से आरबीआई को सिर्फ नुकसान ही हुआ है. बैंकिंग सिस्टम के बाहर नकद राशि के रूप में कोई बड़ा काला धन नष्ट नहीं हुआ, जैसा कि सरकार ने शुरू में उम्मीद जताई थी.

इसके उलट, आरबीआई और सरकार को इस बड़ी कवायद की लागत को देखते हुए इसे सफल बनाने की जिम्मेदारी लेना चाहिए थी. लेकिन नोटबंदी ने उल्टा आरबीआई के डिविडेंड को ही आधे से भी कम कर दिया. जून 2017 को आरबीआई ने सरकार को 30,659 करोड़ रुपए डिविडेंड के रूप में दिए थे, जो पिछले साल के मुकाबले आधे से कम है. पिछले साल आरबीआई ने डिविडेंड के रूप में सरकार को 65,876 करोड़ रुपए हस्तांतरित किए थे. नोटबंदी के बाद इस साल सरकार को 74,901 करोड़ रुपए सरकारी खजाने में आने की उम्मीद थी.

नाकाम रही नोटबंदी ?

इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि आप किससे सवाल पूछ रहे हैं, 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी के ऐलान के वक्त सरकार के मुख्य रूप से तीन उद्देश्य थे. कालेधन पर नकेल, नकदी आधारित भ्रष्टाचार पर लगाम और आतंकी फंडिंग पर रोक. लेकिन ये साफ देखा जा सकता है कि भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर नोटबंदी का कोई खास असर नहीं पड़ा है.

नोटबंदी के बाद 500 और 1000 रुपए के नोट बेधड़क बैंक काउंटर पर लौटे, जिसने बाजार में बड़े पैमाने पर काले धन की चर्चाओं को खारिज कर दिया. जिससे दो बातें स्पष्ट होती नजर आ रही हैं...पहली ये कि-भारत में शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि भारत में नकदी में कोई महत्वपूर्ण काला धन नहीं था.

27 दिसंबर को मिंट अखबार में एक लेख छपा था, जिसके संयुक्त लेखक मशहूर अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जगदीश भगवती, आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के रेजीडेंट सीनियर फेलो विवेक देहेजिया और जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित प्रोफेसर और कोलंबिया विश्वविद्यालय में भारतीय आर्थिक नीतियों पर राज सेंटर के उप निदेशक प्रवीण कृष्णा थे. इन तीनों अर्थशात्रियों ने मोदी सरकार के नोटबंदी के कदम का बचाव किया था...और कालेधन की धारणा को बकायदा स्वीकार किया था.

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भगवती और उनके सह-लेखकों के मुताबिक, 'स्पष्ट रूप से काले धन के मुद्दे से निपटने में इसकी प्रभावशीलता की अहमियत को समझना चाहि. नोटबंदी की सफलता को कार राशि की संख्या और कितना काला धन नष्ट हुआ उस से नापा जाना चाहिए. लिहाजा हमें ऐसा मानना चाहिए कि नोटबंदी के दौरान वापस आई राशि में से लगभग 15 लाख करोड़ रुपए का काला धन है.'

इन अर्थशात्रियों की इस धारणा के आधार पर, मोदी सरकार की नोटबंदी की कवायद न सिर्फ कामयाब रही बल्कि उससे सरकार को काफी फायदा भी हुआ, जो करीब 2.5 लाख करोड़ के बराबर है. लेकिन सवाल उठता है कि ये आंकड़े आए कहां से?

भगवती और उनके सह-लेखकों ने आगे कहा, 'मोटे तौर पर कहा जाए तो, नोटबंदी से जो राजस्व आया, उस आय 30 फीसदी टैक्स लगाया गया, जोकि करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये हुआ। काले धन की सही पहचान अब टैक्स के रूप में 50% होगी. जोकि करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये बैठती है. अगर सभी काला धन वापस आए तो उसे इसी तरह पहचाना जा सकता है.'

लेकिन अगर हम आरबीआई के आंकड़ों पर गौर करें तो भगवती और उनकी टीम की काले धन पर अवधारणा और उससे सरकार को हुए फायदों की दलालें आसानी से गले से नहीं उतरतीं. सरकार ने कभी सिस्टम में नकदी में काले धन का अनुमान नहीं लगाया था। शायद, ये खराब सलाह थी, जिसके लागू होने के बाद हालात और खराब हो गए.

नोटबंदी से जीडीपी पर असर

नोटबंदी के बाद बाजार में नकदी की भारी कमी हो गई थी, जिससे आम आदमी को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, कारोबार पर बुरा असर पड़ा और आर्थिक विकास की दर पर खासा बुरा असर पड़ा.

चौथी तिमाही में जीडीपी 8 फीसदी से घटकर 6.1 फीसदी पर आ गई. जीवीए (सकल मूल्य वर्धित) में भी गिरावट दर्ज की गई. चौथी तिमाही में जीवीए जहां 5.6 फीसदी रही, जो कि पिछले साल की चौथी तिमाही में 8.7 फीसदी थी. इसके अलावा नोटबंदी से अनौपचारिक क्षेत्र में नौकरियां बुरी तरह प्रभावित हुई. यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जुड़े भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने भी नोटबंदी की आलोचना की, और इसे गलत ठहराया.

बीएमएस अध्यक्ष बैज नाथ राय ने कोलकाता स्थित दैनिक द टेलीग्राफ को बताया, "नई सरकार में अब तक सिर्फ 1 लाख 35 हजार रोजगार के अवसर ही पैदा हुए हैं, लेकिन 20 लाख लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है।" राय के मुताबिक, असंगठित क्षेत्र में रोजगार में खासी गिरावट आई है, जिसका असर खाफी गहरा है,"

अब, दूसरा पहलू ये है कि काला धन रखने वालों ने नोटबंदी को एक बड़े अवसर के तौर पर देखा, उन्होंने अपने भ्रष्ट धन को प्रत्यक्ष रूप से बैंक काउंटर पर बेनामी शख्स के माध्यम से या अन्य तरीकों से जमा करा दिया. जैसे कि खरीदारी, कर्जे के रूप मे धनवापसी और राजनीतिक चंदा.

लेकिन अब ऐसे लोगों पर पकड़े जाने और दंडात्मक कार्रवाई का खतरा बना हुआ है, हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि इन टैक्स चोरों ने अपने वाके धन को जलाने या फेंकने की बजाए जुर्माने का भुगतान करने का जोखिम उठाना बेहतर समझा. इसके अलावा, उम्मीद है कि काम के बोझ से दबा टैक्स डिपार्टमेंट ऐसे टैक्स चोरों पर अपना शिकंजा कसेगा, ताकि उनके हौसले और बुलंद न होने पाएं.

नोटबंदी के कुछ फायदे भी

इसमें कई शक नहीं कि नोटबंदी के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं. नोटबंदी के जरिए मोदी सरकार ने काले धन के खिलाफ लड़ने की हिम्मत दिखाई. यही वजह है कि सरकार और नोटबंदी के समर्थकों ने मोदी के फैसले का जमकर बचाव और प्रचार किया. जिसमें टैक्स आधार बढ़ाना, अनुपालन बढ़ाना, डिजिटल लेन-देन के लिए दबाव डालना शामिल थे. इसके अलावा ये भी कहा गया कि नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा कराए गए धन का एक बड़ा हिस्सा काला धन है. हालांकि अब तक, ऐसी जमा राशि के काला धन होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है.

अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान, मोदी ने कहा कि 2 लाख रुपए से 3 लाख तक का काला धन बैंकिंग सिस्टम में वापस आया है, लेकिन अगस्त में वित्त राज्य मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने संसद को बताया कि वित्त वर्ष 2016-17 में आयकर विभाग ने 13,715 करोड़ रुपए की अनौपचारिक आय की पहचान की. संसद के एक प्रश्न के लिखित उत्तर में मंत्री ने कहा कि 5,102 स्थानों पर आयकर छापे से 15,496 करोड़ रुपए की अघोषित आय प्राप्त हुई है. जाहिर है कि ये आंकड़े भ्रमित करने वाले और कुछ हद तक विरोधाभासी भी हैं.

अब कालेधन को ढूंढ निकालने के लिए सरकार और उसके टैक्स विभाग को ओवरटाइम काम करना होगा, ताकि नोटबंदी के सियासी फैसले को सही ठहराया जा सके. अगर बैंक खातों से काला धन निकालने की कवायद नाकाम रही, तो ये मोदी सरकार की ऐतिहासिक असफलता मानी जाएगी, और कहा जाएगा कि सरकार ने नोटबंदी के जरिए टैक्स चोरों को न सिर्फ कालाधन सफेद करने का सुनहरा अवसर मुहैया कराया बल्कि मामूली जुर्माने के साथ आसानी से छोड़ दिया.

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