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नोटबंदी: आतंक पर मार पड़ी, पर भ्रष्‍टाचार को न भूलें

नोटबंदी से जम्‍मू और कश्‍मीर में अपेक्षाकृत थोड़ी शांति आई है

Updated On: Nov 21, 2016 03:17 PM IST

Prakash Katoch

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नोटबंदी: आतंक पर मार पड़ी, पर भ्रष्‍टाचार को न भूलें

नोटबंदी की कार्रवाई ने आतंकवादी संगठनों पर गहरी चोट की है जिनका भारी नकद भंडार अब कूड़े के बराबर रह गया है.

हो सकता है कि कुछ संगठनों ने नोट बदलने वाले गैर-कानूनी गिरोहों की मदद से अपने पैसे सफेद कर लिए हों. इसकी कुछ खबरें मीडिया में आई हैं.

लिहाजा इन संगठनों के भीतर काफी हताशा भर गई है जिसे वे हमलों और आतंकी गतिविधियों के माध्‍यम से बाहर निकालने की कोशिश कर सकते हैं. इसलिए आने वाले समय में और हिंसा की गुंजाइश बन गई है.

बेहतर होगा कि स्‍थानीय पुलिस की क्षमता निर्माण का आकलन कर लिया जाए ताकि पटना-इंदौर रेल हादसे जैसी घटनाओं की सूरत में वे राहत मुहैया करा पाने में सक्षम हों.

इस हादसे में हमने देखा कि स्‍थानीय पुलिस एनडीआरएफ की टीमों और सेना के इंतजार में खड़ी थी. यह निराशाजनक है.

इस कवायद में जनता और स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं को साथ लेकर हादसों में राहत और नागरिक सुरक्षा के नजरिए से प्रशिक्षण आदि को भी शामिल किया जा सकता है.

दिल्‍ली पुलिस ने अपराधों, कानून व्‍यवस्‍था के अनुपालन और सांप्रदायिक सद्भाव के मद्देनजर 'पुलिस मित्र' योजना के तहत 49 महिलाओं सहित कुल 264 व्‍यक्तियों को पंजीकृत किया हुआ है.

इनमें किसान, स्‍वरोजगाररत लोग, झुग्‍गीवासी, सामाजिक कार्यकर्ता, अवकाश प्राप्‍त अफसर, छात्र, वकील और पूर्व फौजी शामिल हैं जो सादे कपड़ों में हमेशा तैयार रहते हैं.

यह पहल बहुत अच्‍छी है, लेकिन इसे समूचे भारत में क्‍यों नहीं लागू किया जा रहा जबकि हमें दशक भर पहले ही 'जमीन पर अरबों निगाहें' वाली सोच की जरूरत थी, चूंकि ग्‍लोबल टेररिस्‍ट इंडेक्‍स में हमारा छठवां स्‍थान है?

जाली नोटों का सवाल

नोटबंदी से जम्‍मू और कश्‍मीर में अपेक्षाकृत थोड़ी शांति आई है. पता नहीं ऐसा कितने दिनों तक रहेगा, लेकिन फिलहाल अलगाववादी संगठन अपने सड़कछाप गिरोहों को रोजाना पत्‍थरबाजीी करने की दिहाड़ी नहीं दे पा रहे हैं.

बावजूद इसके जलाए गए या लूटे गए स्‍कूलों की संख्‍या लगातार बढ़ती जा रही है. पिछले 100 दिनों के भीतर कल 34वें स्‍कूल को निशाना बनाया गया. पाकिस्‍तान की ओर से संघर्ष विराम का उल्‍लंघन भी लगातार जारी है.

जम्‍मू और कश्‍मीर में पुलिस ने न केवल 100 के जाली नोट बरामद किए बल्कि स्‍थानीय आपराधिक गिरोहों के पास से मशीनें भी जब्‍त की हैं जो जाली नोट छापती हैं.

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अगर 100 रुपये के जाली नोट छापे जा सकते हैं, तो इनका इस्‍तेमाल पत्‍थरबाजीी में भी हो सकता है, भले ही पत्‍थरबाजों की संख्‍या कम हो गई हो. इसके अलावा, पुलिस अफसरों की मानें तो हवाला के रास्‍ते आने वाले भुगतान का आम तौर से पता नहीं लग पाता.

अहम बात यह है कि पाकिस्‍तान में जाली भारतीय रुपयों की छपाई सरकारी छापेखाने में होती है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि 2000 और 500 के नए नोटों में कौन सी स्‍याही या कागज का इस्‍तेमाल होता है.

भविष्‍य में पाकिस्‍तान द्वारा इनके जाली प्रतिरूप तैयार करने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. माना जा सकता है कि जाली नोटों की छपाई में पाकिस्‍तान को चीन की मदद मिलती है, चूंकि यह 'अबाधित युद्धकौशल' की चीनी सोच का हिस्‍सा है.

जहां तक माओवादियों का सवाल है, तो वे वसूली, लूट और अफीम की खेती से आने वाले समय में अपनी दौलत दोबारा हासिल कर लेंगे.

आतंक की फंडिंग

एनआइए की 2013 की रिपोर्ट कहती है कि कश्‍मीरी आतंकी संगठनों को पिछले दो वर्षों में आतंकी अभियानों के लिए 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्राप्‍त हुए हैं.

कोई 600 करोड़ की राशि भारत के भीतर से जम्‍मू और कश्‍मीर के आतंक उद्योग में झोंकी गई. अकेले एक साल के भीतर 98 करोड़ रुपये जम्‍मू एंड कश्‍मीर एफेक्‍टीज फंड से इसमें डाले गए और जम्‍मू एंड कश्‍मीर एफेक्‍टीज़ रिलीफ ट्रस्‍ट राज्‍य में पाकिस्‍तानी घुसपैठ में मदद दे रहा है.

इसके अलावा पाकिस्‍तान के कब्‍ज़े वाले कश्‍मीर (पीओके) में ट्रकों से भेजे गए माल का दाम वाउचरों में दो से तीन गुना ज्‍यादा बढ़ाकर दिखाया गया और इससे आए अतिरिक्‍त पैसे को आतंकी अभियानों में लगाया गया.

इसमें से जम्‍मू और कश्‍मीर के नेताओं को हिस्‍सा नहीं मिला होगा, ऐसा सोच पाना भी मुमकिन नहीं है. एनआइए कानून के अनुसार एनआइए जम्‍मू और कश्‍मीर को छोड़कर बाकी हर जगह आतंक के किसी भी मामले का स्‍वत: संज्ञान ले सकता है.

वहां इसे कोई भी जांच शुरू करने से पहले राज्‍य सरकार की मंजूरी की दरकार होती है. पिछले साल जम्‍मू और कश्‍मीर के राज्‍यपाल एनएन वोहरा ने सुझाव दिया था कि रणबीर पेनल कोड को एनआइए कानून के अंतर्गत लाया जाए.

इसे लागू किया गया है या नहीं, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. इसीलिए जम्‍मू और कश्‍मीर में आतंक की फंडिंग बाकी भारत के मुकाबले अपेक्षाा आसान है.

यह बात अलग है कि बीते अगस्‍त में दक्षिण कश्‍मीर के 17 बैंकों से 38 करोड़ की लेनदेन से जुड़े संदिग्‍ध आतंकी संपर्क की जांच एनआइए ने ही की थी.

राजनीति का अपराधीकरण

नोटबंदी ने राजनीतिक दलों पर भी असर डाला है, हालांकि आम धारणा यह है कि बड़ी मछलियां मोटे तौर पर सुरक्षित रहेंगी और उन्‍हें कुछ दंडात्‍मक कार्रवाई करने के अलावा निशाना नहीं बनाया जाएगा क्‍योंकि उनके सदस्‍यों को पहले ही सूचना दे दी गई थी.

इसके बाद बारी आती है छोटे स्‍तर के नेताओं की जो माओवादियों पर निर्भर हैं, लेकिन अलग-अलग धाराओं के कुछ ऐसे नेता भी हैं जिनके शत्रु संगठनों के साथ संपर्क रहे हैं.

रॉ के पुराने अफसरों के मुताबिक अलग-अलग किस्‍म के नेता आइएसआइ से ब्‍लैकमेल होते रहे हैं और वे 'डी' कंपनी के माध्‍यम से हवाला के रास्‍ते लेनदेन करते हैं, जो कि आइएसआइ की फ्रेंचाइजी है.

इन लोगों की ओर से कुछ कार्रवाई होना तो जाहिर है, लेकिन अपने प्रभाव और वोट बैंक की राजनीति के चलते वे आज भी फल-फूल रहे हैं. जैसा कि आतंकी संगठनों के मामले में है, वैसा ही असर नोटबंदी का राजनीतिक दलों के काले धन के भंडार पर भी देखने में आएगा.

इसके चलते उनका गुस्‍सा हिंसा के रूप में बाहर निकल सकता है. भारत राजनीति के आपराधीकरण का गवाह रहा है और यहां ऐसा करने वाले बच कर निकलते रहे हैं.

आखिरी सवाल राजनीतिक दलों की विदेशी फंडिंग से जुड़ा है जिसे वैध कर दिया गया है. इसके प्रतिकूल परिणामों से इनकार नहीं किया जा सकता. क्‍या इसकी हमें कोई कीमत चुकानी पड़ेगी?

यह भी जान पाना मुश्किल है कि इसका कितना हिस्‍सा हमारे शत्रुओं की ओर से आ रहा है. ऐसी फंडिंग भारत में एक विशेष प्रकार की सरकार के गठन को लक्ष्‍य बनाएगी, जो उन व्‍यक्तियों/समूहों/राष्‍ट्रों के हितों पर निर्भर करेगा जो पैसे दे रहे हैं.

हो सकता है कुछ को ताकतवर भारत चाहिए हो, लेकिन अधिकतर की चाह ऐसी नहीं होगी. याद करें आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पटना रैली में हुए आइईडी के सिलसिलेवार धमाके (जहां संयोग से उनके मंच के नीचे रखा आईईडी नहीं फटा).

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क्‍या आप वास्‍तव में भरोसे से बता सकते हैं कि उनकी जान कौन लेना चाह रहा था- माओवादी, उग्रवादी, दूसरे राजनीतिक दल या फिर वे लोग जो विदेशों से चुनाव का चंदा भेज रहे थे?

इस लिहाज से देखें तो एक तबका है जो इस बात से आश्‍चर्यचकित है कि जिस औचक तरीके से नोटबंदी की योजना को लागू किया गया है (मीडिया द्वारा धारणा निर्माण भी हो रहा है), वह जान-बूझ कर ऐसे ही किया गया ताकी प्रधानमंत्री को बदनाम किया जा सके.

बुनियादी बात यह है कि नोटबंदी से आतंकी फंडिंग पर पड़ी मार पर फैला उत्‍साह भले ही सही हो, लेकिन हमें देश के भीतर काले धन, आतंकी फंडिंग और आंतरिक रूप से व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार तीनों की जड़ों तक जाना होगा.

मोदी की मंशा श्रेष्‍ठ है लेकिन इस व्‍यवस्‍था को ही ऊपर से नीचे तक पूरी तरह बदला जाना होगा. भूलना नहीं चाहिए कि हमारे यहां बीते 20 वर्षों से एशिया की सबसे बदतर नौकरशाही का राज रहा है.

जब सिंगापुर में लोकायुक्‍त के समकक्ष पद गठित किया गया (भारी भ्रष्‍टाचार के चलते), तब रातोरात 150 नेता, अफसर और माफिया डॉनों को जेल हो गई थी. क्‍या भारत में ऐसा कुछ देखने को मिल सकता है?

लेखक भारतीय थलसेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल हैं

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