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नोटबंदी : मिडिल क्लास से लेकर मजदूर तक प्रभावित

500-1000 के नोट बंद होने से ठेका और प्रवासी मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हैं...

Updated On: Nov 18, 2016 02:54 PM IST

Sulekha Nair

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नोटबंदी : मिडिल क्लास से लेकर मजदूर तक प्रभावित

नकद के लिए लोगों की भीड़ लग गई है, उनमें अफरातफरी मची है. इस स्थिति से कैसे निपटें? सभी लोग इससे प्रभावित हैं, खासकर सबसे निचले तबके के लोग. फर्स्टपोस्ट ने दो आर्थिक विशेषज्ञों - गौरव मशरुवाला (प्रमाणित आर्थिक योजनाकार) और सुरेश सदगोपन (संस्थापक, लैडर7 आर्थिक सलाहकार) से इस पर बात की. उन्होंने इस तरह के विचार रखे:

घरों और रेस्तरां के कामकाज में खास दिक्कत नहीं

गृहिणी: आम तौर पर इन्हें कोई दिक्कत नहीं. बहुत से लोग दूध खरीदते हैं. लेकिन वेंडर कूपन के जरिए या महीने के आखिरी में भुगतान की सुविधा देते हैं. यह कहा जा सकता है कि नकद की कमी से दूध की खरीद प्रभावित नहीं है. अगर आप शहरों में रह रहे हैं तो आम तौर पर लोग अपने किराना स्टोर से उधारी में सामान लेते हैं और महीने के आखिरी में उन्हें पैसे देते हैं. बड़ी दुकानों जैसे ग्रोफर्स, जोप्प, गोदरेज का नेचर बास्केट, बिग बाजार आदि के पास इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सुविधा उपलब्ध होती है. क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, मोबाइल वॉलेट, इंटरनेट बैंकिंग आदि के जरिए. किराना दुकानों में आप चेक के जरिए भी भुगतान कर सकते हैं. अगर आप किसी नए वेंडर से फल या सब्जी लेने जाते हैं तब आपको दिक्कत हो सकती है. पानी, बिजली आदि के बिल पुराने नोटों में भी भरे जा सकते हैं. गांवों और छोटे शहरों में लोग एक-दूसरे को जानते हैं और वेंडरों से भी जान-पहचान होती है. इस कारण इन्हें होने वाली समस्या उतनी बड़ी नहीं है, जितनी बड़े शहरों और मेट्रो में है.

रेस्तरां: उडुपी के अधिकतर केंद्रों में पीओएस मशीन लगी हुई है. इनमें से कुछ इन मशीनों पर सिर्फ 100 या 150 रुपए से अधिक का भुगतान लेते थे. लेकिन अब आप चाय के 70 रुपए भी इसके जरिए दे सकते हैं. थम्बी वेजिटेरियन रेस्टोरेंट, मुलुंड के सतीश शेट्टी कहते हैं- “हम किसी भी ग्राहक को मना नहीं कर सकते, नहीं तो यह हमारे कारोबार पर असर डालेगा.” इस सुविधा का उपयोग हम पिछले 6 महीने से कर रहे हैं और करीब 90 फीसदी ग्राहक इसका इस्तेमाल करते हैं.

हेल्थ इमरजेंसी और यात्रा में मुश्किल 

हेल्थ इमरजेंसी: यह आपके लिए एक समस्या हो सकती है अगर आपके पास बैंक खाता नहीं है. आपके पास अगर क्रेडिट या डेबिट कार्ड नहीं है तो आप चेक से भी भुगतान कर सकते हैं. स्वास्थ्य-संबंधी आपात में 1000 रुपए से अधिक ही खर्च होता है, इसीलिए अधिकतर अस्पताल प्लास्टिक मनी लेते हैं. इस कारण इसमें कोई समस्या नहीं है. लेकिन यह तब समस्या हो सकती है जब किसी डॉक्टर के पास यह सुविधा नहीं हो. इस तरह के मामलों में आप चेक या डिमांड ड्राफ्ट दे सकते हैं.

ऑफिस जानेवाले: अगर आप रेगुलर ट्रेन से यात्रा करते हैं तो आपके पास मासिक पास होगा. सरकार ने यह भी घोषणा की है कि रेलवे 500 और 1000 के पुराने नोट लेगा. अगर आप उबेर, ओला, टैबकैप जैसे टैक्सियों से यात्रा करते हैं तो इनमें ऑनलाइन भुगतान कर सकते हैं. लेकिन अगर आप बस या ऑटो से यात्रा करते है तो आपको समस्या का सामना कर पड़ सकता है. हालांकि एटीएम से 2000 रुपए से 2500 रुपए निकालने की सीमा कुछ दिनों के लिए है. इसके बाद आप सप्ताह में चौबीस हजार से बीस हजार रुपए निकाल सकते हैं और पुराने नोटों की बदली चार हजार से पैतालिस सौ रुपए तक की जा सकती है.

उधारी के भरोसे व्यापारी, विदेशी हो सकते हैं परेशान

छोटे व्यापारी: इनमें से अधिकतर अपने सप्लायर से उधार में सामान लेते हैं और हर पखवाड़े या महीने के अंत में भुगतान करते हैं. नकद की कमी उन्हें प्रभावित नहीं करेगी क्योंकि वो बैंकिंग सिस्टम का उपयोग करते हैं.

विदेशी: ये प्रभावित हो सकते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ‘अतिथि देवो भवः’ के नारे के साथ भारत की छवि टूरिस्ट प्लेस के रूप में पेश कर रहे हैं. किसी विदेशी टूरिस्ट को इसके लिए परेशान नहीं किया जाना चाहिए. इन्हें सबसे अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए और इनके नकद की बदली बगैर किसी लंबी लाइन के होनी चाहिए. विदेशियों को इस तरह की अफरातफरी की आदत नहीं है जबकि हम इस देश को जानते हैं. सरकार को इनके लिए खास बंदोबस्त करने चाहिए. आखिरी बात यह कि सरकार यह नहीं चाहेगी कि विदेशी टूरिस्ट भारत के बारे में गलत ख्याल रखें.

Women_at_work,_India

ठेका मजदूर हैं सबसे ज्यादा परेशान

सबसे अधिक प्रभावित: ठेका मजदूर और प्रवासी मजदूर इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं. उन्हें दिहाड़ी मिलती है. अगर ठेकेदार उन्हें किसी वैकल्पिक भुगतान की व्यवस्था नहीं करता है या 2000 के नोटों में सामूहिक मजदूरी देता है तो खुले पैसे के अभाव में उनके लिए यह भयावह स्थिति होगी. प्रवासी और दिहाड़ी मजदूरों को अन्य आबादी की तरह उधार नहीं मिल सकता है क्योंकि उन्हें कोई जानता नहीं है. उन्हें हर दिन काम मिलेगा या नहीं यह भी तय नहीं होता है. इस वजह से कोई उन्हें उधार देने का जोखिम नहीं लेगा.

सरकार को इस बात का ध्यान रखना होगा कि ये बैंकिंग सुविधाओं से अनजान हैं. वे नोट बदलने के लिए अगर लंबी लाइन में खड़े होंगे तो उनकी एक दिन की मजदूरी भी चली जाएगी.

सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि बैंकों और पोस्ट ऑफिसों के बांटे जाने वाले कैश का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा दिहाड़ी मजदूरों, दिव्यांगों, वरिष्ठ नागरिकों और समाज के कमजोर तबकों में बांटा जा सके.

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