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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट-8: लोकतंत्र ने भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को मजबूत किया है

ये बात तो तय है लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी आज भारत की संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं

Updated On: May 03, 2018 02:26 PM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट-8: लोकतंत्र ने भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को मजबूत किया है

(संपादक की ओर से- भारत गणराज्य अपने 70 बरस पूरे करने जा रहा है. ऐसे वक्त में पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफ़ैल अहमद ने शुरू किया है, भारत भ्रमण. इसमें वो ये पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं कि देश में लोकतंत्र जमीनी स्तर पर कैसे काम कर रहा है. तुफैल अहमद को इसकी प्रेरणा फ्रेंच लेखक एलेक्सिस डे टॉकविल से मिली. जिन्होंने पूरे अमेरिका में घूमने के बाद 'डेमोक्रेसी इन अमेरिका' लिखी थी. तुफ़ैल अहमद इस वक्त वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं. वो भारत भ्रमण के अपने तजुर्बे पर आधारित इस सीरिज में भारत की सामाजिक हकीकत की पड़ताल करेंगे. वो ये जानने की कोशिश करेंगे भारत का समाज लोकतंत्र के वादे से किस तरह मुखातिब हो रहा है और इसका आम भारतीय नागरिक पर क्या असर पड़ रहा है. तुफ़ैल की सीरीज़, 'डेमोक्रेसी इन इंडिया' की ये आठवीं किस्त है.)

लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं लोगों में सोचने और बोलने की आज़ादी को जन्म देती हैं. लोकतंत्र में नागरिकों को ताकतवर बनाने के लिए और सामाजिक बर्ताव के लोकतांत्रीकरण के लिए अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी है. अभिव्यक्ति आजादी और जम्हूरियत, ये दोनों एक- दूसरे पर निर्भर होते हैं. एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं. कांग्रेस ने दिल्ली में 29 अप्रैल को एक रैली की थी. इसका नाम बेहद दिलचस्प था- जनआक्रोश रैली. यानी लोगों के गुस्से का मंच. ये अभिव्यक्ति की आजादी की एक बढ़िया मिसाल है. इसलिए भी क्योंकि ये बात खुलेआम कही गई.

इस रैली में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि, 'हमारा लोकतंत्र खतरे में है'. मनमोहन सिंह का ये बयान संसदीय काम-काज को लेकर आम जनता की नाखुशी के हवाले से था. लेकिन, भारत में लोकतंत्र अच्छी हालात में है. ऐसी जनआक्रोश रैलियों और दूसरे विरोध प्रदर्शनों को हम अपने देश के लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी की अच्छी मिसाल के तौर पर पेश कर सकते हैं. ये विरोध निजी तौर पर जताए जाएं, या सोशल मीडिया, राजनैतिक दलों या समुदायों के जरिए जाहिर किए जाएं. ये इस बात का सबूत हैं कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक को बोलने की आजादी का खुला मौका मिलता है.

अभिव्यक्ति की आजादी के तहत ही होते हैं विरोध-प्रदर्शन

आम बोलचाल में कहें तो अभिव्यक्ति की आजादी को हम बोलने, लिखने या कला के जरिए जताने को समझते हैं. लेकिन अगर हम इसके व्यापक मायने समझने की कोशिश करें, तो, अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब नागरिकों या समुदायों का अलग-अलग या सामूहिक रूप से अपने जज्बात बयां करना है. फिर चाहे ये खेल में हो, धर्म में या फिर राजनीति में. भारत के संविधान की धारा 19 हमें बोलने की व्यापक आजादी देती है. जैसे कि शांतिपूर्ण तरीके से बिना हथियारों के, कहीं इकट्ठा होने, सोचने और बोलने की आजादी, संघ या संगठन बनाने, पूरे देश में कहीं भी आने-जाने और रहने या कोई भी काम करने की आजादी भी हमें इसके जरिए मिलती है.

अभिव्यक्ति की इस आजादी के तहत देश भर में कई जगह विरोध-प्रदर्शन होते रहते हैं. मसलन, फसल की सही कीमत न मिलने पर किसान सड़कों पर प्याज और टमाटर फेंकते हैं. 2 अप्रैल को दलितों ने भारत बंद बुलाकर एससी/एसटी एक्ट में हो रहे बदलावों का विरोध किया. फिर 10 अप्रैल को नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ बंद भी अभिव्यक्ति की आजादी ही हैं. 2015 में राजस्थान में गुज्जर समुदाय ने आरक्षण की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन किए थे. 2017 में हरियाणा के जाटों ने नौकरियों में अपने लिए आरक्षण मांगने के लिए हिंसक प्रदर्शन किए. अगर हम ये कहें कि भारत के लोकतंत्र में कुछ ज्यादा ही विरोध प्रदर्शन होते हैं, तो गलत नहीं होगा.

भारत में जम्हूरियत के जरिए आम नागरिक और तमाम समुदायों को ताकत मिलती है. उत्तराखंड की रहने वाली 35 बरस की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट जाकर एक बार में तीन तलाक को चुनौती दी. इसका ये मतलब हुआ कि वो एक सशक्त नागरिक हैं. शायरा बानो ने जाने-अनजाने में भारत के संविधान की धारा 14 से मिलने वाले बराबरी के अधिकार का उपयोग किया. 2014 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मौलाना आजाद लाइब्रेरी को अपने दरवाजे अंडरग्रेजुएट छात्रों के लिए भी खोलने को मजबूर होना पड़ा था.

विरोध करना, अदालत जाना या फिर कॉमनवेल्थ गेम्स में खेलना अभिव्यक्ति की आजादी के ही तमाम पहलू हैं. अभिव्यक्ति की ऐसी आजादी लोकतंत्र के बगैर संभव नहीं है. आज हमारे देश में ज्यादातर नागरिक पहले के मुकाबले ज्यादा जोर-शोर से अभिव्यक्ति की आजादी के इस अधिकार का उपयोग करते हैं. भारत में समाज पिछले हजारों सालों से आम तौर पर रूढ़िवादी और महिला विरोधी रहा है. अगर भारत में 1950 में संविधान लागू होने के बाद लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं मिले होते, तो हरियाणा की महिला खिलाड़ी कॉमनवेल्थ खेलों या दूसरे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में शिरकत करने और मेडल जीतने का मौका नहीं पाते. ये संविधान के जरिए अभिव्यक्ति की आजादी मिलने की वजह से ही मुमकिन हुआ.

आजादी और लोकतंत्र ने बनाया मुखर

भोपाल स्थित गैर सरकारी संगठन हिंदी भवन के कैलाश पंत कहते हैं कि, 'आजादी से पहले देश का आम आदमी खामोश था.' पंत से मेरी मुलाकात इस सीरीज के लिए भारत भ्रमण के पहले दौर में हुई थी. पंत मानते हैं कि आजादी के आंदोलन की वजह से लोगों में जागरूकता तो आई थी. लेकिन अपने अधिकारों के प्रति ये जागरूकता जमींदारों, राजाओं, नवाबों और उस तबके में ही थी, जो अंग्रेजों के लिए काम करते थे.

कैलाश पंत कहते हैं कि, 'जब हमने संविधान बनाया, तो अभिव्यक्ति की आजादी को तरजीह दी गई. संविधान ने लोगों को मुखर बनाया.' वो कहते हैं कि आम आदमी के बीच चेतना आम हो गई. इसने लोगों को सजग बनाया. हालांकि वो ये कहते हैं कि जनता ने ये नहीं समझा कि अधिकारों के साथ-साथ उनके कुछ कर्तव्य भी बनते हैं. नतीजा ये हुआ है कि विरोध-प्रदर्शनों में हिंसा होती है. विरोध के चलते ट्रैफिक पर असर पड़ता है. दुकानें जबरदस्ती बंद कराई जाती हैं. निजी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है. रेल की पटरियां उखाड़ने जैसी घटनाएं होती हैं.

Not In My Name

सिद्धांत रूप से हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है. मसलन, आप अपने कमरे में नंगे होकर रहना चाहें, तो इसकी आजादी है. या फिर आप खुद को कमरे में बंद करके नेताओं, धर्म गुरुओं, पैगम्बरों या देवताओं को गाली देना चाहें, तो दे सकते हैं. आपकी बोलने की आजादी में कोई बाधा नहीं आएगी. लेकिन जब हम राजनीति विज्ञान में बोलने की आजादी के सिद्धांत की बात करते हैं, तो इसकी परिभाषा के कई और पहलू भी सामने आते हैं. इसका मतलब है कि आपकी बोलने की आजादी का अधिकार तब शुरू होता है, जब कोई इसका विरोध करता है. हिंसा और कत्ल की वकालत करने के सिवा हर नागरिक को बिना शर्त बोलने की आजादी हासिल है. उसकी बोलने की स्वतंत्रता की हिफाजत की जानी चाहिए.

हम इसे तार्किक रूप से आगे बढ़ाएं, तो इसका ये मतलब हुआ कि जब किसी किताब के प्रकाशन का विरोध हो, तो उसे छापा जाना चाहिए और बाजार में बेचा जाना चाहिए. वो इसलिए क्योंकि इसका विरोध हो रहा है. यही वजह है कि जब ईरान के धर्मगुरू अयातुल्ला अली खोमैनी ने रश्दी का सिर कलम करने का फतवा जारी किया, तो, बहुत से प्रकाशक और लेखक सलमान रश्दी के समर्थन में खड़े हुए. इसी तरह अगर किसी फिल्म की शूटिंग का विरोध होता है, तो जरूरी है कि इस विरोध के खिलाफ अभिव्यक्ति की आजादी के तौर पर फिल्म की शूटिंग हो. इसीलिए जब कोई कहे कि फलां कार्टून नहीं बनाया जाना चाहिए, तो इसके प्रतिकार के तौर पर वो कार्टून बनाया जाए.

लेकिन हिंसक विरोध प्रदर्शन अभिव्यक्ति की आजादी

बोलने की आजादी रूढ़िवादी और कट्टरपंथी सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ खड़ी होती है. ये समाज को आगे बढ़ाती है. भारतीय लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शनों का मतलब सत्ता के लिए तमाम समुदायों मे मोल-भाव है. लेकिन, विरोध-प्रदर्शन को अभिव्यक्ति की आजादी हैं, मगर हिंसक विरोध-प्रदर्शन की आजादी नहीं है. इसकी रक्षा नहीं की जा सकती. जनवरी 2017 में करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने जयपुर में बॉलीवुड के फिल्मकार संजय लीला भंसाली पर हमला किया और उनके फिल्म के सेट को तोड़-फोड़ दिया. भंसाली को मजबूर होकर अपनी फिल्म पद्मावत की शूटिंग रोकनी पड़ी. इसके बाद करणी सेना ने फिल्म रिलीज करने के खिलाफ हरियाणा और दूसरी जगहों पर हिंसक प्रदर्शन किए. करणी सेना को राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारों का समर्थन भी मिला. इन सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट जाकर फिल्म पद्मावत पर रोक लगाने की मांग की.

ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा सियासी दलों से पैदा होता है. तो, जहां लोकतंत्र हमें सोशल मीडिया, खेल या राजनीति में अपनी बात खुलकर कहने का अधिकार देता है. पर, ये भी सच है कि राजनैतिक दलों और धार्मिक समूहों से हमारी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरे का जन्म होता है. ऐसे राजनैतिक दलों और संगठनों की वजह से ऐसी सियासी संस्कृति का जन्म होता है, जहां विरोध में आवाज उठाना असंभव हो जाता है. 2017 में ग्रेटर नोएडा में एक युवक को योगी आदित्यनाथ के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक बातें लिखने पर गिरफ्तार कर लिया गया था. वहीं 2014 में भटकल से एक युवक को इसलिए गिरफ्तार किया गया था, क्योंकि उसने नरेंद्र मोदी की हेर-फेर की हुई तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की थी.

FACEBOOK, YOUTUBE, SOCIAL MEDIA

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी भारतीय संस्कृति का हिस्सा

2017 में तमिलनाडु में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने एक मुसलमान को इसलिए मार डाला था क्योंकि उसने नास्तिकता भरे विचारों को बयां किया था. भारत के लोकतंत्र में हमने अक्सर जमीन माफिया, बालू माफिया, सियासी माफिया और धार्मिक माफियाओं जैसे तमाम गैरकानूनी काम करने वालों को पत्रकारों पर हमले करते देखा है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर के मुताबिक विश्व में प्रेस की आजादी के इंडेक्स में भारत 2016 में 133वें नंबर पर था. 2018 में भारत 138वें नंबर पर पहुंच गया. 2017 में भारत में मीडियाकर्मियों पर हमले की 46 घटनाएं दर्ज की गई थीं. अब आम भारतीय जहां अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का उपयोग कर रहे हैं. लेकिन अभी वो लोकतांत्रिक मूल्यों को ठीक से समझ और अपना नहीं पाए हैं. लोकतंत्र का सफर जारी है.

भोपाल में सामाजिक विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर डॉक्टर आर जी सिंह कहते हैं, 'भारत में हमें लोकतंत्र उस तरह विरासत में नहीं मिला, जिस तरह जाति व्यवस्था मिली. लोकतंत्र का हमारा अनुभव ज्यादा लंबा नहीं है. हमने लोकतंत्र के लिए लड़ाई नहीं लड़ी. संघर्ष नहीं किया. बुनियादी बात ये है कि हमारे देश में लोकतंत्र का जन्म समाज से नहीं हुआ'. अगर हमने लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ी होती, तो हमें लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ होती. हमने इन्हें आत्मसात किया होता. पिछले सत्तर सालों में जैसे-जैसे जम्हूरियत का कारवां हमारे देश में आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे विरोध-प्रदर्शन और हिंसा का भी बढ़ना तय है. ग्वालियर की जीवाजी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एपीएस चौहान कहते हैं कि, '1947 से पहले के हजारों सालों तक भारत का समाज जड़ बना हुआ था. समाज में तमाम जातियां अपने मौजूदा रोल को लेकर संतुष्ट थीं. लेकिन 1950 में संविधान के लागू होने के साथ भारतीय समाज में एक नया पहलू जुड़ा'.

एक बात तो तय है लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी आज भारत की संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं.

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