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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट 6: जातीय और धार्मिक भेदभावों के बावजूद भारत की लोकतांत्रिक यात्रा एक क्रांति है

लोगों का स्वभाव है निंदा करना. हमें अपनी उपलब्धियों की तारीफ करना सीखना चाहिए

Tufail Ahmad Tufail Ahmad Updated On: May 01, 2018 10:54 AM IST

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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट 6: जातीय और धार्मिक भेदभावों के बावजूद भारत की लोकतांत्रिक यात्रा एक क्रांति है

(संपादक की ओर से- भारत गणराज्य अपने 70 बरस पूरे करने जा रहा है. ऐसे वक्त में पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफ़ैल अहमद ने शुरू किया है, भारत भ्रमण. इसमें वो ये पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं कि देश में लोकतंत्र जमीनी स्तर पर कैसे काम कर रहा है. तुफैल अहमद को इसकी प्रेरणा फ्रेंच लेखक एलेक्सिस डे टॉकविल से मिली. जिन्होंने पूरे अमेरिका में घूमने के बाद 'डेमोक्रेसी इन अमेरिका' लिखी थी. तुफ़ैल अहमद इस वक्त वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं. वो भारत भ्रमण के अपने तजुर्बे पर आधारित इस सीरिज में भारत की सामाजिक हकीकत की पड़ताल करेंगे. वो ये जानने की कोशिश करेंगे भारत का समाज लोकतंत्र के वादे से किस तरह मुखातिब हो रहा है और इसका आम भारतीय नागरिक पर क्या असर पड़ रहा है. तुफ़ैल की सीरीज़, 'डेमोक्रेसी इन इंडिया' की ये छठी किस्त है.)

भारत में लोकतंत्र के हालात की पड़ताल के इस सफर में मेरी मुलाकात तीन बहुत तजुर्बेकार लोगों से हुई. ये तीनों ही उम्र के सत्तरवें से अस्सीवें दशक के पड़ाव पर हैं. भोपाल में मेरी मुलाकात राम भुवन सिंह कुशवाह से हुई. वहीं मेवात में अलवर के किशनगढ़-बास इलाके में मैं सूर्यदेव बारेठ से मिला. तो, अजमेर में मेरी बातचीत ओम प्रकाश शर्मा से हुई. इन तीनों ने भारत में लोकतंत्र के सफर की कई पीढ़ियों के दौर को देखा है.)

कुशवाह को पत्रकारिता में करीब चार दशकों का तजुर्बा है. वो इमरजेंसी विरोधी आंदोलन में भी शामिल हुए थे. वहीं बारेठ बहुत पढ़े-लिखे इंसान हैं. उन्हें 1971 में पद्मश्री से नवाजा गया था. बारेठ ने ग्राम प्रधान के तौर पर भी काम किया है. वहीं प्रोफेसर ओम प्रकाश शर्मा ने अजमेर के डीएवी कॉ़लेज में करीब तीन दशक तक राजनीति विज्ञान पढ़ाया है.

अपनी उम्र और तजुर्बे की वजह से वो भारत में लोकतांत्रिक सफर के बारे में अच्छे से जानते समझते हैं और बता सकते हैं. तो, मैंने उनसे पूछा कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के शुरुआती दौर और अब के दौर में क्या फर्क आया है. पहला बदलाव जो आया है कि सियासी दलों ने आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और अन्य पिछड़ी जातियों के नाम पर मोर्चे बना लिए हैं.

राम भुवन सिंह कुशवाह कहते हैं कि आजादी के बाद जब 1950 में संविधान लागू हुआ, तो उसके करीब दो दशक बाद तक किसी भी सियासी दल में जातियों के नाम पर मोर्चे या प्रकोष्ठ नहीं बने ते. लेकिन 1970 के दशक में गैर-कांग्रेसी दलों ने जाति और धर्म के नाम पर मोर्चे बनाने शुरू कर दिए.

इस वक्त राम भुवन सिंह कुशवाह भोपाल के स्वामी विवेकानंद केंद्र से जुड़े हैं. वो सत्तर के दशक को याद करते हुए बताते हैं कि सबसे पहले जनसंघ ने अपने यहां जातियों के नाम पर मोर्चे बनाने शुरू किए थे. तब जनसंघ के भीतर से ही इसके खिलाफ आवाज उठी थी. लेकिन, आज तो जनसंघ की सियासी वारिस बीजेपी ने जाति और धर्म के नाम पर तमाम मोर्चे पार्टी के भीतर खड़े कर लिए हैं.

जनसंघ की देखा-देखी कांग्रेस ने भी एससी/एसटी और अल्पसंख्यक मोर्चे बना लिए. कुशवाह कहते हैं कि पहले ऐसे जाति और धर्म के नाम के प्रकोष्ठ केवल सरकारी संस्थानों में हुआ करते थे. ये जातिवादी और अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ जो दबे-कुचले और पिछड़े लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बनाए गए थे. अब वो सरकारी संस्थानों से भारतीय लोकतंत्र की सियासी संस्कृति और समाज का हिस्सा बन चुके हैं.

इसका नतीजा ये हुआ है कि जैसे-जैसे लोकतंत्र का कारवां आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे समाज में तनातनी और फर्क पैदा करने में जाति और धर्म का रोल भी बढ़ता जा रहा है. इसकी ये वजह भी हो सकती है कि लोकतंत्र ने अब तक समाज के हाशिए पर रहे तबकों और जातियों को ताकत दी है. वहीं जिन जातियों का परंपरागत रूप से दबदबा रहा था, सत्ता पर उनकी पकड़ कमजोर की है. जातियों की गोलबंदी की मिसाल से हम इस बात को अच्छे से समझ सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित संगठनों द्वारा 2 अप्रैल को बुलाए गए भारत बंद का एक दृश्य

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दो अप्रैल को दलितों ने भारत बंद बुलाया. इसके जवाब में ऊंची या सवर्ण जातियों ने भी 10 अप्रैल को भारत बंद बुलाया. इन ऊंची जातियों की मांग है कि नौकरियों और संवैधानिक संस्थाओं में आरक्षण खत्म हो. इस तनातनी में हम ने इस बात की अनदेखी कर दी कि भारतीय समाज में जातियां हजारों सालों से आरक्षण की बुनियाद रही हैं. कोई भी क्रांति या कदम इस में बदलाव नहीं ला सका. यहां तक कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था भी ऐसा नहीं कर सकी.

प्रोफेसर ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं कि 1950 और 1960 के दशक में जाति का फैक्टर इतना बड़ा नहीं था. लेकिन अब तो जातिवाद हमारे सिस्टम की नसों में समा गया है. प्रोफेसर ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं कि, 'जातिवादी राजनीति की शुरुआत चौधरी चरण सिंह ने की थी'. प्रोफेसर शर्मा बनाने हैं कि जब वीपी सिंह ने अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सिफारिश करने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का फैसला किया, तो जातिवाद ने हमारे देश की राजनीति में गहरे तक जड़ें जमा लीं.

प्रोफेसर शर्मा बताते हैं कि संविधान लागू होने के शुरुआती सालों के दौरान हमारी राजनीति में समाजवादियों और वामपंथियों की वजह से गुटबाजी थी. लेकिन जातिवाद नहीं था. इस सीरीज की तीसरी किस्त में हमने लोकतंत्र और राजनीति में जातिवाद के रोल की पड़ताल की थी.

1947 में भारत के बंटवारे की वजह मजहब बना था. प्रोफेसर शर्मा कहते हैं कि देश में मजहबी राजनीति को मुस्लिम नेताओं ने मजबूती दी. लेकिन, मास्टर तारा सिंह जैसे सिक्ख नेताओं ने भी धर्म को हथियार बनाकर अपनी राजनैतिक मांगें मनवाने की कोशिश की. पहले तो वो सिक्खों के लिए अलग देश ही चाहते थे. फिर मास्टर तारा सिंह ने सिक्खों के लिए अलग सूबे की मांग उठाई.

ये भी सच है कि 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस भी मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी की मदद लिया करती थी. ऐसे में अब अगर सियासी दल मुस्लिम वोटों के लिए मुस्लिम धर्मगुरुओं की मदद मांगते हैं, तो ये बात भारत के लोकतंत्र के लिए नई नहीं.

आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में राजनीति में कांग्रेस का दबदबा रहा था. लेकिन बाद में कई सियासी दल और भी ताकतवर बनकर उभरे. आंध्र प्रदेश, बिहार और यूपी समेत कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने जन्म लिया. इसकी वजह से भारतीय राजनीति में बहुदलीय व्यवस्था ने जड़ें जमानी शुरू कीं.

महात्मा गांधी के साथ जवाहरलाल नेहरू [फोटो: विकिकॉमन]

महात्मा गांधी के साथ जवाहरलाल नेहरू [फोटो: विकिकॉमन]

प्रोफेसर ओम प्रकाश शर्मा बताते हैं कि, 'जैसे-जैसे क्षेत्रीय दलों का विस्तार हुआ, वो अपने हितों की सोचने लगे. 1950 और 1960 के दशक में कोई वोट बैंक की राजनीति की बात इस तरह नहीं करता था, जैसे आज होती है'. 1960 के दशक के बाद से सियासी दल वोट बैंक बनाने और उसे मजबूत करने की रणनीति पर काम करने लगे.

इसकी वजह से भारतीय लोकतंत्र में बुनियादी बदलाव आने शुरू हो गए. जाति हमारी राजनीति का अहम हिस्सा बन गई. देश के बंटवारे के खूनी तजुर्बे के बावजूद राजनीति में धर्म का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता रहा. राजनैतिक दलों के विस्तार से वोट बैंक बने.

लोकतंत्र की इतनी बुरी गत के बावजूद, सूर्यदेव बारेठ ने देश में जम्हूरियत को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ी है. वो कहते हैं कि इस वक्त देश के सियासी दल डार्विन के योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत के दौर से गुजर रहे हैं. यानी उनके बीच खुद को बेहतर साबित करने की होड़ मची है. बारेठ कहते हैं कि, 'जाति और धर्म का राजनीति में इस्तेमाल कोई नई बात नहीं. ये सियासी दल नई हकीकतों को ही बयां कर रहे हैं'. बारेठ मानते हैं कि बाहरी मुस्लिम शाशकों के बार-बार के हमलों और करीब दो सदियों तक अंग्रेजों की गुलामी के बावजूद भारत ने काफी तरक्की की है.

सूर्यदेव बारेठ कहते हैं कि, '1950 और 1960 के दशक में सत्ता की ताकत समाज के ऊपरी तबके या क्रीमी लेयर के पास ही रहती थी. लेकिन लोकतंत्र का कारवां जैसे-जैसे आगे बढ़ा तो सत्ता जिलों और गांवों तक भी पहुंची'. वो भारतीय लोकतंत्र की पिछले 70 सालों की कुछ उपलब्धियां गिनाते हैं. बारेठ कहते हैं कि राजनीति में भले ही जातिवाद ने जड़ें जमा ली हों, मगर समाज में लोकतंत्र की बंदिशें कमजोर हुई हैं. पूरे देश में महिलाओं की शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ी है. देश में स्वतंत्र न्यायपालिका है. राजनैतिक माहौल को बेहतर करने में चुनाव आयोग ने भी अहम रोल निभाया है. इसके अलावा सूचना के अधिकार और 73वें संविधान संशोधन से लागू हुए पंचायती राज ने नागरिकों को कई अधिकार दिए हैं.

सूर्यदेव बारेठ सही कहते हैं. पंचायती राज मंत्रालय के मुताबिक गांव के स्तर पर 2 लाख 48 हजार 752 पंचायत सदस्य चुने जाते हैं. वहीं ब्लॉक स्तर पर ये संख्या 6307 है, तो जिला स्तर पर 601 सदस्य निर्वाचित होते हैं. 19 राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया जाता है. हालांकि चुनी हुई महिला सरपंचों की जगह उनके पति या बेटे बैठकों में जाते हैं. फिर भी महिला सरपंचों ने लोकतंत्र की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी हैं.

suryadev bareth

सूर्यदेव बारेठ

2016 में देश में 29 लाख 11 हजार 961 चुने हुए प्रतिनिधियों में से 13.45 लाख महिलाएं थीं. इसे भारत में एक खामोश क्रांति कहा जा सकता है. इसके फल में आने वाले कुछ दशकों में तब देखेंगे, जब ज्यादा पढ़ी-लिखी औरतें गांवों के विकास की बागडोर थामेंगी.

सूर्यदेव बारेठ से विदा लेते हुए मैंने पूछा, 'क्या नई पीढ़ी के भारतीयों को लोकतंत्र में जाति, धर्म और बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार को लेकर फिक्र करनी चाहिए?' सूर्यदेव बारेठ उर्दू में गजलें लिखते हैं. उन्होंने बताया कि वो एक बार राजस्थान के टोंक जिले में एक कवि से मिले. उन्होंने उस कवि से पूछा कि आखिर टोंक में इतने उर्दू के कवि क्यों पैदा होते हैं?

बारेठ को जो जवाब मिला, वो ये था, 'हमें दाद देना आता है'. बारेठ ने मुझसे कहा कि 'लोगों का स्वभाव है निंदा करना. हमें अपनी उपलब्धियों की तारीफ करना सीखना चाहिए'.

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