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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट 4: वोटबैंक को खुश करने के लिए कानून की धज्जियां उड़ाती हैं राजनीतिक पार्टियां

ये दिक्कत सिर्फ बीजेपी सरकारों की नहीं है. कमोबेश हर वो पार्टी जो सत्ता में रही है, वो यही करती है.

Updated On: Apr 29, 2018 08:19 AM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट 4: वोटबैंक को खुश करने के लिए कानून की धज्जियां उड़ाती हैं राजनीतिक पार्टियां

(संपादक की ओर से- भारत गणराज्य अपने 70 बरस पूरे करने जा रहा है. ऐसे वक्त में पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफैल अहमद ने शुरू किया है, भारत भ्रमण. इसमें वो ये पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं कि देश में लोकतंत्र जमीनी स्तर पर कैसे काम कर रहा है. तुफ़ैल अहमद को इसकी प्रेरणा फ्रेंच लेखक एलेक्सिस डे टॉकविल से मिली. जिन्होंने पूरे अमेरिका में घूमने के बाद 'डेमोक्रेसी इन अमेरिका' लिखी थी. तुफ़ैल अहमद इस वक्त वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं. वो भारत भ्रमण के अपने तजुर्बे पर आधारित इस सीरिज में भारत की सामाजिक हकीकत की पड़ताल करेंगे. वो ये जानने की कोशिश करेंगे भारत का समाज लोकतंत्र के वादे से किस तरह मुखातिब हो रहा है और इसका आम भारतीय नागरिक पर क्या असर पड़ रहा है. तुफ़ैल की सीरीज़, 'डेमोक्रेसी इन इंडिया' की ये चौथी किस्त है.)

भारत के लोकतंत्र में राजनेता नए दौर के महाराजा हैं. वो खुद को कानून से ऊपर मानते हैं. कानून के राज का सिद्धांत कहता है कि देश में राजाओं नहीं, कानून का राज होगा, कोई कानून से ऊपर नहीं होगा और किसी भी पार्टी का राज हो, कानून सर्वोपरि होगा. मगर, हमारे शासक अक्सर इस सिद्धांत को कुचलते हैं.

कठुआ बलात्कार और हत्याकांड की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की इकलौती महिला सदस्य श्वेताम्बरी शर्मा ने कानून के राज के सिद्धांत को उस वक्त बखूबी बयां किया, जब शर्मा ने कहा कि, 'एक अधिकारी के तौर पर मेरा सिर्फ एक धर्म है, मेरी वर्दी'. हमारे देश में ऐसी मिसालें कम ही मिलती हैं, जब किसी मामले में कानून बाकी चीजों पर भारी पड़े. सत्ता में आने के बाद हर नेता खुद को राजा समझने लगते हैं.

दिक्कत सिर्फ बीजेपी सरकारों की नहीं है

10 अप्रैल को खबर आई कि यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्व मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ बलात्कार और अपहरण का केस वापस लेने का फैसला किया है. स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ ये केस एक लड़की ने दायर किया था, जो चिन्मयानंद के हरिद्वार के आश्रम में कई साल रही थी. इसी तरह, दिसंबर 2017 में योगी सरकार ने मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री समेत कई नेताओं के खिलाफ मुकदमे वापस लेने का फैसला किया था. साफ है कि मंत्री-मुख्यमंत्री, जो खुद को देश के नए बादशाह समझते हैं, और सत्ता के करीबी नेता, खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.

ये दिक्कत सिर्फ बीजेपी सरकारों की नहीं है. कमोबेश हर वो पार्टी जो सत्ता में रही है, वो यही करती है. कभी-कभी सत्ताधारी पार्टी कानून की धज्जियां इसलिए भी उड़ाती है कि उसे एक खास वोट बैंक को खुश करना होता है. 2012 में जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी, तो मशहूर लेखक सलमान रुश्दी को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं आने दिया गया. क्योंकि कई मुस्लिम संगठनों ने रश्दी को धमकी दी थी. हालांकि सलमान रुश्दी का दौरा बेहद गुप-चुप रखा गया था, फिर भी किसी ने इसकी खबर लीक कर दी. पुलिस ने सलमान रुश्दी को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए भी फेस्टिवल में आई जनता से रूबरू नहीं होने दिया. उस वक्त राजस्थान में राज कर रही कांग्रेस को लगा कि अगर सलमान रुश्दी ने वीडियो कांफ्रेंस से भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लिया, तो उसके मुस्लिम वोटर नाराज हो जाएंगे.

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पुलिस, न्यायपालिका और सरकार अक्सर सत्ताधारी दल के दबाव में काम करते हैं. वो तमाम धार्मिक और जातीय समीकरणों के दबाव में भी रहते हैं.

एक अप्रैल 2017 को अलवर के बेहरोर में गोरक्षकों ने पहलू खान को पीट-पीटकर मार डाला था. उस मामले के सभी आरोपी आज जमानत पर छूटे हुए हैं. ऐसे मामले ये संकेत देते हैं कि धार्मिक विवादों में गिरफ्तारी बहुत छोटी सी बात है. क्योंकि सत्ताधारी पार्टी आखिर में आरोपियों की मदद करेगी. इसका ये असर पड़ता है कि सत्ताधारी पार्टियां अपराधियों को बढ़ावा देती हैं. राजनैतिक और प्रशासनिक माहौल ऐसा बनता है, जिसमें कानून के राज पर अपराधी भारी पड़ते हैं.

pahlu khan

मौलाना मोहम्मद अनस कासमी अलवर की जामा मस्जिद के इमाम हैं. वहीं मौलाना मोहम्मद अमजद कासमी जो अलवर के ही जामिया अशरफुल उलूम मदरसे के प्रिंसिपल हैं. इन दोनों का ही ये कहना है कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की इमेज एक निरपेक्ष नेता की है. मुस्लिम वोटर भी इसका यकीन करते हैं. लेकिन हिंदू शक्ति वाहिनी जैसे संगठन पिछले कुछ सालों में राजस्थान के मेवात इलाके में काफी सक्रिय हो गए हैं. ये वसुंधरा राजे की छवि को नुकसान ही नहीं पहुंचा रहे, उनके निजाम को चुनौती भी दे रहे हैं.

अलवर में ठेकेदारी करने वाले बरकत अली कहते हैं कि देश में सभी राजनैतिक दल ज्यादा से ज्यादा वोट पाने के लिए खुलकर जाति और धर्म की राजनीति कर रहे हैं. ऐसे सियासी माहौल में धार्मिक संगठनों पर कार्रवाई के नाम पर मुख्यमंत्रियों के हाथ बंध जाते हैं.

हरियाणा में नौकरी में आरक्षण के लिए जाटों का आंदोलन हो या गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी पर हिंसा, दोनों ही घटनाओं में प्रदर्शनकारियों ने हिंसक प्रदर्शन से कानून के राज को बुरी तरह जख्मी कर दिया था. वजह ये थी कि इन दोनों ही आंदोलनों में प्रदर्शनकारियों को सियासी शह हासिल थी. भरतपुर के आरडी गर्ल्स कॉलेज में प्रोफेसर शैलेंद्र सिंह पूछते हैं कि, ‘आखिर क्या वजह रही कि इन आंदोलनकारियों ने हरियाणा में ही भारी नुकसान पहुंचाया, पंजाब में नहीं?’

सत्ताधारी दल ने सीबीआई का इस्तेमाल सियासी बदले के लिए किया है

शैलेंद्र सिंह इसमें चुने हुए जनप्रतिनिधियों की गलती मानते हैं. जब पद्मावत फिल्म पर रोक के लिए करणी सेना ने हिंसक प्रदर्शन किए. तो, उसके समर्थन में मध्य प्रदेश और राजस्थान की बीजेपी सरकारों ने फिल्म पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट तक में अर्जी दी. यानी इन राज्य सरकारों ने हिंसा करने वालों को ये संदेश दिया कि वो उनके साथ हैं. कठुआ और उन्नाव, रेप के दोनों ही मामलों में आरोपियों को बचाने में सत्ताधारी दल की मशीनरी का हाथ साफ दिखा.

जयपुर में मेरी बात राजस्थान पुलिस सेवा के एक सीनियर अधिकारी से हुई. वो कहते हैं कि सरकार और प्रशासन के हर विभाग, फिर चाहे वो न्यायपालिका हो, पुलिस हो, या सरकारी मशीनरी, हर जगह कानून के राज में सियासी दल अड़ंगा लगाते हैं. वो कहते हैं कि हर सत्ताधारी दल ने सीबीआई का इस्तेमाल सियासी बदले के लिए किया है.

जनता के बीच भी यही भावना है. पब्लिक को लगता है कि जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक, हर संस्था का दुरुपयोग होता है. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोता है. हालांकि, राजस्थान के पुलिस अधिकारी ये कहते हैं कि पुलिस अधिकारी अपने बनाए मानकों पर ही चलते हैं. वो भले ही सियासी दबाव में किसी आरोपी की मदद करते हों. मगर, वो किसी कातिल को नहीं बचाएंगे.

देश में कानून के राज में सबसे बड़ी बाधा हमारी हुकूमतों के काम करने का तरीका है, जो कई सालों में धीरे-धीरे उभरा है. इस पुलिस अधिकारी का कहना है कि हर पुलिसकर्मी अपनी इज्जत बचाने में लगा रहता है और कोई फैसला लेने में हिचकता है.

ये पुलिस अफसर, सलमान खान के काले हिरण के शिकार के केस का हवाला देते हैं. उनके मुताबिक, जज चाहते तो बॉलीवुड स्टार सलमान खान को बरी कर देते, या जमानत दे देते. लेकिन, निचली अदालत के जज ने बात हाईकोर्ट पर छोड़ दी. इसी तरह सरकारी अधिकारी और पुलिस के अधिकारी, किसी मुद्दे पर फैसले लेने के बजाय, मामले को टरका देते हैं. और फैसला सीनियर अधिकारी पर छोड़ देते हैं.

आपराधिक मुकदमों का तजुर्बा न होने के बावजूद बहुत से लोग जज बना दिए जाते हैं

जयपुर में एक सीनियर आईपीएस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कानून का राज कायम करने वाली तीनों संस्थाएं, पुलिस, सरकारी वकील और मुल्जिम के वकील और न्यायपालिका, तीनों ही अलग-अलग तरह का दबाव झेल रहे हैं. वो बताते हैं कि 1972 में अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से पुलिस और मुकदमा चलाने वाली संस्थाओं को अलग कर दिया गया. लेकिन, तब से सरकारी वकीलों में किसी को सजा दिलाने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखती. काबिल लोग सरकारी वकील बनना ही नहीं चाहते. वहीं बचाव पक्ष के वकील, अदालतों में अपने मुताबिक हेर-फेर का जुगाड़ खोजते रहते हैं. जब तक उनकी मर्जी की सुनने वाले जज नहीं आते, तब तक बचाव पक्ष के वकील मामला लटकाते रहते हैं.

इस अधिकारी का मानना है कि हमारे मौजूदा घटिया जांच के स्तर के बावजूद, मुल्जिमों को सजा दिलाना मुमकिन है. लेकिन सरकारी वकील और बचाव पक्ष के वकील अक्सर अदालत को ‘मैनेज’ करने की फिराक में लगे रहते हैं. पुलिस के नजरिए से देखें, तो तनख्वाह और दूसरी सुविधाओं में बढ़ोतरी के बावजूद न्यायपालिका में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद होता है. इससे देश के लोगों के बीच कानून के प्रति सम्मान और कानून का राज कायम करने में दिक्कत होती है. दूसरा मामला ये है कि आपराधिक मुकदमों का तजुर्बा न होने के बावजूद बहुत से लोग जज बना दिए जाते हैं.

इस पुलिस अधिकारी ने कहा कि, ‘जब तक आपराधिक मुकदमों की पैरवी करने वाले वकीलों को जज नहीं बनाया जाएगा, तब तक जज, कानून की बारीकियां कैसे समझेंगे?’ इस अधिकारी ने बताया कि आज की तारीख में ऐसे वकील हाईकोर्ट में ज्यादा जज बन रहे हैं जो इनकम टैक्स और सर्विस रूल से जुड़े मुकदमे करते रहे हैं.

इससे उच्च न्यायालयों में आपराधिक मामले सुनने वाले जजों की भारी कमी होती जा रही है. बहुत बार जज तो अपील पर फैसला इसलिए नहीं देते, क्योंकि उनके पास न समझ होती है, और न ही ऐसे मामलों का तजुर्बा होता है. उन्हें ये डर भी होता है कि कोई फैसला देंगे, तो सुप्रीम कोर्ट उसे रद्द कर देगा. इसी तरह बिना ट्रायल कोर्ट के तजुर्बे वाला जज जब हाईकोर्ट पहुंचता है, तो उससे अच्छे फैसलों की उम्मीद नहीं की जा सकती.

A view of the Indian Supreme Court building is seen in New Delhi

भारत में लोकतंत्र की सेहत आने वाले वक्त में बेहतर होगी, या और खराब होगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि इसमें सुधारों की शुरुआत होती है या नहीं. फिलहाल तो इस पुलिस अधिकारी के मुताबिक, पुलिस और न्यायपालिका में क्रांतिकारी सुधार की जरूरत है. हम कम वक्त में ऐसा कर भी सकते हैं. बशर्ते इसके लिए कोई टाइमलाइन तय की जाए. फिर भी कानून के राज पर राजनैतिक दलों का दबाव बना ही रहेगा.

इस बात की सख्त जरूरत है कि लोकतंत्र में राजनैतिक दलों के रोल को लेकर संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव लाया जाए. इस संवैधानिक संशोधन को संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

जब तक ऐसा नहीं होता, क्या तब तक कोई उम्मीद करनी चाहिए?

प्रोफेसर शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि आज की तारीख में केवल सुप्रीम कोर्ट और भारत का चुनाव आयोग ही ऐसी संस्थाएं हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं.

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