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डेमोक्रेसी इन इंडिया (पार्ट-16): क्या RSS और हिंदुवादी संगठनों की विविधता की परिभाषा वही है, जो लोकतंत्र में है?

जिस विविधता की आरएसएस और इसके जैसी विचारधारा वाले दूसरे हिंदू संगठन बात करते हैं, वो वही है जिसकी बात लोकतंत्र करता है?

Updated On: Sep 16, 2018 09:13 AM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

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डेमोक्रेसी इन इंडिया (पार्ट-16): क्या RSS और हिंदुवादी संगठनों की विविधता की परिभाषा वही है, जो लोकतंत्र में है?
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(संपादक की कलम से: भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य के तौर पर जल्द ही 70 साल का सफ़र पूरा कर लेगा. इस मौक़े पर वरिष्ठ पत्रकार तुफ़ैल अहमद देश के तमाम इलाक़ों में जाकर देश के लोकतंत्र का हाल परख रहे हैं. तुफ़ैल की कोशिश ये समझने की है कि लोकतंत्र ज़मीनी स्तर पर किस हाल में है. फ्रेंच लेखक एलेक्सिस डे टॉक्विल ने जिस तरह अमेरिका का दौरा कर के डेमोक्रेसी इन अमेरिका लिखा, इसी तरह बीबीसी के पूर्व पत्रकार तुफ़ैल, भारत में सामाजिक सच्चाईयों और लोकतंत्र के वायदों के संवाद को परख रहे हैं. फिलहाल, तुफ़ैल वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च से जुड़े हुए हैं. इस सफ़र के दौरान तुफ़ैल की कोशिश ये समझने की है कि एक आम भारतीय की ज़िंदगी पर लोकतंत्र ने कैसा और कितना गहरा असर डाला है. ये रिपोर्ट सीरीज़ की सोलहवीं किस्त है. इस सीरीज के बाकी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

बहुलता या विविधता, लोकतंत्र का अभिन्न अंग है. ये भारतीयता का भी अटूट हिस्सा रहा है. इसीलिए, लोकतंत्र में सरकारें भले बहुमत की हों, वो अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करती हैं. विविधता और परस्पर सहयोग की संरक्षक होती हैं. नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है. आरएसएस का दावा है कि वो भारतीय जीवन पद्धति का संरक्षक है. मैंने तय किया कि जिस विविधता की आरएसएस और इसके जैसी विचारधारा वाले दूसरे हिंदू संगठन बात करते हैं, वो वही है जिसकी बात लोकतंत्र करता है? विविधता का मतलब बराबरी भी होता है.

आरएसएस मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए बना रहा है पैठ

जब मैं गुजरात के सफ़र पर था, तब मैंने महसूस किया था कि विविधता के सिद्धांत के विपरीत आरएसएस की राजनीतिक शाखा यानी बीजेपी मुसलमानों को देश की राजनीति की मुख्यधारा से किनारे लगाने के लिए बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है. इस सीरीज़ की 11वीं किस्त में हमने इस बात का जिक्र किया था कि किस तरह नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान बीजेपी ने एक भी मुसलमान को गुजरात के चुनावों में टिकट नहीं देने की नीति पर अमल किया था. इस रणनीति के तहत बीजेपी खुद को हिंदुओं की पार्टी साबित करना चाहती थी. बीजेपी ने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भी इसी रणनीति पर अमल किया. अब अगर बीजेपी मुसलमानों को हाशिए पर धकेलने की नीति पर चल रही है, तो आखिर इसके मातृ संगठन आरएसएस ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए मुसलमानों के बीच पैठ बनाने की कोशिश क्यों शुरू की है?

मैं मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़े कई मुसलमानों से मिला हूं, जिन्हें ये मालूम ही नहीं कि ये संगठन संघ से जुड़ा है. नागपुर में मेरी मुलाकात विराग पचपुरे से हुई. वो मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अखिल भारतीय संयोजक हैं. उन्होंने बताया कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए आरएसएस एक 'तजुर्बा' कर रहा है. तजुर्बा मुसलमानों को ये समझाने का कि वो भारतीय समाज की मुख्यधारा का हिस्सा हैं. विराग कहते हैं कि, 'मुसलमानों के हिंदू होने की जरूरत नहीं है.'

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विराग पचपुरे के मुताबिक़ मुस्लिम राष्ट्रीय मंच इफ़्तार पार्टियां आयोजित करता है. वो अब 1857 के ग़दर में मुस्लिमों के योगदान का जश्न मनाने की योजना बना रहा है. एमआरएम ईद मिलन के कार्यक्रम भी आयोजित करता है. एमआरएम ने स्वतंत्रता सेनानी अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां के नाम पर एक ट्रस्ट भी बनाया है. ऐसे ही तमाम प्रयासों के तहत मुस्लिम राष्ट्रीय मंच एक ग़ैर सरकारी पेंशन योजना पर भी काम कर रहा है, जो वाराणसी, लखनऊ, जयपुर, रांची, नासिक और दूसरे शहरों में ट्रिपल तलाक़ पीड़ित मुस्लिम महिलाओं की मदद करेगा. विराग पचपुरे कहते हैं कि, 'भारत के मुसलमान बाहर से नहीं आए. वो मूल रूप से यहीं के बाशिंदे हैं. उन्हें ख़ुद को अल्पसंख्यक नहीं मानना चाहिए.'

एमआरएम का एक आयोजन रक्षा बंधन पर भी होता है. इस कार्यक्रम में हिंदू लड़कियां मुस्लिम भाइयों को राखी बांधती हैं. वहीं मुस्लिम लड़कियां हिंदू भाइयों को राखी बांधती हैं. विराग कहते हैं कि, 'हम मुसलमानों को तुलसी का पौधा लगाने के लिए प्रेरित करते हैं. एमआरएम के प्रयासों से पांच लाख मुस्लिम घरों में तुलसी के पौधे लगाए गए हैं.' विराग कहते हैं कि क़ुरान में भी रेहन यानी तुलसी की ख़ूबियों का बखान है. मैंने विराग से कहा कि आम मुसलमानों से ज़्यादा तो आप क़ुरान पढ़ते हैं. रेहन का ज़िक्र क़ुरान की आयतों 56:89, 55:12 और शायद कुछ और आयतों में भी है. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सभी आयोजनों का आग़ाज़ क़ुरानख़्वानी से होता है.

मैं जब भी आरएसएस के स्वयंसेवकों से मिलता हूं, उनकी विनम्रता से प्रभावित होता हूं. विराग पचपुरे की ईमानदारी आप का दिल जीत लेगी. वो कहते हैं, 'मुसलमानों के प्रति मेरे भी ज़हन में कई पूर्वाग्रह थे. लेकिन जब मैं मुसलमानों से मिला, तो मेरी सोच बदल गई. जब मेरी बीवी बीमार पड़ी, तो उसके लिए एक मुस्लिम ने काबा में दुआ मांगी'. विराग बताते हैं कि, 'ये मुसलमानों की ही ज़िम्मेदारी है कि वो इस्लाम का मानवीय चेहरा पेश करें.' मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़े क़रीब दस लाख मुसलमानों ने गोकशी के ख़िलाफ़ क़ानून लाने की मांग पर दस्तख़त किए हैं.

'आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे.'

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की शुरुआत 2002 में हुई थी. आज की तारीख़ में एमआरएम से 200 से ज़्यादा मुस्लिम नेता जुड़े हैं. इसका सूत्र वाक्य है, 'आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे.' संगठन के तौर पर ये देश के 285 ज़िलों में सक्रिय है. अगर हर ज़िले में एक भी मुसलमान एमआरएम से जुड़ा है तो इसके ज़रिए आगे चलकर संघ एक अलग तरह का बौद्धिक आंदोलन मुस्लिम समुदाय के बीच में छेड़ने में कामयाब होगा. स्वतंत्र समाज में कोई भी सामाजिक बदलाव ऐसे ही शुरू होना चाहिए.

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हालांकि एक बुनियादी सवाल फिर भी रह जाता है. अगर संघ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में यक़ीन रखता है. देश की विविधता का सम्मान करता है, तो इसी से जुड़े हिंदूवादी संगठनों जैसे बजरंग दल के मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रहों के पीछे कौन है? आख़िर बजरंग दल उसी व्यवस्था का हिस्सा है, जिसमें मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का जन्म हुआ है. बीजेपी जिस तरह से मुसलमानों को मुख्यधारा की राजनीति से हाशिए पर धकेलने की राजनीति कर रही है, आरएसएस का उस बारे में क्या विचार है? किसी भी समुदाय को अलग-थलग करना, उसके प्रति पूर्वाग्रह, भेदभाव और नफ़रत की दिशा में पहला क़दम होता है. ये शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और विविधता के ख़िलाफ़ है. ट्विटर पर युवा मुझसे पूछते हैं: बीजेपी को आख़िर मुसलमानों को टिकट क्यों देना चाहिए? इसके बरक्स सवाल पूछे जाते हैं कि: मुसलमान आख़िर बीजेपी को क्यों वोट दें?

5 जुलाई को मैंने आरएसएस के पूर्व प्रवक्ता एमजी वैद्य से नागपुर में लंबी बातचीत की. वैद्य की उम्र 95 साल है, यानी वो संघ से भी ज़्यादा उम्रदराज़ हैं. मैंने वैद्य से कहा कि बीजेपी एक ख़ास रणनीति के तहत मुसलमानों को अलग-थलग कर रही है. हालांकि वैद्य ये बात मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि उनकी नज़र में मुसलमान हिंदुत्व से अलग नहीं हैं. एमजी वैद्य ने पूछा: कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है? मैंने कहा कि प्रतीकात्मक तौर पर कुछ मुसलमानों को मंत्री बनाया गया है. लेकिन एक नीति के तौर पर बीजेपी ने हाल के दिनों में मुसलमानों को विधानसभा चुनावों में टिकट नहीं दिए हैं. पार्टी में एक भी सांसद विधायक मुसलमान नहीं.

एमजी वैद्य कहते हैं कि, 'मुझे पता नहीं. देना चाहिए. मुझे पसंद नहीं, बाक़ी लोगों का नहीं मालूम.' एमजी वैद्य एक संपादक, विधायक और लेक्चरर भी रहे हैं. वो कहते हैं कि अब वो बहुत सफ़र नहीं कर पाते. शायद यही वजह है कि उन्हें इन बातों की ख़बर नहीं है. जब मैंने उन्हें बताया कि मोदी के राज में बीजेपी ने गुजरात में एक भी मुसलमान को न तो संसद के चुनाव का और न ही विधानसभा के चुनाव का टिकट दिया. तब वैद्य ने कहा कि, 'वो हिंदुओं को संकुचित कर रहे हैं.'

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अगर विविधता में विश्वास तो राजनीति में अलग-थलग क्यों?

एमजी वैद्य कहते हैं कि, 'विभिन्न धर्मों की विविधता ही भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है. हिंदुओं के लिए राज्य धर्मनिरपेक्ष है. हर्षवर्धन के राज में बौद्ध और ब्राह्मण एक साथ थे.' वैद्य जिस बहुलता या विविधता और साझी विरासत की बात करते हैं, वो भारतीय सभ्यता के मूल में है. हिंदू-मुस्लिम विवाद को लेकर उनकी गहरी समझ है. वैद्य कहते हैं कि, 'आप को दूसरे धर्मों के अस्तित्व को मानना होगा. ये भारतीय सभ्यता का मूल सिद्धांत है. जो ये मानता है वो संघ के हिसाब से हिंदू है.' यहां ध्यान देने वाली बात है कि इस्लाम को दूसरे धर्मों का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है.

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अब अगर आरएसएस वाक़ई भारत की अनेकता में यक़ीन रखता है, तो बीजेपी का मुसलमानों को राजनीति की मुख्यधारा से अलग-थलग करने की वजह संघ को ही समझानी होगी और इसे ख़त्म करने का काम भी आरएसएस की ही ज़िम्मेदारी है. या फिर आगे चलकर ये मुसलमानों के प्रति नस्लवादी सोच और कट्टर दक्षिणपंथ को जन्म देगा. इस साल चार मई को वडोदरा में मेरी मुलाक़ात गुणवंत शाह से हुई थी. वो गुजरात के जाने-माने लेखक हैं, जिन्होंने 35 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं. जब मैं उनसे मिलने पहुंचा तो वो हाल ही में नई दिल्ली में हुई एक बैठक में शामिल होकर लौटे थे. इस बैठक की अध्यक्षता पीएम मोदी ने की थी. बैठक में महात्मा गांधी की 150वीं सालगिरह मनाने को लेकर चर्चा हुई थी.

मैंने उनसे मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी की मुसलमानों को अलग-थलग करने की नीति पर सवाल पूछा. गुणवंत शाह ने कहा कि उन्होंने कई बार मुसलमानों को सियासी तौर पर हाशिए पर धकेलने का विरोध किया है. शाह कहते हैं कि वो 'कांग्रेस मुक्त भारत' जैसे नारों के भी हक़ में नहीं है. उन्हें मोदी के अहमद पटेल को 'अहमद मियां पटेल' कहे जाने से भी ऐतराज़ है. जिसमें 'मियां' संबोधन को मुसलमानों को निशाने पर लेने के लिए ख़ास तौर से इस्तेमाल किया जाता है. अहमद पटेल गुजरात में कांग्रेस के अहम मुस्लिम चेहरे हैं. गुणवंत शाह कहते हैं कि, 'कांग्रेस ने ही लोकतंत्र की ज़मीन तैयार की, वरना मोदी नहीं जीत पाते. किसी भी समुदाय को हाशिए पर धकेलना देश को एक सूत्र में पिरोने के ख़िलाफ़ है.'

इसी तरह अलग-थलग करना साथ-साथ रहने की सोच के ख़िलाफ़ है. शाह कहते हैं कि भारत में आज सह-अस्तित्व को 'बुज़दिली' बना दिया गया है. वो हिंदू-मुस्लिम कट्टरपंथ की भी मुख़ालफ़त करते हैं. मुसलमानों के बहिष्कार के बारे में गुणवंत शाह का कहना है कि, 'बीजेपी के लोग उतने सहिष्णु नहीं हैं, जितना असल में होना चाहिए. बीजेपी के लोगों में धर्मांधता है. उन्हें लोकतंत्र की समझ नहीं है.' जब मैंने गुणवंत शाह से ये पूछा कि जिस तरह बीजेपी जान-बूझकर मुसलमानों का बहिष्कार कर रही है, तो आगे चलकर इसके क्या नतीजे होंगे, तो शाह कहते हैं कि, 'समाज बंट जाएगा. अगर मैं मोदी होता, तो गुजरात की 27 लोकसभा सीटों में से दो सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देता.'

बीजेपी खुद एकजुटता के खिलाफ

आरएसएस, बीजेपी और दूसरे हिंदूवादी संगठन, मुसलमानों पर देश की मुख्यधारा से अलगाववाद का आरोप लगाते हैं. वो मुसलमानों पर मुख्यधारा में शामिल होने का दबाव बनाते हैं. लेकिन, ख़ुद बीजेपी जो कर रही है, वो एकजुटता के ख़िलाफ़ है. मुसलमानों को मुख्यधारा में आने से रोकता है. ये वो हालात है कि जिसमें लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत, यानी विविधता को ख़तरा है. गुजरात में बीजेपी सरकार ने कांग्रेस के ज़माने के अशांत क्षेत्र क़ानून का दायरा बढ़ा दिया है. इसके चलते आज मुसलमान, हिंदू इलाक़ों में संपत्ति नहीं ख़रीद सकते. वहीं, हिंदू भी मुस्लिम इलाक़ों में संपत्ति नहीं ख़रीद सकते. इस बात की चर्चा हमने इस सीरीज़ की 12वीं किस्त में की थी.

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आरएसएस जैसे एक संगठन का ये दावा भी विविधता के ख़िलाफ़ है कि वो भारत की विविधता भरी पहचान का प्रतिनिधि है. ये लोकतंत्र के भी ख़िलाफ़ है. संघ के इस दावे का तो मतलब ये है कि संघ नया चर्च है. जैसे यूरोप में कभी चर्च का बोलबाला था और मोहन भागवत इसके नए पोप हैं. इस मामले में हिंदुत्व को एकरूपी बताना ही विविधता के ख़िलाफ़ है. भले ही आज हिंदू समुदाय इस बात को न समझ पा रहे हों. शायद बहुल हिंदुत्व कहना ज़्यादा ठीक होगा. आज एकात्मक हिंदुत्व की जिस विचारधारा की बात की जा रही है, इसकी शुरुआत यूरोप में राष्ट्र के सिद्धांत के जन्म के साथ हुई थी. आज ये विचार भारत में भी गहरी जड़ें जमा चुका है.

मैंने नागपुर में दो लेखकों से भी मुलाक़ात की, जिन्होंने आरएसएस पर किताबें लिखी हैं. नागपुर के रहने वाले आरएच तुपकरे ने मेलबर्न यूनिवर्सिटी से एमटेक की पढ़ाई की है. वो आधी सदी से भी ज़्यादा वक़्त से संघ से जुड़े रहे हैं. वहीं, दूसरे लेखक जयदेव डोले, औरंगाबाद के रहने वाले हैं और एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. मैंने उनसे प्लूरलिज़्म यानी बहुलता और अलगाव यानी बहिष्कार को लेकर बात की. तुपकरे का कहना है कि, 'अगर एक मुसलमान, बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ता है, तो कांग्रेस और बीजेपी में फ़र्क़ ही क्या है?' वो कहते हैं कि बीजेपी का मुसलमानों का बहिष्कार, व्यवहारिक राजनीति की मजबूरी है. वहीं जयदेव डोले कहते हैं कि, 'संघ का जन्म महात्मा फुले के ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के जवाब के तौर पर हुआ था. आरएसस के विचार में समता है ही नहीं.'

जब मैं विराग पचपुरे से मिलकर जाने लगा तो उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की छोटी-छोटी कोशिशों से उम्मीद बंधी है कि आगे चलकर मुसलमान मुख्यधारा में शामिल होंगे. सामाजिक विज्ञान में दो सिद्धांत हैं. एक तो है समावेश और दूसरा है उत्संस्करण. समावेश का मतलब है किसी एक समुदाय का दूसरे समुदाय के रहन-सहन में समाहित होना. इस प्रक्रिया में अक्सर अल्पसंख्यक समुदाय, बहुसंख्यक जीवनशैली को अपना लेता है और अपनी अलग पहचान को ख़त्म कर लेता है. इस्लाम के धर्मगुरू यही करते हैं. वो गैर-मुसलमानों को इस्लाम की सोच और जीवनशैली में समाहित कर लेते हैं. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के ज़रिए संघ भी यही करना चाहता है. समावेश का मतलब है धर्मांतरण या जैसा कि हिंदूवादी संगठन कहते हैं- मुसलमानों की 'घर वापसी'.

इसके बरक्स उत्संस्करण का मतलब है, संस्कृतियों का मेल, जिससे एक नई संस्कृति पैदा हो. इसमें शामिल सभी समूह अपनी ख़ास पहचान के साथ-साथ दूसरों की पहचान को भी अपनाएं. विविधता, भारतीय सभ्यता का अटूट अंग है. लेकिन जिस समावेश की बात संघ करता है, वो विविधता नहीं है. बहुलता की आरएसएस की परिभाषा लोकतांत्रिक विविधता से अलग है. आज भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने एक स्वायत्त रूप ले लिया है. हो सकता है कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी उत्संस्करण के रास्ते पर चले, न कि आरएसएस के समावेशी विचार के तहत. हो सकता है कि आगे चलकर संघ की सोच में भी बदलाव आए. क्योंकि लोकतंत्र देश की नई पीढ़ी की सोच बदलने में अहम भूमिका निभा रहा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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