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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट-1: देश में कैसे हुई धर्म-जाति के नाम पर लोगों को बांटने वाली राजनीति की शुरुआत

सत्ता के लिए अपने लालच के चक्कर में, कमोबेश सभी सियासी दलों ने जात-धर्म की राजनीति और इस पर आधारित संघर्ष को बढ़ावा दिया है

Updated On: Apr 24, 2018 01:27 PM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

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डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट-1: देश में कैसे हुई धर्म-जाति के नाम पर लोगों को बांटने वाली राजनीति की शुरुआत

(संपादक की ओर से- भारत गणराज्य अपने 70 बरस पूरे करने जा रहा है. ऐसे वक्त में पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफैल अहमद ने शुरू किया है, भारत भ्रमण. इसमें वो ये पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं कि देश में लोकतंत्र जमीनी स्तर पर कैसे काम कर रहा है. तुफ़ैल अहमद को इसकी प्रेरणा फ्रेंच लेखक एलेक्सिस डे टॉकविल से मिली. जिन्होंने पूरे अमेरिका में घूमने के बाद 'डेमोक्रेसी इन अमेरिका' लिखी थी. तुफ़ैल अहमद इस वक्त वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं. वो भारत भ्रमण के अपने तजुर्बे पर आधारित इस सीरीज में भारत की सामाजिक हकीकत की पड़ताल करेंगे. वो ये जानने की कोशिश करेंगे भारत का समाज लोकतंत्र के वादे से किस तरह मुखातिब हो रहा है और इसका आम भारतीय नागरिक पर क्या असर पड़ रहा है. तुफ़ैल की सीरीज़, 'डेमोक्रेसी इन इंडिया' की ये पहली किश्त है.)

लोकतंत्रों का एक बुनियादी उसूल है- वो ये कि समुदाय पर किसी नागरिक को तरजीह दी जाती है. लेकिन दो अप्रैल को पूरे देश के दलितों के बुलाए भारत बंद, और बंद के अगले दिन यानी तीन अप्रैल को राजस्थान के एक पूर्व और एक मौजूदा दलित विधायकों के घर जलाने की घटनाएं इस बात की मिसाल हैं कि देश में जाति की राजनीति को लेकर कितनी तनानती है. ये घटनाएं ये भी बताती हैं भारत में लोकतंत्र ने आम नागरिक पर समुदायों को तरजीह दी है. ऐसा लगता है कि भारत में संविधान लागू होने के करीब 70 साल बाद भी देश में जाति और धर्म की राजनीति ने नागरिकों को गुलाम बना रखा है. इस अंधेरी राह का का कोई अंत नहीं दिखता.

हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मजहबी बंटवारा

भारत का संविधान बनाने वालों ने लोकतंत्र में राजनैतिक दलों की संवैधानिक भूमिका के बारे में कुछ नहीं लिखा. फिर भी कुछ नियमों और भारत के चुनाव आयोग के तहत देश में तमाम राजनैतिक दल उभरे. सत्ता के लिए अपने लालच के चक्कर में, कमोबेश सभी सियासी दलों ने जात-धर्म की राजनीति और इस पर आधारित संघर्ष को बढ़ावा दिया है. भारतीय जनता पार्टी ने आम भारतीयों को मजहबी आधार पर बांटने के लिए हिंदुत्व की खोज कर ली. वहीं तथाकथित सेक्युलर पार्टियों ने लूली-लंगड़ी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मजहबी बंटवारे को बढ़ावा दिया.

तमाम सियासी दल भारतीयों में फूट डालने के लिए जाति की राजनीति करते हैं. हाल ही में मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी की सरकारों ने क्षत्रिय वोट बैंक के लिए सुप्रीम कोर्ट में इस बात की अर्जी दी कि बॉलीवुड फिल्म पद्मावत पर पाबंदी लगा दी जाए. इस तरह इन सरकारों ने करणी सेना नाम के जातीय संगठन को बढ़ावा दिया.

Protest against the release of Padmaavat in Patna

भोपाल के स्वामी विवेकानंद केंद्र के राम भुवन सिंह कुशवाह कहते हैं: 'आजादी के बाद भारत में जातिवाद खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारत में ऐसी राजनीति हो रही है, जिससे जातिवाद खत्म होने के बजाय और मजबूत हो रहा है. नेता आम भारतीयों को जातियों में बांट रहे हैं'. कुशवाह से मेरी बातचीत, 2 अप्रैल को दलितों के भारत बंद के चार दिन पहले हुई थी. कुशवाह कहते हैं कि, 'हाल ये है कि आज भी कोई दलित बिना सवर्ण जातियों के सहयोग के प्रधानमंत्री नहीं बन सकता. प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी भी सियासी दल के नेता को ऊंची जाति के नेताओं के सहयोग की जरूरत होगी'. कुशवाह के कहने का मतलब ये है कि भारतीय समाज में जातिवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि लोकतंत्र इसे मिटाने में नाकाम रहा है. वो कहते हैं कि, 'व्यक्ति बलवान नहीं हुआ है, जातीय समीकरण बलवान हुआ है'.

1970 से शुरू हुई जाति और धर्म की राजनीति

वैसे हमेशा से ऐसा नहीं था. संविधान के लागू होने के पहले दो दशकों में राजनैतिक दलों में दलितों, आदिवासियों या अल्पसंख्यकों के नाम पर मोर्चे नहीं थे. राम भुवन सिंह कुशवाह बताते हैं कि 1970 के दशक से पहले गैर-कांग्रेसी दलों ने जाति और धर्म के नाम पर मोर्चे बनाने शुरू किए. वो याद करते हैं कि 1970 के दशक में जब बीजेपी के पूर्ववर्ती जनसंघ ने जाति आधारित मोर्चे बनाने शुरू किए, तो पार्टी के भीतर ही इसका विरोध हुआ. लेकिन आज जनसंघ की वारिस बीजेपी ने स्थायी तौर पर पार्टी के भीतर जाति और धर्म के आधार पर तमाम मोर्चे बना लिए हैं. जनसंघ के इस कदम के जवाब में कांग्रेस ने भी एससी/एसटी और अल्पसंख्यक मोर्चे बनाए. कुशवाह कहते हैं कि 70 के दशक से पहले पार्टियों में ऐसे मोर्चे नहीं होते थे. बल्कि सरकार में ही जाति और धर्म के आधार पर सेल बनी हुई थीं.

2 अप्रैल को दलितों के भारत बंद के दौरान मध्य प्रदेश के ग्वालियर में कम से कम 8 लोग मारे गए थे. बंद के दो दिन बाद तक वहां कर्फ्यू लगा रहा था. इसी जिले में तैनात मध्य प्रदेश सरकार के एक सीनियर आईएएस अधिकारी ने बंद से पहले मुझसे बातचीत में कहा था कि, 'हम सरकार में किसी समुदाय को नागरिक के ऊपर तरजीह नहीं देते. लेकिन ऐसी चीजें भारतीय राजनीति का हिस्सा हैं और आम तौर पर होती ही हैं'. इस अधिकारी का तर्क ये था कि ज्यादातर सरकारी नीतियों का मकसद आम नागरिक को सुविधाएं देना होता है, किसी खास समुदाय को नहीं.

वैसे ये तर्क तो सही है. लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सरकार चलाने वाले ये तमाम समुदायों को बढ़ावा देते हैं, ताकि उनकी पार्टी चुनाव जीत सके. मध्य प्रदेश में ही, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अक्सर घरों में काम करने वाली महिलाओं, हज्जामों, रिक्शा चलाने वालों, और दलित-आदिवासी छात्रों के साथ बैठकें करते रहते हैं. ऊपरी तौर पर तो ये सब पेशेवर लोग लगते हैं. लेकिन भारत की तल्ख सामाजिक हकीकत ये भी है कि ये सारे पेशे खास जातियों के लोग ही अपनाते हैं. इसका मतलब ये है कि इस बात की उम्मीद न के बराबर है कि कोई ब्राह्मण बाल काटने या नौकर का काम करेगा. मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई हिस्सों में निचली जाति के दूल्हे को घोड़ी चढ़कर बारात जाने की आज भी इजाजत नहीं है.

BJP

खुलकर हो रही है जाति-धर्म की राजनीति

भारत के लोकतंत्र ने भले ही अपने सफर के सात दशक पूरे कर लिए हों, मगर आज भी जाति और पेशे के बीच नाता नहीं टूटा है. ये हकीकत है कि तमाम सियासी दल ऐसे सामाजिक बंटवारे का फायदा उठाकर सत्ता हासिल करते रहेंगे. खुद को 'पार्टी विद डिफरेंस' कहने वाली बीजेपी आज खुलकर जाति और धर्म की राजनीति करती है. दलितों और ऊंची जातियों को एकजुट करने की बीजेपी की कोशिश, असल में उसकी हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ एकजुट करने की मुहिम है.

जाति और राजनीति के इस घालमेल को बीजेपी ने कांग्रेस से सीखा है. अब कांग्रेस इस खेल को दोबारा बीजेपी से ही सीखने की कोशिश कर रही है. भारत में जाति-धर्म की ऐसी राजनीति अभी आने वाले लंबे वक्त तक चलने वाली है. भारतीय लोकतंत्र में आम नागरिक का निजी व्यक्तित्व हार चुका है. भारतीयों की अगली पीढ़ी, 21वीं सदी में पैदा हुए और पहली बार वोट डालने वाले मतदाता हार चुके हैं. जिन युवाओं के पास रोजगार नहीं हैं, वो आज सियासी दलों के हाथों के मोहरे बन गए हैं.

ऐसे में क्या आगे कोई उम्मीद है?

अब ऐसी चर्चा शुरू होनी चाहिए, जिसमें राजनैतिक दलों को जवाबदेह बनाया जा सके. इसके लिए संविधान के बुनियादी ढांचे के तहत विधान बनाने की जरूरत है.

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