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दिल्ली में नशे की लत पार्ट 2: नशेबाजों का इलाज कीजिए, दिल्ली में अपराध घट जाएंगे!

एक अच्छाई हर नशेड़ी के जेहन में दम तोड़ रही है और इस अच्छाई को एक बेहतर जिंदगी देने के लिए जरूरी है कि हम नशे की चीजों और उससे जुड़े अपराध-कर्म के बीच का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म कर दें

Updated On: Nov 16, 2017 03:50 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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दिल्ली में नशे की लत पार्ट 2: नशेबाजों का इलाज कीजिए, दिल्ली में अपराध घट जाएंगे!

अगर फैसला लेने में चूक हुई तो कहा जाता है आपने अपराध किया लेकिन अपराध की मानसिकता का रिश्ता सामाजिक-आर्थिक ढांचे से है, जिसमें गरीबी, भुखमरी और भारी आर्थिक गैर-बराबरी बिना किसी समाधान के जारी रहते हैं. आप गूगल पर देश की राजधानी दिल्ली में हत्या और बलात्कार के बारे में एक झटपट सर्च कीजिए और आपको सिलसिलेवार ऐसी न्यूज-रिपोर्ट नजर आएगी, जिसमें न्यू सीलमपुरी और सुल्तानपुरी का जिक्र होगा.

ये सभी नशे के अड्डे हैं. आखिर सरकार यहां ऐसे ढांचे क्यों नहीं खड़े करती कि मर्द-औरत नशे की लत के शिकार होने से पहले ही उससे उबर जाएं और नशे की वजह से जो अपराध होते हैं उन्हें सिर उठाने का मौका ही ना मिले?

'मैं निर्भया के बलात्कारियों से जेल में मिल चुका हूं और मैं आपको बता सकता हूं कि वे नशे की लत के शिकार रहे हैं. उन बलात्कारियों में एक की स्कूली पढ़ाई छूट गई और वह सात साल की उम्र में ही नशा करना सीख गया. जब तक हम यह नहीं समझते कि नशे का आदी हो चुका व्यक्ति किसी के लिए भी खतरा बन सकता है तब तक नशेड़ियों से अपने को बचाना मुश्किल बना रहेगा. उन्हें प्यार या सहानुभूति मत दीजिए, लेकिन आपने उन पर ध्यान नहीं दिया तो फिर खतरा हम सबको है.'

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ये बात बताई विनय ने. विनय तिहाड़ जेल के वार्ड नंबर 3 में कैदियों के बीच नशा-मुक्ति के मसले पर काम कर चुका है. उसने फर्स्टपोस्ट से अपनी बातचीत में खुलकर कहा, ' लोग सोचते हैं कि यौन-अपराध पैसों के लिए नहीं होते सो इसका नशे की लत से कोई रिश्ता नहीं है लेकिन यह बात सच नहीं है. नशा करने से मन में बुरे ख्याल आते हैं, बेचैनी, चिंता और हड़बड़ाहट बढ़ जाती है. क्या कदम उठा रहे हैं, इसका होश नहीं रहता और नशेड़ी को ऐसे अविचारित काम करने में मजा भी आता है.' विनय की इन बातों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि तिहाड़ जेल की महफूज सींखचों के भीतर बंद कैदियों के जेहन में कैसे ख्याल उठते हैं.

विनय चरित्र-निर्माण सेवादार ट्रस्ट चलाता है और उसका कहना है, 'तिहाड़ जेल के लगभग 16000 कैदियों में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा कैदी गांजा, स्मैक या शराब के आदी हैं. चरित्र निर्माण सेवादार ट्रस्ट एक एनजीओ है जो नशा छुड़ाने और सामाजिक सुधार के काम करता है.

विनय ने नशे के सामान बेचने वाले एक साठ साल की उम्र के व्यक्ति का उदाहरण दिया जिससे उसकी भेंट जेल में हुई थी. इस व्यक्ति ने विनय को बताया था कि वह चालीसवीं दफे जेल में आया है और किशोर उम्र से ही उसका जेल में आना-लगा हुआ है. किशोर उम्र में उसे गांजे की लत लग गई थी. 'जेल में बहुत से कैदी अवसाद और अनिद्रा की बीमारी से पीड़ित हैं. इन्हें नियम के मुताबिक नींद की गोली देने का चलन है लेकिन वह कारगर नहीं.'

विनय को लगता है कि अवसाद में डूबे कैदियों से बातचीत करने के लिए ज्यादा तादाद में काउंसलर भेजे जाने चाहिए और कैदियों को अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करने का मौका मिलना चाहिए, 'कैदी खुशी में भी अकेला है और गम में भी'. विनय ने नशे की लत की परिभाषा देते हुए कहता है कि जेल में सिर्फ यही वो जरिया है जिसके सहारे कैदी अपनी भावनाओं से निजात पाते हैं.

मादक वस्तुओं और अपराध की जुगलबंदी छुटपन के दिनों से ही शुरू हो जाती है. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन नशेबाज रोहित और इरफान का एक तरह से घर हुआ करता था. दोनों यहां चेन की छिनैती और पॉकेटमारी किया करते थे. ये दोनों अब स्टेशन से दूर बच्चों के एक नशामुक्ति केंद्र में रहते हैं और छिटपुट चोरी के अपने पिछले दिनों को याद करते हुए दोनों ने बताया कि नशे के लिए खूब चोरी करते थे.

ज्यादातर बेघर बच्चे काम की तलाश में स्टेशन पर आते हैं और नशे के चंगुल में फंस जाते हैं. चेतना( चाइल्डहुड इन्हेन्समेंट थ्रू ट्रेनिंग एंड एक्शन) के निदेशक संजय गुप्ता ने बताया, 'दिल्ली के बड़े रेलवे स्टेशनों पर कम से कम 200 नशेड़ी बच्चों का अड्डा हैं. ये बच्चे ट्रेन से ज्यादातर बोतल, अल्युमिनियम के पत्थर और कार्डबोर्ड इकट्ठा करते हैं और फिर इनको बेचने से हासिल 200-300 रुपए नशे की चीजों पर खर्च कर देते हैं.'

'चेतना' निजामुद्दीन पुलिस थाने के भीतर बच्चों के लिए एक अनौपचारिक मनोरंजक घर चलाता है. इसका मकसद पुलिस और नशे तथा अपराध के चंगुल में फंसे होने की आशंका वाले बच्चों के बीच दोस्ताना रिश्ता कायम करना है. संजय ने बताया, 'रेलवे स्टेशन पर रहने वाले बच्चे दो वजहों से अपनी कमाई हुई रकम नशे की चीजों पर खर्च करते हैं. एक तो वे अपना पेट ट्रेन में छूटे-फटके भोजन के मार्फत भरते हैं सो कमाई हुई राशि रात में उनके पॉकेट में बची रहती है, दूसरे अगर वे यह रकम अपनी जेब में बचाकर रखें तो इस बात की आशंका रहेगी कि रात में सोए होने पर संगी-साथी उसे चुरा लेंगे. सो, इन बच्चों को अपना पैसा नशे की चीजों जैसे पंक्चर(सॉल्यूशन) और उजले रंग के द्रव्य पर खर्च करना सुरक्षित लगता है.'

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प्रतीकात्मक तस्वीर

नशे की लत और अपराध का रिश्ता बड़ा मजबूत है. नवज्योति फाऊंडेशन की संस्थापक और अब पुदुच्चेरी में लेफ्टिनेंट गवर्नर किरन बेदी ने फर्स्टपोस्ट से अपनी बातचीत में नशे और अपराध के इस रिश्ते को तोड़ने के संभावित तरीके के बारे में बताया.

ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल किरन बेदी ने कहा, 'सप्लाई लाइन(आपूर्ति का जरिया) काटने की जरूरत है. सप्लाई लाइन ही व्यवस्था में खलल पैदा करती है. हमें सप्लाई लाइन को खोजने की दिशा में काम करने की जरूरत है. सामुदायिक निगरानी और मुखबिरी को मजबूत बनाकर हमें उस जरिए को ही सूखा देने की जरूरत है जहां से नशे की चीजें समाज में फैलती हैं.'

किरन बेदी के मुताबिक समस्या के समाधान का सबसे पहला निर्णायक कदम है किसी जगह पर चल रहे नशे की चीजों के व्यापार पर मुखबिरी से हासिल सूचनाओं के सहारे अंकुश लगाना. दूसरा कदम है, नशे के चंगुल में फंसे लोगों का सुधार करना. बेदी के मुताबिक, 'नशा मुक्ति केंद्रों में आए लोगों को हुनर सिखाया जाना चाहिए ताकि वे अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा में लगा सकें और परिवारीजनों को चाहिए कि कोई नशेड़ी जबतक नशामुक्ति केंद्र में है तबतक वे उसके लिए वहां भोजन लेकर आएं.'

क्या दिल्ली में इतने प्रशिक्षित मनोचिकित्सक हैं कि वे अपराधी मनोभाव वाले लोगों की सोच का रुख दूसरी दिशा में मोड़ सकें ? इस सवाल का उत्तर है- ना. दिल्ली एड्स कंट्रोल सोसायटी(डीएसीएस) ने मार्च 2017 के अपने एक प्रेजेन्टेशन(प्रस्तुति) में मनोचिकित्सकों और प्रशिक्षित लोगों की तादाद में कमी के तथ्य पर ध्यान दिलाया था. यह प्रेजेंटेशन दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में नवगठित इंटरसेक्टोरल समिति के लिए किया गया था.

समिति का गठन नशे की लत पर रोकथाम और नशे के चंगुल में पड़े लोगों को इस लत से छुड़ाने के लिए व्यापक उपाय सुझाने के लिए किया गया है. डीएसीएस ने सुझाव दिया कि दिल्ली सरकार की 260 डिस्पेंशरियों में काम करने वाले 400 से ज्यादा मेडिकल ऑफिसर तथा दिल्ली सरकार के 32 अस्पतालों में काम कर रहे 150 विशेषज्ञों को इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अप्लॉयड साइंस में लंबी अवधि की एक योजना के तहत प्रशिक्षण दिया जाए.

प्रेजेंटेशन में इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया गया कि दवा की दुकानों में बिकने वाली नशीली दवाइयों की खरीद पर नजर रखने की जरूरत है और दवा-दुकानदारों से कहा जाए कि वे नशीली दवाइयां कम मात्रा में रखें. प्रजेंटेशन में यह भी कहा गया कि पिछले साल 20 दवा की दुकानों के लाइसेंस रद्द किए गए.

दिल्ली पुलिस की नारकोटिक्स शाखा भी इस साल के शुरुआती महीनों में बनी इंटरसेक्टोरल समिति में शामिल है. नारकोटिक्स शाखा ने भी बीते सितंबर महीने में एक प्रजेंटेशन दिया था. इसमें ध्यान दिलाया गया कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के अंतर्गत पुलिस को बड़ी सीमित भूमिका में रखा गया है. एक्ट के अंतर्गत शामिल मामलों का पुलिस तभी संज्ञान ले सकती है जब ड्रग इंस्पेक्टर इस बाबत शिकायत करे.

हालांकि हाल के समय में इस एक्ट में एक सेक्शन 36एसी को जोड़ा गया है लेकिन तब भी पुलिस की भूमिका मिलावटी तथा नकली दवाइयों की खरीद-बिक्री के मामले तक ही सीमित है.

दिल्ली पुलिस ने समिति के सामने स्वीकार किया कि नशे की चीजों की मांग के बारे में उसके पास जमीनी आंकड़े नहीं है और सामान्य आकलन और जब्ती के आधार पर पुलिस ने नशे की चीजों को अग्रलिखित क्रम में दर्ज किया है: गांजा, पोस्ता, अफीम, हिरोइन, चरस, मादक औषधि तथा कोकीन. दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि 2017 के सितंबर महीने तक 239 मामले दर्ज किए गए और 311 लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

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नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के दिल्ली जोन की यूनिट भी इंटरसेक्टोरल कमिटी में शामिल है. इस यूनिट ने समिति को बताया कि मामले से जुड़े पक्ष जैसे पुलिस, कस्टम(चुंगी), एक्साइज(आबकारी), डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस को द नारकोटिक्स ड्रग्स एंड सायकोट्रोपिक सब्स्टांसेज एक्ट 1985 के तहत समान अधिकार दिए गए हैं और नशे की चीजों पर कई कोणों से लगाम कसने के लिए इन अधिकारों पर अमल करना जरूरी है.

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के दिल्ली जोन की यूनिट ने यह भी कहा कि जमीनी स्तर पर निरंतर तालमेल बनाए रखने की जरूरत है. साथ ही यूनिट ने बताया कि उसके पास 10 सिपाही और 11 खुफिया अधिकारी कम हैं. यूनिट ने एडीपीएस एक्ट के सेक्शन 64 को लागू करने की जरूरत पर जोर दिया. इस सेक्शन में स्वेच्छा से उपचार के लिए आए नशेड़ियों पर मुकदमा ना चलाने की बात कही गई है साथ ही उसमें यह भी जोड़ा गया है कि अगर कोई नशेड़ी नशामुक्ति का अपना उपचार बीच में ही छोड़ देता है तो मुकदमा ना चलाने का यह अभयदान वापस लिया जा सकता है.

ज्यादातर नशेड़ी जिद्दी होते हैं और वे अपनी हालत के बारे में नकारते रहते हैं. अगर नशे की लत में फंसे लोग लोग स्वीकार करें कि उन्हें उपचार की जरूरत है तो इससे सरकार का समय और संसाधन दोनों बचेंगे.

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एक अच्छाई हर नशेड़ी के जेहन में दम तोड़ रही है और इस अच्छाई को एक बेहतर जिंदगी देने के लिए जरूरी है कि हम नशे की चीजों और उससे जुड़े अपराध-कर्म के बीच का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म कर दें.

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