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डीयू छात्रसंघ चुनाव: शैक्षणिक व्यवस्था को सुधारने की जगह राष्ट्रीय राजनीति पर जोर

अगर स्टूडेंट पॉलिटिक्स राष्ट्रीय राजनीति से खुद को अलग रखकर केवल स्टूडेंट्स और शैक्षणिक व्यवस्था की भलाई के बारे में सोचेगी तो निश्चित तौर पर विश्वविद्यालय खुद को उबारने में सक्षम हो जाएगा.

Updated On: Sep 11, 2018 06:38 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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डीयू छात्रसंघ चुनाव: शैक्षणिक व्यवस्था को सुधारने की जगह राष्ट्रीय राजनीति पर जोर
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वैसे तो दिल्ली में सितंबर के महीने में ज्यादा बरसात नहीं होती है लेकिन इस बार इस महीने में भी बारिश दिल्लीवासियों को भिगो रही है. रिमझिम फुहारों की वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय की लाल ईंटों वाली दीवारों और भवनों पर से धूल हट गयी है और मिट्टी की सोंधी खुशबू पूरे कैंपस में तैर रही है. ऐसी ही सितंबर की उमस भरी दोपहरी में दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैंपस में गहमागहमी का माहौल है. वैसे डीयू कैंपस में ये सरगर्मी यू ही नहीं है ये छात्रसंघ चुनाव की आहट है. कैंपस में चारों ओर स्टूडेंट्स का कोलाहल है और साथ ही कैंपस के आसपास पुलिस मुस्तैदी से कड़ी दिख रही है.

चाय की दुकानों पर लगने वाले मजमों पर पुलिस की नजर है. इन दुकानों के आसपास और वहां पर लगाए गए बैरिकेडिंग के दोनों तरफ अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गयी है. आर्ट फैकल्टी कैंपस के अंदर मौजूद टेबलों के चारों तरफ स्टूडेंट्स बैठे हुए है और अपनी आक्रामक रणनीति पर चर्चा में जुटे हुए हैं. रह-रह कर छात्र अपने अपने उम्मीदवारों के पक्ष में नारेबाजी करके आकाश को गुंजायमान कर रहे हैं. आकाश में पोल्का डॉटेड हीलियम भरे बैलून छोड़े जा रहे हैं. स्टूडेंट्स इस चुनाव को युद्ध की तरह से लड़ने के लिए तैयार हैं. उनके मोबाइल की रिंग टोन पर 2009 में प्रदर्शित हुई अनुराग कश्यप की फिल्म गुलाल का गाना ‘आरंभ है प्रचंड’ सुनाई पड़ता रहता है. छात्र राजनीति पर बनी इस फिल्म के गाने के बोल और धुन छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हैं और वो अपनी राजनीति में भी इसे इस्तेमाल करने में नहीं चूक रहे.

पूरे नार्थ कैंपस में बड़ी बड़ी और मंहगी गाड़ियों के काफिले खड़े हैं जिनके शीशों के ऊपर उम्मीदवारों के नाम वाले पोस्टर चिपके हुए हैं. खास करके बीजेपी की छात्र ईकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और कांग्रेस की छात्र ईकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के उम्मीदवारों के बीच प्रचार में होड़ लगी हुई है. दिल्ली विश्विद्यालय में राजनीति का रोमांस राजनीति के उद्देश्य पर हावी रहा है. इसकी दोहरी वजह है, पहली ये कि डीयू विश्वविद्यालय की स्टूडेंट्स पार्टियां अपने अपने राजनीति दलों से पूरी तरह से संबद्ध होती है और उनका ऐजेंडा भी उनकी पार्टियों की तरह ही राष्ट्रीय होता है. लेकिन ऐसा करने में वो बड़े-बड़े मुद्दों के बीच अपने कैंपस में दिखाई देने वाली छोटी-छोटी समस्याओँ पर ध्यान देना भूल जाते हैं.

उनके चुनाव के घोषणापत्र को देखें तो आप पाएंगे कि उनमें से अधिकतर मुद्दे उनके हर बार के मेनिफेस्टो में शामिल रहते हैं. अधिक हॉस्टल, मेट्रो पास की मांग, 24X7 लाइब्रेरी की सुविधा और जाति और लिंग के भेदभाव को लेकर कानून बनाने की मांग जैसी आधारभूत मांगें हर साल के मेनिफेस्टो में रहती हैं. इस बार एनएसयूआई के मेनिफेस्टो में शहरी नक्सलवाद का भी जिक्र किया गया है. एनएसयूआई के घोषणापत्र में वामपंथी छात्र ईकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट्स यूनियन (आइसा) पर आरोप लगाया गया है कि वो शहरी नक्सलवाद का समर्थन करती है और पिछड़ेपन की तुलना जाति से करती है.

दूसरी वजह, लगता है कि डीयू में स्टूडेंट्स पॉलिटिक्स वोट बैंक पर आधारित है. ऐसा क्यों है कि विश्वविद्यालय से एम.फिल और पीएचडी कर रहे स्टूडेंट्स जिनकी संख्या लगभग पांच हजार है, उनका डीयू चुनावों में प्रतिनिधित्व नहीं है. दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और किरोड़ीमल कॉलेज में दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर राजीव रे ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि जेएनयू की तरह डीयू में रिसर्च स्कॉलर को शामिल नहीं किया जाता है. उन्होंने बताया, 'दिल्ली विश्वविद्यालय में अगस्त महीने में एम.फिल और पीएचडी कोर्सेज के लिए किसी का भी नामांकन नहीं हुआ है. इस तरह के मामले दिल्ली यूनिवर्सिटी रिसर्चर्स एसोसिएशन (डीयूआरए) उठा सकता था लेकिन ये संस्था लगभग 15 वर्ष पहले ही भंग हो चुकी है.'

DUSU

प्रतीकात्मक तस्वीर

उनका कहना है कि महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर स्टूडेंट्स उदासीन नहीं रहते हैं. वो इसके पक्ष में डूटा द्वारा आयोजित 19 मार्च से 23 मार्च तक हुए विरोध प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहते हैं कि इस दौरान बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतरे थे. ये प्रदर्शन केंद्र सरकार के द्वारा देश के 62 विश्वविद्यालयों को स्वायत्ता और फंडिंग से जुड़े मामलों पर विरोध जताने के लिए आयोजित किया गया था. उनका कहना था कि स्टूडेंट्स उन मामलों के प्रति जागरुक हैं जो उनके लिए मायने रखते हैं और वही मामले राजनीति में भी चलते रहते हैं.

रे खुद भी 24 साल पहले ऐकेडमिक काउंसिल के स्टूडेंट मेंबर रह चुके हैं. रे सवाल करते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के कानून के मुताबिक ऐकेडमिक काउंसिल में पांच प्रतिभाशाली स्टूडेंट्स को शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन ये व्यवस्था 18 साल पहले ही बंद की जा चुकी है लेकिन क्या वजह है कि छात्र राजनीति में शामिल कोई भी पार्टी इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलती?

क्यों विश्वविद्यालय के कैंपस में चल रही चुनावी प्रक्रिया में महिला कॉलेजों की सहभागिता बढ़ाने का प्रयास नहीं किया जाता है? 22 महिला कॉलेजों में से केवल पांच महिला कॉलेज की छात्राएं विश्वविद्यालय के चुनाव में वोट डालती हैं. पिछले साल 29,765 स्टूडेंट्स ने नन ऑफ दी एबव यानि नोटा का बटन दबाया था जो कि उसके पिछले साल के मुकाबले 12 हजार अधिक था. अधिकतर स्टूडेंट्स का छात्र राजनीति से मोहभंग इसलिए हो रहा है कि क्योंकि चुनावों के दौरान धन बल का प्रयोग केवल चुनाव जीतने के लिए किया जाता है लेकिन चुनाव जीतने के बाद ऐकेडमिक गवर्नेंस सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं होता.

विश्विविद्यालय को गहन रिसर्च वाले संस्थान में तब्दील करने और यहां से उत्कृष्ट प्रकाशनों को प्रकाशित किया जा सके इसके लिए यहां की स्टूडेंट कम्यूनिटी को अपने मेनिफेस्टो से आगे बढ़ कर सोचना होगा.

एक और समुदाय के स्टूडेंट्स हैं जो कि पूरी चुनावी रणनीति से खुद को अलग महसूस करते हैं और वो है नार्थ ईस्ट के स्टूडेंट्स. पिछले साल इस संबंध में भगत सिंह कॉलेज से इतिहास में स्नातक कर रहे अरुणाचल प्रदेश के छात्र रीजुम रीजुम ने एक वाजिब सवाल उठाया था. रीजुम का कहना था कि स्टूडेंट्स यूनियन कभी इस तरह का मुद्दा नहीं उठाता है कि क्यों हिंदी एक क्वालिफाइंग विषय है जबकि नार्थ ईस्ट के लोग इससे ज्यादा वाकिफ नहीं है, रीजुम का कहना है, 'उत्तर भारत के लोग हमें विदेशी समझते हैं क्योंकि उन्हें हमारी संस्कृति के बारे में पता नहीं है. ऐसे में पाठ्यक्रमों में हमारे इतिहास और परंपरा के बारे में भी ज्यादा जानकारी होनी चाहिए.' रीजुम फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहते हैं कि केवल भेदभाव रोकने वाले कानून बनाने से कुछ नहीं होगा. इसमें सफलता तभी मिलेगी जब हमारे पाठ्यक्रमों में देश की विविधताओँ के बारे में ज्यादा से ज्यादा संवेदनशीलता बरती जाएगी.

मजेदार बात ये है कि विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज की तरह ही दिल्ली विश्वविद्यालय का भी अपना प्रकाशन है. लेकिन इसके लिए कोई संपादकीय टीम ही नहीं है? ऐसा क्यों है कि डीयू के पास प्रेस होने के बाद भी कोई भी ऐकेडमिक आर्टिकल प्रकाशित नहीं होता है? क्यों इसके लिए कोई एडिटोरियल टीम निर्धारित नहीं की गयी है.

विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर इसके प्रेस से संबंधित जानकारी दी गयी है जिसमें लिखा हुआ है कि ‘प्रेस विभाग विश्वविद्यालय, उसके विभागों, कॉलेजों, सेंटर्स, हॉस्टल्स और उसकी जरूरतों के अनुसार प्रिंटिंग, बाईंडिंग और उससे जुड़े हुए सभी कार्य करता है. इंफ्रास्ट्रक्चर कर्मचारियों की कमी की वजह से वर्तमान में यूनिवर्सिटी का प्रेस, डिग्री, उत्तर पुस्तिका, लिफाफा इत्यादि की प्रिंटिंग करता है. इसके अलावा ए.सी. और ई.सी के मिनट्स की बाइंडिंग रीबाइंडिंग, रिजल्ट्स, सेलरी बिल्स, रजिस्टर्स और बाकी के अन्य कार्यों को नियमों के अंतर्गत प्राधिकृत किए गए प्रिंटर्स से करवाया जाता है.

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पश्चिमी देशों में जहां स्टूडेंट्स एक्टिविस्म रिसर्च के फंड में कटौती के खतरे के मुद्दे के चारों तरफ घूमता रहता है वहीं यहां पर छात्र राजनीति इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स की मांग पर टिकी होती है. समाजशास्त्र विभाग में पीएचडी कर रहे सौम्यदीप सिन्हा ने कैंपस में छात्र राजनीति पर फील्डवर्क करने के दौरान ऐसा ही पाया. सौम्यदीप ने उस समय की कहानी हमारे साथ साझा की जब उन्होंने एनएसयूआई के कार्यक्रम ‘डेमोक्रेसी डायलॉग्स’ में हिस्सा लिया था. सौम्यदीप का कहना था कि उन्हें उस कार्यक्रम में जाकर ऐसा महसूस हो रहा था कि वो कोई बाहरी व्यक्ति हैं क्योंकि वो पूरा कार्यक्रम उनके पार्टी कैडरों के लिए आयोजित किया गया था. उनको लगता है कि ऐसी संयुक्त संस्कृति को विकसित करने की जरूरत है जिसमें सभी की सहभागिता सुनिश्चित की जा सके. किसी भी स्टूडेंट्स पार्टी के लिए जरूरी है कि उसके कार्यक्रम के बाद उसकी रुचि केवल सोशल मीडिया पर इसको भुनाने की नहीं होनी चाहिए.

स्टूडेंट पार्टियों के राष्ट्रीय पार्टियों से संबद्ध होने की कीमत ये है कि यहां राजनीति में ड्रामा का अनुभव ज्यादा होता है और अदायगी की वास्तविकता कम होती है. एबीवीपी के राज्य सचिव भरत खटाना का कहना है कि एबीवीपी के लिए हमेशा से फेलोशिप और स्कालरशिप से जुड़े मुद्दे शीर्ष महत्व के रहे हैं. पार्टी ने कुछ दिनों पहले ही छात्र अधिकार रैली का आयोजन किया था, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के स्टूडेंट्स के फेलोशिप का मुद्दा उठाया गया था. खटाना का कहना था, 'एबीवीपी ने सरकार को उनकी मांगों को मानने के लिए 15 दिनों का समय दिया है. उनकी मांगों में स्कॉलरशिप को मूल्य सूचकांक से जोड़ना और स्कॉलरशिप कि संख्या में बढ़ोत्तरी करना शामिल है.'

खटाना ने इसके आगे तुरंत जोड़ते हुए कहा कि हमारा अगला ऐजेंडा विभिन्न विश्विद्यालयों में मौजूद शहरी नक्सलियों का चेहरा लोगों के सामने लाना है. वैसे पिछले साल अनुभव के खेल में एबीवीपी मात खा गयी थी जब उसके कुछ सदस्यों ने एक सेमिनार में तोड़फोड़ मचा दी थी. उस सेमिनार में जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद बोलने वाले थे. उसी कार्यक्रम में डूसू के अध्यक्ष ने कथित रूप से आइएसा की एक्टिविस्ट कंवलप्रीत कौर को घूंसा मार दिया था. कंवलप्रीत ने हाल ही में एक फेसबुक पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ फिर से मारपीट की है.

इस बार डीयू के छात्रसंघ चुनाव में एक गठबंधन भी मैदान में है. आइसा ने आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई छात्र युवा संघर्ष समिति के साथ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने का फैसला किया है. ये गंठबंधन दावा कर रहा है कि वो धन बल की राजनीति से इतर संवाद को राजनीति की मुख्य धारा में लाएगा. ये लोग छोटे-छोटे समूहों में अपना प्रचार कर रहे हैं. नॉर्थ कैंपस और साउथ कैंपस में ये लोग चाय की दुकानों पर मजमा लगा कर ‘चाय पर चर्चा’ का आयोजन कर रहे हैं.

इस गठबंधन को उम्मीद है कैंपस की राजनीति से ऊब चुके छात्र इस बार उन्हें समर्थन करेंगे. लेकिन डीयू का ट्रेंड जेएनयू से अलग है. यहां पर स्टूडेंटस रेडिकल वामपंथी दलों को चुनने में रुचि नहीं दिखाते हैं. सीवायएसएस एक नई पार्टी है और एक बार चुनाव में जबरदस्त झटका खाने के बाद तीन साल बाद फिर से छात्रसंघ चुनाव में उतरी है. ऐसे में उसकी राह भी छात्र राजनीति में आसान नहीं है. उसे विचाराधाराओं के बीच में लंबे समय से झूलते आ रहे पुराने वाद विवाद से ऊपर उठ कर काम करने का वादा करना पड़ेगा.

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की कल्पना राजवंश आधारित पार्टी के रूप में की जाती है. लेकिन इस साल पार्टी नए नए कॉलेज जाने वालों के लिए एक योजना लेकर आयी है. एनएसयूआई के सदस्य लारैब अहमद का कहना है, 'हम ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि नए स्टूडेंट्स को रिसोर्स कोऑर्डिनेटर, सोशल और ऐकेडमिक काउंसलर्स और यहां तक कि स्टडी मैटेरियल भी उनके स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराए जा सकें.

सभी स्टूडेंट पार्टियों का अपना अपना एजेंडा है लेकिन किसी का भी ऐजेंडा ऐकेडमिक गवर्नेंस से जुड़ा हुआ नहीं है. ये इस बात से भी पता चलता है कि किसी भी छात्र दल ने चार वर्षीय अंडरग्रेजुएट प्रोगाम के विकल्प के बारे में प्रमुखता से सहमति बनाने का प्रयास नहीं किया है. जून 2014 में यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रबंधन को एक कानूनी नोटिस भेज कर तुरंत चार वर्षीय कार्यक्रम को रद्द करने का निर्देश दिया था.

यूजीसी का कहना था कि ये देश में मौजूद राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लंघन करती है. इसके तहत सेमेस्टर सिस्टम को एक वर्ष अतिरिक्त बढ़ा दिया गया था और पाठ्यक्रम में बदलाव लाकर भाषा और संचार, सूचना प्राद्यौगिकी, डेटा एनायलिसिस और लाइफ स्किल्स में फाउंडेशन कोर्स जोड़ दिया था. स्टूडेंट्स का आरोप था कि फाउंडेशन कोर्स के तहत उन्हें वो सब पढ़ाया जाएगा जो वो स्कूल में पहले ही पढ़ चुके हैं. इससे न केवल स्टूडेंट्स पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा बल्कि उनका ध्यान अपने मुख्य विषय से भी भटक जाएगा. वहीं दूसरे पक्ष का मानना था कि इस तरह के पाठ्यक्रम से स्टूडेंट्स को ज्यादा मदद मिलेगी और वो आईआईटी जैसे प्रोफेशनल संस्थानों से पढ़ कर निकलने वाले बच्चों से कम्पीट कर सकेंगे.

अगर स्टूडेंट पॉलिटिक्स राष्ट्रीय राजनीति से खुद को अलग रखकर केवल स्टूडेंट्स और शैक्षणिक व्यवस्था की भलाई के बारे में सोचेगी तो निश्चित तौर पर विश्वविद्यालय खुद को उबारने में सक्षम हो जाएगा.

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