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दिल्ली का महर्षि वाल्मीकि अस्पताल खुद बीमारी से पीड़ित, रिपोर्ट में हुए कई बड़े खुलासे

रिपोर्ट के मुताबिक डिप्थीरिया से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए अस्पताल में सुविधाओं की बहुत कमी है, इस तरह की बीमारी के इलाज के लिए कोई भी स्पेशलिस्ट डॉक्टर अस्पताल में नहीं है

Updated On: Oct 07, 2018 02:41 PM IST

FP Staff

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दिल्ली का महर्षि वाल्मीकि अस्पताल खुद बीमारी से पीड़ित, रिपोर्ट में हुए कई बड़े खुलासे

महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल में डिप्थीरिया से हुई बच्चों की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. द हिंदू की खबर के अनुसार हाल ही में कमेटी ने बच्चों की मौत को लेकर एक रिपोर्ट भी जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक डिप्थीरिया से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए अस्पताल में सुविधाओं की बहुत कमी है. सबसे पहले तो इस तरह की बीमारी के इलाज के लिए कोई भी स्पेशलिस्ट डॉक्टर अस्पताल में नहीं हैं. वहां मौजूद ईएनटी डॉक्टर ही डिप्थीरिया का इलाज करते हैं. अस्पताल में सांस संबंधी दवाइयां भी उपलब्ध नहीं थीं. ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए सबसे जरूरी पोर्टेबल एक्स-रे मशीन और वेंटिलेंटर भी अस्पताल में नहीं हैं. अस्पताल में केवल एक वेंटिलेटर है. बच्चों को ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं है जबकि रिपोर्ट में यह बात साफ कही गई है कि यह इकलौता ऐसा अस्पताल है जहां डिप्थीरिया का इलाज संभव है.

बच्चों की मौत के पीछे का कारण समय पर दवाई न मिलना है

मामले की जांच के लिए बनी 5 सदस्यीय कमिटी की रिपोर्ट में अस्पताल की कई चीजें सामने आई हैं. रिपोर्ट की मानें तो इन बच्चों की मौत के पीछे का कारण समय पर दवाई न मिलना है. आपको बता दें कि इन बच्चों को एंटी डिप्थेरिया सेरेम देना था जो कि उस समय अस्पताल में उपलब्ध नहीं था. जांच में पता चला है कि अस्पताल में मौजूद एंटी डिप्थीरिया सेरेम की 1400 शीशियां 2 दिसंबर 2017 को ही एक्सपायर हो चुकी थीं. वहीं सेरेम की 200 नई शीशियां 23 सितंबर 2018 को अस्पताल में पहुंची थीं लेकिन तब तक की बच्चों की मौत हो चुकी थी.

साल 2012-2017 तक दिल्ली में डिप्थीरिया से हुईं 550 मौतें 

दिल्ली कॉरपोरेशन के रिकॉर्ड के मुताबिक साल 2012 से लेकर 2017 तक दिल्ली में डिप्थीरिया से मरने वाले लोगों की संख्या 550 थी (2012 में 56 लोग, 2013 में 71, 2014 में 110, 2015 में 88, 2016 में 133 और 2017 में 102 लोगों की मौत हुई थी). वहीं महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल के एक डॉक्टर ने कहा कि जितने भी बच्चे असप्ताल में भर्ती हुए थे उन्हें या तो इंजेक्शन नहीं लगाए गए थे या फिर उनमें पहले कोई से कोई संक्रामक मौजूद था. इंफेक्शन फैलने के कई दिनों बाद वह अस्पताल में इलाज के लिए आए थे जिस कारण उनकी मौत हो गई.

अस्पताल में चारों तरफ गंदगी का आलम 

वहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि अस्पताल में डिप्थीरिया वॉर्ड की जांच करने पर पाया गया कि संक्रामक रोगों के इस विशेषज्ञ अस्पताल में चारों तरफ गंदगी का आलम था. बच्चों के इलाज के लिए आइसोलेशन सुविधा नहीं थी और न ही हार्ट के इलाज की कोई सुविधा अस्पताल में थी. आपात स्थितियों में बच्चों को अस्पताल तक ले आने के लिए एंबुलेंस भी नहीं हैं. मेडिकल उपकरणों और दवाइयों के अभाव में इस अस्पताल में डिप्थीरिया का इलाज हो रहा है. कमेटी ने जो रिपोर्ट दी है, उसमें केवल कमियां ही नहीं बताई गई हैं, बल्कि अस्पताल की हालत में सुधार के लिए कुछ सुझाव भी दिए गए हैं. आपको बता दें कि अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को दोषी बताया गया है. उन्हें रिपोर्ट आने से पहले ही सस्पेंड भी कर दिया गया था.

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