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सरकारी फंडिंग वाली गौशालाओं का बुरा हाल, चंद दिनों में 30 गायों की मौत

चार्य सुशील मुनि गोसदन नामक इस गौशाला में एक हफ्ते के भीतर 30 गायों की मौत हो गई और इसकी जिम्मेदारी प्रशासनिक लापरवाही पर है

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Aug 08, 2018 04:55 PM IST

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सरकारी फंडिंग वाली गौशालाओं का बुरा हाल, चंद दिनों में 30 गायों की मौत

राजधानी दिल्ली के पश्चिमी किनारे पर हरियाणा की सीमा से सटा से एक शहरी गांव है- घुम्मनहेड़ा. यहां 19 एकड़ में स्थित गौशाला आजकल काफी सुर्खियों में है. आचार्य सुशील मुनि गोसदन नामक इस गौशाला में एक हफ्ते के भीतर 30 गायों की मौत हो गई.

दिल्ली सरकार की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक, इस गोसदन में 4,142 गायों को रखने की क्षमता है. यह गोसदन अपने तरह की 5 ऐसी इकाइयों में है, जिसे गायों आदि की देखभाल व सुरक्षा की खातिर सरकारी मदद मिलती है. इन गौशालाओं को दिल्ली सरकार से 20 रुपए प्रति गाय और इतनी ही राशि म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ दिल्ली (एमसीडी) से मदद के तौर पर मुहैया कराई जाती है.

दिल्ली सरकार ने दिल्ली कृषि संबंधी पशु संरक्षण कानून 1994 के सेक्शन 10 के तहत ने गैर-सरकारी संगठनों के जरिए इन गोसदनों का निर्माण सुनिश्चित कराया था. इन गोसदनों को स्थापित किए जाने का मकसद इस तरह के पशुओं की देखभाल और रखरखाव सुनिश्चित करना था. लिहाजा, इस तरह के गोसदन वैसे गायों और सांड को शरण मुहैया कराते हैं, जिन्हें उनके निजी मालिक छोड़ देते हैं. दरअसल, ऐसे पशुओं के जख्मी होने या दूध देना बंद कर देने के कारण उनके निजी मालिक उनका त्याग कर देते हैं. मुख्य तौर पर वैसे पशुओं को ही इस तरह की गौशालाओं में शरण दी जाती है, जिनकी आर्थिक लिहाज से उपयोगिया नहीं के बराबर रह जाती है. सीधे शब्दो में कहें तो यहां ऐसी गायों व अन्य पशुओं की देखभाल की जाती है, जिनमें दूध देने की क्षमता नहीं होती और न ही इनसे अन्य किसी तरह का लाभ हासिल किया जा सकता है.

कुछ दिनों के भीतर बड़ी संख्या में गायों की मौत के बाद सुर्खियों में आया मामला

घुम्मनहेड़ा गोसदन ने पिछले दो साल में एमसीडी से एक भी गाय को स्वीकार नहीं किया है और इसके बावजूद इसे सरकारी सहायता मिलने का सिलसिला जारी है. गौरतलब है कि पिछले हफ्ते इस गौशाला में 30 से भी ज्यादा गायों की मौत हो गई, जिसके बाद गौशालाओं में गायों की हालत का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है.

घुम्मनहेड़ा में मौजूद गोसदन में पशुओं की देखभाल से जुड़े एक शख्स विनोद ने बताया कि राजनीतिक संपर्क वाले एक स्थानीय शख्स ने कुछ वक्त पहले इसकी गतिविधियों का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया और उन्होंने दिल्ली सरकार के डॉक्टरों या एमसीडी की एंट्री को यहां पूरी तरह से रोक दिया. नगर निगम के अधिकारों का दावा है कि यहां लंबे अर्से से नगर निगम की तरफ से गाय नहीं भेजी जा रही थी.

दक्षिण दिल्ली नगर निगम के डिप्टी डायरेक्टर डॉ हेमंत कौशिक ने बताया, 'हमने तकरीबन दो साल से पशुओं को घुम्मनहेड़ा में स्थित इस गौशाला को नहीं भेजा है. दरअसल, इस गोसदन में प्रबंधन को लेकर विवाद था और हमें स्पष्ट तौर पर इस बात को लेकर जानकारी नहीं कि इस गोसदन को कौन चला रहा है.'

'ऐसी घटनाओं के लिए प्रशासनिक ढिलाई प्रमुख तौर पर है जिम्मेदार'

हाल में घुम्मनहेड़ा गोसदन का दौरा करने करने पर पाया गया कि वहां का माहौल तनावपूर्ण था. यहां ट्रकों की लंबी लाइन लगी थी, जिसके जरिेए 1,000 गायों को डाबर हरे कृष्ण गौशाला, सुरहेड़ा, नजफगढ़ ले जाया जा रहा था. नजफगढ़ इलाके में मौजूद यह गौशाला राष्ट्रीय राजधानी में सरकारी सहायता से चलने वाली सबसे बड़ी गौशाला है.

फ़र्स्टपोस्ट की टीम जब घटनास्थल पर पहुंची, तो वहां हरे कपड़ों से ढंके गायों के शव मौजूद थे और इन्हें लकड़ी के तख्तों पर पर रखा गया था. कुछ अन्य शवों (गायों के) को गोसदन के गेट के पास दफनाया जा रहा था.

पशुओं की खेप को ट्रकों पर चढ़ाने से पहले दिल्ली सरकार के एक वेट्रनरी डॉक्टर द्वारा उनकी जांच की जा रही थी. इस डॉक्टर ने अपने बारे में खुलासा नहीं किए जाने की शर्त पर बताया, 'इस घटना की जानकारी मिलने के बाद तकरीबन 30 पशु चिकित्सा इकाइयों के 12 वेट्रनरी डॉक्टरों और तीन पोस्टमार्टम स्पेशलिस्ट्स की टीम ने अपना सब काम छोड़कर गौशाला की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर रखा है, जहां पिछले दो साल से भारी कुप्रबंधन का मामला चल रहा था. बड़ा सवाल यह है कि अगर एमसीडी या दिल्ली सरकार के डॉक्टरों को पिछले कई महीनों से यहां आने नहीं दिया जा रहा था, तो किसी तरह की कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही थी? यह गोहत्या के बराबर है. हालांकि, इस तरह की घटनाएं चूंकि प्रशासनिक ढिलाई के कारण होती हैं, लिहाजा ये घटनाओं नहीं के बराबर सुर्खियां हासिल कर पाती हैं.'

खानपुर में मौजूद एक और गौशाला की भी हालत अच्छी नहीं

राष्ट्रीय राजधानी के रेवला खानपुर इलाके में 16 एकड़ में मौजूद एक और गौशाला मानव गऊ सदन भी सरकारी सहायता हासिल करने वाली गौशालाओं में शामिल है. इसमें 3,488 पशुओं को शरण मुहैया कराने की क्षमता है. मानव गऊ सदन में अपर्याप्त सुविधाओं का हवाला देते हुए इस गौशला का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है. गौशाला का लाइसेंस रद्द करने के फैसले पर दिल्ली सरकार के खिलाफ केस दर्ज किया गया था. इस सिलसिले में चार साल पहले अदालत की तरफ से आए एक स्टे ऑर्डर के कारण गायों को यहां से दूसरी गौशालाओं में भी नहीं ले जाया जा सकता है. और न ही मानव गऊ सदन एमसीडी द्वारा लाई गई गायों को अपने यहां स्वीकार कर सकता है.

इस बात की ठीक ढंग से पड़ताल किए जाने की जरूरत है कि राज्य सरकार किस आधार पर इस तरह के गऊ सदनों को ठेका देने का फैसला करती है. इस तरह के गौशलाओं में गड़बड़ी और अक्षमता के मामलों को देखते हुए ये चीजें बेहद जरूरी हैं. गौशालाओं और ऐसे केंद्रों पर दिल्ली सरकार और एमसीडी की तरफ से हर साल 14,600 रुपए प्रति गाय के हिसाब से खर्च किया जा रहा है.

फ़र्स्टपोस्ट की टीम ने सुरहेड़ा में मौजूद गोसदन का भी दौरा किया, जहां घुम्मनहेड़ा में मौजूद आचार्य सुशील मुनि गोसदन में रहने वाली 1,000 गायों को भेज जाने कारण इस गऊ सदन पर दबाव काफी बढ़ जाएगा. सुरहेड़ा के प्रमुख केयरटेकर सतीश ने बताया कि यह गऊ सदन चार निगमों से गायों को स्वीकार करते हैं. इनमें दक्षिणी दिल्ली नगर निगम, उत्तरी दिल्ली नगर निगम, पूर्वी दिल्ली नगर निगम और नई दिल्ली नगर निगम शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि इसके अलावा कभी-कभी छावनी बोर्ड की तरफ से वैसे पशुओं को भी यहां पहुंचाया जाता है, जो भटकते हुए छावनी इलाके में पहुंच जाते हैं. सतीश ने कहा, 'यहां लाए जाने वाले पशुओं के स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब होती है. उनके पेट में पॉलीथीन भरा होता है और उनके पांव भी जख्मी रहते हैं. गायों का बोझ दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. हालांकि, हमारे पास कागजों पर अच्छी क्षमता (24 एकड़) है, लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं है. पशुओं की जगह की जरूरत होती है. खास तौर पर वैसी स्थिति में और जगह की जरूरत होती है, जब वे बीमार हों और दूसरे पशुओं में उनकी बीमारी का प्रकोप नहीं हो, इस वजह से उन्हें अलग रखने की दरकार हो.'

उनका कहना था कि इस गौशाला में तकरीबन 2,800 जानवर हैं और यहां सिर्फ 40-50 लीटर रोजाना दूध का उत्पादन होता है. इसके अलावा, गोबर से होने वाली आमदनी 5 लाख रुपए सालाना से ज्यादा नहीं होती. पशुओं के शवों-कंकालों को पूर्वी दिल्ली नगर निगम की तरफ से इकट्ठा कर उसे गाजीपुर इलाके में मौजूद बूचड़खाने ले जाया जाता है.

इस गोसदन के मुख्य संस्थापक कृष्ण यादव ने आरोप लगाया कि उन्होंने पिछले दो साल से एमसीडी की फंडिंग हासिल नही की है और यहां तक कि बीते दिसंबर से दिल्ली सरकार की तरफ से भी मुहैया कराई जाने वाली मदद राशि भी नहीं मिल रही है.

आवारा पशुओं के मूल मालिक की पहचान नहीं कर पाना भी है समस्या

दिल्ली सरकार में पशुपालन विभाग के डायरेक्टर डॉ. राकेश सिंह का कहना है कि समस्या की मूल वजह आवारा पशुओं के मालिकों की पहचान नहीं कर पाना है. उन्होंने बताया, 'मवेशी रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ गायों पर मुहर लगाने या विभिन्न तरीकों से उसे चिन्हित करने का नियम नहीं है. हालांकि, जो ऐसा करते हैं, वे अपनी सुविधा के मकसद से ऐसा करते हैं, लेकिन इस सिलसिले में कोई बाध्यकारी कानून नहीं है. गाय को एक बार आवारा छोड़ दिए जाने के बाद इस बात के बारे में पक्के तौर पर जानकारी हासिल करने का कोई तरीका नहीं है कि संबंधित पशु की मालिक या इसकी देखभाल करने वाला कौन था या है.'

वकील एस एन भारद्वाज ने पिछले साल पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम (प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल्स एक्ट 1960) के प्रावधानों के तहत गायों के मालिकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इस सिलसिले में दायर की गई जनहित याचिका में कहा गया था, 'न सिर्फ दिल्ली बल्कि देशभर में बड़ी संख्या में गायें सड़कों पर कचरा खाते हुए नजर आती हैं. केंद्र सरकार के पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम के तहत देश का पशु कल्याण बोर्ड की कानूनी तौर पर यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस सिलसिले में अपने कर्तव्यों का पालन करे. हालांकि, बोर्ड अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में नाकाम रहा.'

जनहित याचिका में पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अगुवाई में उच्चस्तरीय आयोग बनाने की मांग की गई थी, जो गायों की सुरक्षा से संबंधित उपायों के बारे में सुझाव दे. इसमें अदालत से गौशालाओं के लिए ज्यादा जमीन आवंटित करने की खातिर संबंधित विभागों और अधिकारियों को निर्देश देने की भी मांग की गई थी.

'10 गौसदनों की स्थापना' स्कीम के मूल्यांकन संबंधी अध्ययन के लिए सितंबर-अक्टूबर 1999 के दौरान फील्ड सर्वे किया गया था. यह अध्ययन सात गोसदनों और पांच गौशालाओं को खोलने के लिए सिलसिले में किया गया था. इस अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर गोसदनों की हालत वित्तीय रूप से बेहद खराब है. बड़ी संख्या में गोसदनों का कहना था कि आर्थिक दिक्कतों के कारण वे यहां की हालत सुधारने में सक्षम नहीं हैं. तकरीबन दो दशक बाद केंद्र, दिल्ली और एमसीडी में अलग-अलग सरकारों की मौजूदगी है और उनके थोड़े बहुत प्रयासों के बावजूद हालात में बिल्कुल भी बदलाव नहीं देखने को मिला है. सर्वे में निजी रूप से संचालित की जा रही पांच गौशालाओं का भी आकलन किया गया.

इन गौशालाओं के मूल्यांकन के दौरान पाया गया कि उनकी आर्थिक हालत वैसी गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के जरिए चलाए जाने वाले गौशालाओं के मुकाबले काफी अच्छी है. इसकी वजह यह है कि निजी गौशालाओं के एनजीओ की तरफ से चलाए जाने वाले गौशालाओं के मुकाबले ज्यादा वित्तीय मदद यानी चंदा वगैरह मिलता है. एनजीओ के गोसदनों में पशुओं की ऊंची मृत्यु दर के कारण शायद लोग इसमें वित्तीय मदद करने से हिचकिचाते हैं. सुरहेड़ा गौशाला की देखभाल का जिम्मा संभालने वाले सतीश कहते हैं, 'लोग निजी गौशालाओं की खातिर चंदा देने या मदद करने को लेकर ज्यादा सहज इसलिए महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अन्य लोगों द्वारा जिन गायों का त्याग कर दिया जाता है, वही बीमार गायें हमारे पास पहुंचती हैं. इसके अलावा, उन्हें इस बात का भी अहसास रहता है कि हमारे पास भारी-भरकम सरकारी मदद का भी रास्ता नहीं होता है.'

सरकारी फंडिंग वाले गोसदनों के मॉडल को नया रूप देने की जरूरत

सरकार की तरफ से वित्तीय सहायता हासिल करने वाली गौशालाओं के मॉडल में बदलाव की जरूरत है. साथ ही, संक्रामक रोग की शिकार गायों के लिए पर्याप्त जगह और चारे के लिए भी पर्याप्त इंतजाम किया जाना जरूरी है.

तकरीबन 6 महीना पहले दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) ने कचरे से बिजली पैदा करने का आइडिया पेश किया था. इसके तहत दक्षिणपूर्व दिल्ली के तेहखंड इलाके में 50 एकड़ जमीन पर कचरा से बिजली पैदा करने वाले प्लांट स्थापित करने की बात थी. दो डेयरियों के साथ दो गौशालाओं- मानव गोसदन और घुम्महेड़ा गोसदन में बायोगैस प्लांट बनाने का प्रस्ताव किया गया था. हालांकि, अभी तक इन दोनों में से किसी गौशाला में बायो-ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगा है, जिससे गाय के गोबर से बिजली पैदा हो सकती थी. इससे न सिर्फ कचरे के निपटारे की समस्या हल होती, बल्कि बिजली भी पैदा होती.

दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के आर पी एस त्यागी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि इस संबंध में टेंडर तैयार है और इंजीनियरिंग विभाग द्वारा अपना काम पूरा किए जाने के बाद प्लांट की शुरुआत हो जाएगी. हालांकि, गोसदन में मौजूद स्टाफ को इससे संबंधित स्किल के बारे में जानकारी होनी चाहिए और वह नगर निकाय विभाग के कर्मियों के साथ प्लांट चलाने को भी इच्छुक हो, तभी इस प्लान पर कारगर तरीके से अमल मुमकिन हो पाएगा.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की साल 2015 की रिपोर्ट में बताया गया कि दिल्ली में हर रोज 689.52 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है और एमसीडी को राजधानी की सड़कों पर हर रोज नई आवारा गायें देखने को मिलती हैं. प्रशासनिक तंत्रों की विफलता का जो आलम है, उसके मद्देनजर सरकारी फंडिंग वाली गौशालाओं में गायों की मौत का मामला तो न तो सदमा और न ही दुख का मामला प्रतीत होता है.

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