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दिल्ली सरकार के अस्पताल: 10 हजार बेड्स पर सिर्फ 80 वेंटिलेटर्स

दिल्ली के अस्पतालों में वेंटिलेटर्स और अंबु बैग की भारी कमी है.

Updated On: Dec 23, 2016 10:50 AM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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दिल्ली सरकार के अस्पताल: 10 हजार बेड्स पर सिर्फ 80 वेंटिलेटर्स

दिल्ली के सरकारी अस्पताल खुद वेटिलेंटर्स पर हैं. ऐसे में उनसे मरीज की जिंदगी बचाने की उम्मीद बेमानी साबित हो सकती है.

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की हालत ये है कि 38 अस्पतालों में कुल 10 हजार बेड्स हैं जिन पर 2 हजार वेंटिलेटर्स की जरूरत है लेकिन मौजूद हैं सिर्फ 80 वेंटिलेटर्स.

ऐसे में जाड़े के मौसम में फेफड़े और सांस की तकलीफ से भर्ती हुए मरीजों के लिए अस्पताल में भगवान ही मालिक है.

दरअसल जाड़े के मौसम में बढ़ते प्रदूषण की वजह से फेफड़े और सांस के मरीजों की तकलीफ बढ़ने लगती है.

जिन मरीजों को सांस की गंभीर समस्या होती है उन्हें इस मौसम में अंबु बैग और वेंटिलेटर्स की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. लेकिन दिल्ली के अस्पतालों में वेंटिलेटर्स और अंबु बैग की भारी कमी है.

दिल्ली सरकार के अधीन कुल 38 अस्पताल हैं. मेडिकल नॉर्म्स के मुताबिक आदर्श स्थिति में 10 हजार बेड्स पर 2 हजार वेंटिलेटर्स होने चाहिए. लेकिन जो इस वक्त 38 अस्पतालों में सिर्फ 80 वेंटिलेटर्स काम कर रहे हैं.

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खास बात ये है कि हाल के दिनों में दिल्ली सरकार ने 125 वेंटिलेटर्स खरीदे हैं लेकिन इनके इनस्टॉलेशन का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है.

किस अस्पताल को कितने वेंटिलेटर्स ?

खरीदे गए वेंटिलेटर्स में एलएनजेपी अस्पताल को 35, जीबी पंत को 30, जीटीबी अस्पताल को 20, बाबा भीम राव अंबेडकर को 18, डीडीयू को 10, दीपचंद बंधू को 4, भगवान महावीर को 3 और गुरु गोविंद सिंह अस्पताल को 5 वेंटिलेटर दिए गए हैं. जिनके इनंस्टॉलेशन का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है.

दिल्ली सरकार के सबसे बड़े अस्पताल एलएनजेपी का हाल

खरीदे गए वेंटिलेटर्स में 35 वेंटिलेटर्स एलएनजेपी अस्पताल को दिए गए हैं. यह अस्पताल 1890 बेड्स का है.

मेडिकल नॉर्म्स के अनुसार इस अस्पताल में कम से कम 300 वेंटिलेटर्स होने चाहिए. पर इस वक्त एलएनजेपी में सिर्फ 41 वेंटिलेटर्स काम कर रहे हैं.

एलएनजेपी अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ जेसी पासी फर्स्ट पोस्ट हिंदी को बताते हैं, ‘दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल के ओपीडी में हर रोज लगभग 5 हजार मरीज आते हैं. इमरजेंसी में मरीजों की संख्या लगभग 12 सौ होती है. अस्पतालों में जो मरीज आते हैं उनमें ज्यादातर संख्या उम्रदराज महिलाओं और पुरुषों की होता है या फिर फेफड़े और सांस की समस्या से परेशान लोग होते हैं.’

प्राइवेट अस्पताल में इलाज को मजबूर

वेटिंलेटर्स की कमी के चलते मरीज और तीमारदार परेशान हैं. मजबूरन मरीज प्राइवेट अस्पतालों की तरफ भाग रहे हैं.

दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में वेंटिलेटर्स मौजूद हैं लेकिन वो काफी महंगे हैं. प्राइवेट अस्पतालों में वेंटिलेटर्स का एक दिन का चार्ज 8 हजार से लेकर 15 हजार रुपए तक का होता है. ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर मरीज इतने महंगे खर्चे को उठा पाने में असमर्थ होते हैं.

लेकिन जब एलएनजेपी में ही अंबु बैग और वेंटिलेटर्स की कमी है तो फिर दूसरे अस्पतालों की हालत का अंदाजा साफ लगाया जा सकता है.

डॉ पासी आगे कहते हैं, ‘दिल्ली से सटे राज्यों के मरीज भारी संख्या में एलएनजेपी अस्पताल आते हैं. इस वजह से जितनी भी अंबु बैग या वेंटिलेटर्स लगाई जाएगी वह कम ही पड़ेगी. दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में महंगा ईलाज भी अस्पताल में भीड़ बढ़ाने में सहायक हो रहा है. जल्द ही 35 वेंटिलेटर्स काम करना शुरू कर देंगे’

क्या होता है अंबु बैग?

यह एक गुब्बारा जैसा होता है. जब मरीज की सांस में रुकावट आती है तो कृत्रिम सांस देने के लिए इसका इस्तेमाल होता है. गुब्बारे से जुड़े एक पंप से एक नली डाल कर गुब्बारे को हाथ से दबा कर फेफड़े तक ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है.

मरीज को वेंटिलेटर की क्यों जरूरत पड़ती है?

मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत तब पड़ती है जब मरीज सांस लेने में सक्षम नहीं होता है. ऐसे समय में आईसीयू में मरीज को वेंटिलेटर पर रखकर कृत्रिम तरीके से फेफड़े में ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है.

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण भी फेफड़े की बीमारी के कारक

एक तो जाड़े का मौसम उपर से दिल्ली में प्रदूषण का लगातार बढ़ता स्तर लोगों के लिए परेशानी का कारण बनता जा रहा है. सांस और फेफड़े की समस्या से परेशान लोगों ने अस्पतालों का चक्कर काटना शुरू कर दिया है.

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दिल्ली सरकार के सरकारी अस्पतालों की खराब स्थिति के लिए पड़ोसी राज्य भी कम जिम्मेदार नहीं है. दिल्ली सरकार बजट में हर साल अस्पतालों के लिए एक विशेष राशि का प्रावधान करती है. पर यह बजट राशि दिल्ली के लोगों के लिए नकाफी साबित होता है.

 

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