S M L

ग्राउंड रिपोर्ट: दिल्ली का सबसे बड़ा जंकयार्ड अब भी बेहाल, लाखों डी-रजिस्टर्ड कारों का क्या होगा हाल?

जब तक जमीनी स्तर पर तैयारियां पूरी नहीं हो जातीं तब तक लाखों कारों का पंजीकरण रद्द करने के आदेश का पालन कर पाना बहुत कठिन है

Updated On: Nov 04, 2018 04:11 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

0
ग्राउंड रिपोर्ट: दिल्ली का सबसे बड़ा जंकयार्ड अब भी बेहाल, लाखों डी-रजिस्टर्ड कारों का क्या होगा हाल?
Loading...

बनाई गई हर चीज देर या सबेर अपने अंत को पहुंचती है. पश्चिमी दिल्ली के मायापुरी में वर्ष 1970 के दशक से ही मशहूर रहा एक कबाड़ी बाजार है. यहां कार, अपने आखिरी अंजाम तक पहुंचती है. एक गुमनाम सी सड़क के किनारे पसरे मटमैले कबाड़खानों में गाड़ियों को हथौड़ों की चोट से टुकड़ों में तोड़ा जाता है. ग्रीज़ लगे इंजन हाथ में उठाकर सड़क के आखिर के मुकाम पर पहुंचाई जाती है.

फोम उगलती, इस्तेमाल की हुई सीट के ढेर और कार का वो सारा कुछ जिसे उसका अस्थि-पंजर कहा जा सकता है, इधर-उधर बिखरे नजर आते हैं. पूरा दृश्य ऐसा जान पड़ता है मानो यह जगह वाहनों के लिए किसी श्मशान-भूमि की तरह है. स्मॉग (धुएं और धूल से बनी धुंध) के बढ़ते स्तर को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश को हरी झंडी दी है जिसमें 15 साल पुराने पेट्रोल वाहन और 10 साल पुराने डीजल वाहनों के दिल्ली-एनसीआर में चलने पर रोक लगाई गई थी. दिल्ली सरकार ने बीते गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि परिवहन विभाग ने देश की राजधानी में रजिस्टर्ड (पंजीकृत) कुल 1.10 करोड़ वाहनों में, ज्यादा पुराने हो चले 40 लाख वाहनों का (15 साल से ज्यादा पुराने पेट्रोल-वाहन और 10 से ज्यादा पुराने डीजल वाहन) पंजीकरण रद्द कर दिया है.

दिल्ली सरकार ने 40 लाख पुराने वाहनों का रजिस्ट्रेशन कैंसिल किया

चूंकि बड़ी तादाद में कारों का पंजीकरण रद्द हुआ है इसलिए यह देखने के लिए कि इन कारों को समेट सकने के लिए जगह है भी या नहीं फ़र्स्टपोस्ट मायापुरी के कबाड़ी बाजार पहुंचा. खुद का नाम रवीन्द्र कुमार बताने वाला एक शख्स यहां ठेकेदारी का काम करता है. दिल्ली में मौजूद प्रदूषण के स्तर के बारे में पूछताछ करने पर उसने सवाल किया कि केमिकल साइंस के एक्सपर्ट और हेल्थ एंड सेफ्टी इंस्पेक्टर्स किसी नई और निरापद तकनीक का विधान क्यों नहीं करते जिसका इस्तेमाल यहां काम करने वाले कार का कबाड़ निकालने में कर सकें? उसने बताया कि दिल्ली सरकार ने 1971 में पुरानी दिल्ली के मोतिया खान से कबाड़ी बाजार को यहां शिफ्ट कर दिया था और यह एक सरकारी मान्यता प्राप्त कबाड़ी बाजार है. उसने कहा कि धातुओं को काट-पीटकर उनकी रद्दी निकालने के काम को प्रदूषण फैलाने वाला माना जाता है जबकि यह एक जरुरत है. उसने अपनी बात में यह भी जोड़ा कि गैस कटर प्रदूषणकारी होता है लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ ज्यादा सख्त धातुओं के लिए किया जाता है. वाहन के अन्य हिस्सों को निकालने के लिए मजदूर हथौड़े और आरी का इस्तेमाल करते हैं.

यहां के ठेकेदारों का कहना है कि ऑटो-रिसाइकिलिंग एक जरुरत है लेकिन सरकार ऐसा नहीं समझती सो कबाड़ीबाजार में काम करने वालों के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षा के कवर भी मुहैया नहीं कराती.

प्रतिकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

टूटती-बिखरती कारों के इर्द-गिर्द वक्त गुजारने वाले एक अन्य ठेकेदार अमन ने बताया कि एक लाख लोग अपनी जीविका के लिए इस कबाड़ी बाजार पर निर्भर हैं. इनमें एक-चौथाई तादाद उन मजदूरों की है जो कार को टुकड़ों में तोड़ते हैं. लखनऊ के नसीम यहां मजदूर के तौर पर कुछ वर्षों से काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि एक कार को टुकड़े में तोड़ने के लिए 700 से 1500 रुपए की मजदूरी मिलती है, और एक कार को दो से तीन लोग मिलकर तोड़ते हैं जिसमें दो घंटे का समय लगता है. कार के तमाम कल-पुर्जे निकाल लिए जाने के बाद जब सिर्फ उसका ढांचा भर बचता है तो उसका क्या होता है? इसे बेलिंग मशीन में डाला जाता है. इस मशीन में एक हाइड्रोलिक कंप्रेसर और एक इंडक्शन मोटर लगा होता है. बेलिंग मशीन चलाने वाले एक कारीगर ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि इस 'मशीन से डीजल का धुआं नहीं निकलता. कार का ढांचा भीतर जाता है और एक बक्से की शक्ल लेकर मशीन से बाहर आता है. यह (मशीन) सड़क पर चलने वाली पुरानी कार की तुलना में कम प्रदूषणकारी है लेकिन अधिकारी हर समय हमारे पीछे पड़े रहते हैं.'

(बेलिंग मशीन में डालने के बाद टूटी हुई कारें एक क्यूब्स (चौकोर टुकड़े) की शक्ल में बाहर निकलती हैं फिर इन्हें रीसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) और मेल्टिंग (द्रवण) के लिए हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के शहरों में भेजा जाता है)

साल 2010 में यहां एक रेडियोएक्टिव विस्फोट हुआ था. उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने भूल से कोबाल्ट 60 से भरी धातु की एक नली कबाड़ में रख दिया था. विस्फोट की घटना के बाद गैस कटर के इस्तेमाल पर लाइसेंस आयद कर दी गई. यहां के ठेकेदारों को लगता है कि लाइसेंस आयद करने से रिश्वतखोरी और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा मिला है.

मंगलवार को दिल्ली में हर तरफ प्रदूषण भरे धुंध (स्मॉग) का साया देखा जा रहा है.

इस मौसम में दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्तर में प्रवेश कर गया है

लाइसेंस पैसे देकर एक दिन के अंदर हासिल किए जा सकते हैं 

इन लोगों का कहना है कि यह लाइसेंस एक लाख से भी कम रुपए में एक दिन के अंदर हासिल किए जा सकते हैं. और ई-वेस्ट सर्टिफिकेट तो उन लोगों को भी जारी किया जा रहा है जिनका अपना कोई कबाड़खाना भी नहीं. वक्त बीतने के साथ बाजार अपनी पुरानी जगह से खिसककर दिल्ली-हरियाणा बार्डर के नजफगढ़, हरियाणा के निकट के मुस्तफाबाद और यमुना पार के सोनिया विहार जैसे आवासीय इलाकों में चला आया है. यहां के ठेकेदारों का मानना है कि विस्फोट की घटना से मायापुरी के नाम पर धब्बा तो लगा लेकिन यह इलाका सुरक्षित न हो सका.

ठेकेदारों ने बताया कि नगरपालिका के अधिकारी यहां सिर्फ यह देखने के लिए दौरा करते हैं कि कहीं गैस-कटर का तो इस्तेमाल नहीं हो रहा, उन्हें इसके अलावा यहां की और कोई फिक्र नहीं होती. ठेकेदारों ने ध्यान दिलाया कि एक क्रशिंग प्लांट नोयडा में स्थापित हो रहा है. यहां सरकार की गहरी निगरानी में री-साइक्लिंग होगी. इस सूरत में उनके व्यवसाय में कमी आएगी.

महिन्द्रा एक्सेलो (पहले इसका नाम महिन्द्रा इंटरट्रेड था) और एमएसटीसी लिमिडेट (भारत सरकार का उपक्रम) ने नोएडा में सेरो (CERO) स्थापित करने के लिए हाथ मिलाया है. सेरो वाहनों के कल-पुर्जे और ढांचे को खोलने-निकालने और उनकी री-साइक्लिंग करने का पहला संगठित उपक्रम है. इसकी एक इकाई नोएडा में स्थापित की जानी है. इस इकाई में विशेष किस्म के इस्पात और लोहे से इतर अन्य धातुओं से बने ऑटोमोबाइल्स के कल-पुर्जों को री-साइकिल किया जायेगा. भारत में सालाना 8 टन इस्पात का स्क्रैप निकलता है. योजना री-साइक्लिंग के इस उपक्रम को आक्रामक अंदाज में पूरे भारत में फैलाने की है. मायापुरी के कबाड़ी बाजार के ठेकेदारों का सवाल है कि आखिर दिल्ली और केंद्र की सरकार उन्हें अपने पेशे के आधुनिक बनाने में मदद क्यों नहीं कर रही. वो ऐसे प्लांट (संयंत्र) क्यों बनाने जा रही है जिससे उनकी जीविका चली जाएगी. ठेकेदारों ने यह भी ध्यान दिलाया कि स्क्रैपिंग को लेकर कोई नीति नहीं बन पाई है.

मायापुरी के औद्योगिक जंकयार्ड में रोजाना 200 से 500 कारों को तोड़ा जाता है.

Delhi Mayapuri Junkyard

मायापुरी स्थित कबाड़ीबाजार में हर दिन 200 से 500 पुरानी कारों को काटा और तोड़ा जाता है (फोटो: फेसबुक से साभार)

दिल्ली में कोई भी अधिकृत स्क्रैपिंग यार्ड नहीं है 

साल 2018 के अगस्त में दिल्ली के परिवहन विभाग ने वाहनों के डिस्पोजल (निस्तारण) के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए ताकि सरकार एनजीटी के विभिन्न आदेशों का पालन कर सके. दिशा-निर्देश के 12वें खंड में जब्तशुदा और परित्यक्त वाहनों की स्क्रैपिंग प्रक्रिया के बारे में बताया गया है. इसमें कहा गया है कि दिल्ली ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम, नई दिल्ली म्युनिस्पल काउंसिल (एनडीएमसी), कैंटोनमेंट बोर्ड और परिवहन विभाग अपनी उम्र गुजार चुके वाहनों (एंड ऑफ लाइफ ह्वीकल) को चलता पाए जाने, सार्वजनिक स्थानों में पार्क किए जाने या बेकार समझकर छोड़ दिए जाने की स्थिति में जब्त कर सकते हैं. जब्त करने के बाद ऐसे वाहनों को अधिकृत स्क्रैपर को दे दिया जाएगा. लेकिन दिल्ली में कोई भी अधिकृत स्क्रैपिंग यार्ड नहीं है हालांकि दिल्ली सरकार ऐसी एजेंसी को सत्यापित करने की प्रक्रिया शुरु करने वाली है. अधिकृत स्क्रैपर बनने के लिए जरुरी है कि ऐसी सुविधा मुहैया करा रहे केंद्र का दिल्ली में दफ्तर हो. साथ ही स्क्रैपिंग यार्ड गैर-रिहायशी, गैर-औद्योगिक/गैर-व्यावसायिक इलाके में कम से कम 1000 वर्गयार्ड (9000 वर्गफीट) में बना होना चाहिए. लेकिन दिल्ली के ज्यादातर बाजार आवासीय और व्यावसायिक इलाकों के मिश्रित रुप हैं.

उम्मीद की जा रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर 1 अप्रैल, 2020 वाहनों से संबंधित स्क्रैपिंग नीति अमल में आ जाएगी. वर्ष 2020 से वो तमाम वाहन जिनका पंजीकरण वर्ष 2000 से पहले का है, सड़क से हटा लिए जाएंगे. फिलहाल सरकार का अनुमान है कि वर्ष 2000 से पहले के पंजीकरण वाले कारों की तादाद 6.4 लाख है. वर्ष 2000 में बीएस -I इमिशन की शुरुआत हुई थी. नीति के एक हिस्से के तहत वाहन मालिकों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वो अपने वाहनों को स्क्रैपिंग के लिए दें. इस सिलसिले में इस्पात मंत्रालय को स्क्रैपिंग यूनिट लगाना है और वन तथा पर्यावरण मंत्रालय कुछ नए नियम-निर्देश जारी करने वाला है. मार्च में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में एक उच्चस्तरीय बैठक हुई. इसमें नीति आयोग के सीईओ और वित्त, भारी उद्योग, ट्रांसपोर्ट, डीआईपीपी और एमएसएमई मंत्रालयों के सचिवों ने शिरकत की. बैठक में स्क्रैपिंग पॉलिसी को सिद्धांत रुप में मंजूरी दी गई.

Car Scrap Delhi

मायापुरी इंडस्ट्रियल जंकयार्ड में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है. यहां रोजाना मेडिकल इमर्जेंसी के हालात बनते हैं (फोटो: फेसबुक से साभार)

वाहनों के निस्तारण को लेकर एक कॉमन फ्रेमवर्क बनाने की जरुरत

साल 2018 की जुलाई में दिल्ली स्थित थिंक-टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायर्नमेंट (सीएसई) ने एक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट का शीर्षक था ‘क्लंकर्ड: काम्बैटिंग डम्पिंग ऑफ यूज्ड ह्वीकल्स- ए रोडमैप फॉर अफ्रीका एंड साऊथ एशिया.' रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि वाहन के निर्माता की जिम्मेदारी की धारणा पर नए सिरे से सोचने की जरुरत है. वाहनों की जिम्मेदारी से संबंधित इस धारणा में है कि निर्माता को देश की अर्थव्यवस्था के दायरे में वाहन वापस लेने होंगे, उनकी री-साइक्लिंग करनी होगी और अंतिम रुप से निस्तारण (डिस्पॉजल) भी करना होगा. यह काम ग्लोबल सप्लाई चेन के हिस्से के रुप में होगा. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और क्षेत्रीय व्यापारिक संगठन सरीखे व्यावसायिक मंच, यूएनएफसीसीसी जैसे बहुराष्ट्रीय मंच और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के मकसद से बने संगठन जैसे जी8, जी20 आदि को इस्तेमाल किए गए वाहन के निस्तारण को लेकर एक कॉमन फ्रेमवर्क (सर्वसामान्य रुपरेखा) बनाने की जरुरत है.

व्यावसायिक वाहनों की स्क्रैपिंग को बढ़ावा देने के लिए कुछ पहलकदमियां सुझाई गई हैं जिसमें जीएसटी को कम करना और वाहनों का उचित मूल्य निर्धारण शामिल है. इससे वाहनों की कीमत में 15 से 20 प्रतिशत की कमी आएगी. बढ़ावे के ऐसे ही उपाय निजी वाहनों के लिए भी किए जा सकते हैं ताकि प्रदूषण का कारण बनने वाली पुरानी कारों का फिर से रजिस्ट्रेशन करवाकर उन्हें छोटे शहरों में न भेज दिया जाए. जब तक जमीनी स्तर पर तैयारियां पूरी नहीं हो जातीं तब तक लाखों कारों का पंजीकरण रद्द करने के आदेश का पालन कर पाना बहुत कठिन है.

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi