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प्रदूषण के कारण पिछले दो दशकों में जीने की संभावना में 10 साल की कमी आई

दो दशको में साल 2016 ऐसा रहा जब प्रदूषण का स्तर सबसे घातक रहा

Updated On: Nov 19, 2018 09:21 PM IST

Bhasha

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प्रदूषण के कारण पिछले दो दशकों में जीने की संभावना में 10 साल की कमी आई

सोमवार को एक अध्ययन में कहा गया कि पिछले दो दशकों के दौरान दिल्ली की हवा की गुणवत्ता 2016 में सबसे ज्यादा घातक थी. इसी के साथ इससे एक नागरिक की जीने की संभावना में 10 साल से अधिक की कमी आई है. इसमें यह भी बताया गया कि राष्ट्रीय राजधानी, देश के 50 सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में दूसरे नंबर पर रही.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत इस समय दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश है. उससे ऊपर केवल नेपाल है. इसमें कहा गया कि एशिया में जीवन संभावना की कमी सबसे ज्यादा हुई है. जो भारत और चीन के अनेक हिस्सों में छह साल से ज्यादा कम हो गई है.

एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो (एपिक) द्वारा तैयार वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक और रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में सूक्ष्मकणों से प्रदूषण से औसत जीवन संभावना 1.8 वर्ष कम हुई है. जो मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा वैश्विक खतरा बन रही है.

आतंकवाद से 25 गुना ज्यादा प्रभाव के प्रदूषण का

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘सूक्ष्मकणों से प्रदूषण का जीवन की संभावना पर असर एक बार के धूम्रपान से पड़ने वाले असर के बराबर, दोगुने अल्कोहल और मादक पदार्थ के सेवन, असुरक्षित पानी के तीन गुना इस्तेमाल, एचआईवी-एड्स के पांच गुना संक्रमण और आतंकवाद या संघर्ष से 25 गुना ज्यादा प्रभाव के बराबर हो सकता है.’

अध्ययन के मुताबिक पिछले दो दशकों में भारत में सूक्ष्मकणों की घनत्व औसतन 69 प्रतिशत बढ़ गया. जिससे एक भारतीय नागरिक की जीवन अवधि की संभावना 4.3 साल कम हुई है. जबकि 1996 में जीवन की संभावना में 2.2 साल की कमी का अनुमान लगाया गया था. देश के 50 सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में दिल्ली का स्थान बुलंदशहर के बाद दूसरे नंबर पर था.

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