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एससी-एसटी एक्ट का कमजोर होना 'राष्ट्रहित' को कमजोर करता है

भारत के हर चौथे व्यक्ति के हितों की रक्षा करने वाले कानून को कमजोर करना सही नहीं है

Updated On: Mar 24, 2018 05:24 PM IST

Dilip C Mandal Dilip C Mandal
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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एससी-एसटी एक्ट का कमजोर होना 'राष्ट्रहित' को कमजोर करता है

एससी-एसटी यानी दलित और आदिवासी अत्याचार निरोधक अधिनियम 1989 कोई साधारण कानून नहीं है. यह देश के लगभग 25 प्रतिशत यानी हर चौथे भारतीय को जाति उत्पीड़न से बचाने का कानून है. आजादी के कई दशक बाद भी जब जाति उत्पीड़न कम नहीं हुए, तब संसद को यह कानून बनाना पड़ा था.

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने पिछले दिनों एक फैसले में इस कानून की एक न्ई व्याख्या दी है. इस फैसले से यह कानून पहले से काफी कमजोर हो गया है. प्रस्तुत लेख इस फैसले और उसके संभावित प्रभाव की समीक्षा और मीमांसा के मकसद से लिखा गया है ताकि इस पर राष्ट्रीय बहस हो सके. यह इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि कई राजनीतिक दल, जिनमें सत्ताधारी गठबंधन के दल भी शामिल है, इस फैसले को एससी-एसटी हितों के खिलाफ मानते हैं और चाहते हैं कि इस कानून का पुराना स्वरूप फिर से बहाल हो. कई सामाजिक संगठन भी ऐसी ही मांग कर रहे हैं.

यह फैसला जिस मामले में आया है वह महाराष्ट्र से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसले में मुख्य रूप से ये नई व्यवस्थाएं हैं.

इस एक्ट के तहत दायर मामलों में गिरफ्तारी जरूरी नहीं है. इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था. नए फैसले के बाद अग्रिम जमानत लेना मुमकिन हो जाएगा.

मौजूदा कानून के तहत दर्ज मामलों में अगर आरोपी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी है, तो उसे नियुक्त करने वाले की सहमति के बिना उसकी गिरफ्तारी नहीं होगी.

अगर आरोपित व्यक्ति सरकारी कर्मचारी नहीं है, तो उसकी गिरफ्तारी के लिए एसएसपी स्तर के अधिकारी की मंजूरी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस धारा के तहत कोई शिकायत आने पर सात दिनों के अंदर डीएसपी द्वारा शुरुआती जांच कर ली जाए ताकि कोई निर्दोष व्यक्ति न फंसे.

इन परिवर्तनों के बाद एससी-एसटी एक्ट दरअसल निरर्थक हो जाएगा क्योंकि इस धारा में गिरफ्तारी लगभग असंभव हो जाएगी. समाज में दलितों और आदिवासियों की जो स्थिति है, उसमें उनके लिए किसी एसएसपी स्तर के अधिकारी की मंजूरी ले पाना आसान नहीं होगा. सरकारी कर्मचारियों के उत्पीड़न के केस में गिरफ्तारी और भी ज्यादा मुश्किल होगी, क्योंकि उनकी गिरफ्तारी उसी विभाग के ऊपर के अधिकारियों के विवेक पर निर्भर होगी. साथ ही एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच पूरी कर लेने का तर्क भी इस कानून की दृष्टि से समझ से परे हैं.

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क्या कहा है सुप्रीम कोर्ट ने

A view of the Indian Supreme Court building is seen in New Delhi

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देने के क्रम में लिखा है कि एससी-एसटी कानून का मकसद किसी निर्दोष व्यक्ति को अभियुक्त चिन्हित करना नहीं था. न ही इस कानून का मकसद किसी सरकारी कर्मचारी को काम करने से रोकना था. सुप्रीम कोर्ट की पीठ का मानना है कि पिछले कुछ दशकों का अनुभव बताता है कि पंचायत, नगरपालिका और अन्य चुनावो में आपसी झगड़ा निपटाने के लिए निहित स्वार्थी तत्व इस कानून का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. साथ ही सरकारी कर्मचारियों को इस कानून के जरिए परेशान करने की भी घटनाएं हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट की पीठ के मुताबिक, किसी को एंटीसिपेटरी बेल न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है.

सवाल उठता है कि एससी-एसटी एक्ट में ये प्रावधान किए क्यों गए थे और लगभग तीन दशक से ये प्रावधान क्यों बने रहे? आखिर ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि केंद्र सरकार ने 1989 में यह कानून बनाया और इतने सख्त प्रावधान किए.

मौजूदा कानून एससी-एसटी के खिलाफ उत्पीड़न रोकने में नाकाफी- किसी भी व्यक्ति के प्रति किया गया कोई जुल्म या अत्याचार या अपराध भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी के तहत दंडनीय है. लेकिन इन कानूनों के रहते हुए भी दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं में कमी नहीं आई है. हालांकि उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करने को लेकर टालमटोल आम है, फिर भी 2016 में भारत में दलित उत्पीड़न के 40 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए.

छुआछूत का अंत नहीं हुआ- संविधान में छुआछूत का निषेध किया गया है. लेकिन छुआछूत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. छुआछूत के तरीके बदल गए हैं, हालांकि कई जगहों पर वह पूराने रूपों में भी लागू है. अभी भी कई स्थानों पर मंदिरों में प्रवेश के लिए दलितों को आंदोलन करना पड़ता है. होटलों में टू ग्लास सिस्टम भी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ऐसी घटनाएं भी हुई हैं, जब स्कूलों में पोषाहार कार्यक्रम में सवर्ण बच्चों ने दलित महिला के हाथ का बना खाने से इनकार कर दिया.

एससी और एसटी अब भी वंचित बने हुए हैं- आजादी के इतने साल बाद भी इन समुदायों का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है. बाकी समुदायों की तुलना में शिक्षा, स्वास्थ्य समेत मानव विकास के तमाम मानकों पर दलित और आदिवासी पीछे हैं. इन्हें आगे लाने की तमाम सरकारी योजनाएं अपने लक्ष्य हासिल करने में विफल साबित हुई है.

एससी-एसटी को न्याय देना भारतीय राष्ट्र राज्य का वादा है- दरअसल ये दो समुदाय भारतीय समाज व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर हैं. इनको राष्ट्र निर्माण में शामिल करने को संविधान निर्माताओं ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य माना था. इसलिए संविधान के मूल अधिकार के अध्याय में सभी नागरिकों को कानून समान मानते हुए भी कहा गया है कि सरकार सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या एससी-एसटी के लिए विशेष प्रावधान कर सकती है. इसे समानता के अधिकार के विरुद्ध नहीं माना गया है. यह बात संविधान के अनुच्छेद 15(4) में स्पष्ट तौर पर लिखी गई है.

जब संविधान, कानून की नजरों में हर नागरिक को समान मानते हुए भी सरकार को यह अधिकार देता है कि वह एससी और एसटी के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है, तो इसका स्पष्ट मतलब है कि इन समुदायों को आगे लाने के कार्य को कितना महत्वपूर्ण माना गया है. खासकर दलितों के मामले में तो यह 1932 के पूना पैक्ट का वादा है. यह समझौता हिंदू सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों और उस समय के अछूतों के बीच हुआ था, ताकि वे सेपरेट इलेक्टोरेट यानी अलग मतदान क्षेत्र न मांगे. मोहनदास करमचंद गांधी के उपवास के बाद बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर हालांकि अलग मतदान क्षेत्र की मांग को छोड़ने के लिए तैयार हो गए. लेकिन इस समझौते में यह निहित था कि अछूतों के लिए विशेष प्रावधान किए जाएंगे. भारत के राष्ट्र बनने की दिशा में इस समझौते को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है.

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यह बात भी समझने की है कि आजादी के बाद दलित और आदिवासियों को आम तौर पर सरकार और सत्ता से बहुत कुछ मिला नहीं है. उनकी गरीबी इस बात का प्रमाण है. इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र पर उनका भरोसा कायम है, क्योंकि उन्हें लगता है कि संविधान में उनकी बात की गई है और राज्य की संस्थाओं में उनकी बात सुनी और समझी जाती है. ऐसे में अगर न्यायपालिका उनके हितों के खिलाफ जाती है, तो यह सिर्फ दलितों और आदिवासियों के लिए चिंता का कारण नहीं है. भारत की एकता के तमाम पक्षधरों को यह सोचना होगा कि इतनी बड़ी आबादी का अगर देश की संस्थाओं पर भरोसा टूटता है, तो यह कितने चिंता की बात है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की धाराओं को कमजोर करने के लिए एक प्रमुख तर्क यह दिया है कि इस धारा के तहत दर्ज होने वाले मामलों में ज्यादातर खारिज हो जाते हैं और कम मामलों में ही सजा होती है. सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य के आधार पर माना है कि बड़ी संख्या में फर्जी केस दायर हो रहे हैं. जबकि इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां सही तरह से अपना काम नहीं कर रही हैं और कमजोर केस बनाने के कारण कम ही मामलों में सजा हो पाती है.

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एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में विभिन्न संस्थाओं के बीच कार्यों और जिम्मेदारियों का विभाजन है. कानून बनाना संसद और विधानमंडलों का कार्य है. न्यायपालिका को इन कानूनों के हिसाब से फैसले सुनने और कानूनों की व्याख्या करने का अधिकार है. इस खास मामले में न्यापालिका ने उस कानून के प्रावधानों को बदल दिया है, जिसे संसद ने पास किया है. संविधान विशेषज्ञों को विचार करना चाहिए कि न्यायपालिका के मौजूदा फैसले की संवैधानिकता क्या है.

यह तर्क भी आसानी से स्वीकार्य नहीं हो सकता कि चूंकि कानून का दुरुपयोग होने की घटनाएं हुई हैं, इसलिए कानून को ही बदल दिया जाए. कानून को सही ढंग से लागू करना न्यायपालिका और जांच एजेंसियों और पुलिस का काम है. उन्हें अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभानी चाहिए ताकि कानून का गलत इस्तेमाल न हो.

सरकार को अविलंब इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और एससी-एसटी के हित में बनाए गए कानूनी प्रावधानों को फिर से बहाल करने के लिए तमाम प्रयास करने चाहिए.

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