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इलाहाबाद की घटना को जातीय रंग देना बौद्धिक चालबाजी है

इलाहाबाद में लॉ के छात्र की हत्या को शातिराना तरीके जातीय विवाद के रूप में तब्दील किए जाने के प्रयास तेज हैं. सोशल मीडिया इसमें बड़ा रोल प्ले कर रहा है

Updated On: Feb 15, 2018 08:38 AM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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इलाहाबाद की घटना को जातीय रंग देना बौद्धिक चालबाजी है

इलाहाबाद में एलएलबी के छात्र दिलीप सरोज की हत्या का आरोपी विजय शंकर सिंह गिरफ्तार कर लिया गया है. रविवार को इस घटना के घटने और बुधवार को आरोपी विजय शंकर सिंह की गिरफ्तारी के बीच यूनिवर्सिटी के छात्रों ने खूब बवाल भी मचाया है. लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां इस विवाद के बीच में आ चुकी हैं और योगी सरकार में लॉ एंड ऑर्डर पर तीखे सवाल पूछे जा रहे हैं.

हत्या की घटना के बाद सरकार पर आरोप लगना और उसकी खिंचाई होना तो बहुत स्वाभाविक बात है. ये मामला भी आम मारपीट की घटना से कहीं ज्यादा बढ़ गया था. एक छात्र को रेस्टोरेंट के बाहर घसीटकर अधमरा हो जाने के बावजूद पत्थर और लोहे की रॉड से मारा गया. यूनिवर्सिटी के छात्रों का इस घटना पर आक्रोशित हो जाना स्वाभाविक है. लेकिन इन सबके बीच सोशल मीडिया से इस पूरी घटना को देखने वालों ने इसे जातीय संघर्ष में तब्दील कर दिया है. दिल्ली में मीडिया से कुछ ऐसी भी रिपोर्ट्स लिखी गईं कि ये मामला जातीय विवाद का है.

दरअसल कभी-कभी या कह सकते हैं अक्सर, घटना की तह तक पहुंचे बिना हर घटना को एक एंगल दे देने की ‘बीमारी’ व्यापक होती जा रही है. इस घटना को जातीय रंग देने वाले अतिरेक के शिकार लगते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि हर घटना रोहित वेमुला कांड नहीं है. रोहित वेमुला ने चिट्ठी लिखकर प्रशासन के खिलाफ आरोप लगाए थे. वहां पीड़ित द्वारा स्पष्ट किया गया था कि उसके साथ जातीय भेदभाव हो रहा है. लेकिन यहां घटना घटने के जैसे ही बाद पीड़ित की जाति पता चली तो जातीय विवाद की बात जोर पकड़ने लगी.

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अंबेडकर की तस्वीर के साथ रोहित वेमुला (तस्वीर: फेसबुक से)

इस घटना के बाद स्थानीय अखबारों के जरिए जो भी जानकारी आई उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि ये विवाद की एक घटना थी जिसने वीभत्स रूप अख्तियार कर लिया.

प्रतिष्ठा और बाहुबल का जोर

दरअसल ये मामला जातीय हिंसा से इतर उस ‘माचो’ स्टाइल तक जाता है जहां पूर्वांचल में युवा गली मुक्केबाजी को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखता है. जिन शहरों में छात्र नेताओं को उनकी काबिलियत के बजाय दबंगई और बाहुबल के लिए प्रतिष्ठा मिलती हो. जहां ये किस्से सुनाए जाते हों कि कैसे किसी एक ने बीसियों को अकेले दम मारकर भगा दिया. कैसे फलां चुनाव में उसके नॉमिनेशन के दौरान सैंकड़ों गाड़ियां मौजूद थीं? फलां आदमी इतना प्रभावशाली है कि उसकी एक पुकार पर सैंकड़ों लोग घेर कर खड़े हो जाते हैं.

ये माहौल पूर्वांचल और उसके आस-पास के इलाकों में दशकों में तैयार हुआ है. सवर्ण हो या दलित हर व्यक्ति अपने रुतबे को बढ़ाने में लगा हुआ है. धनबल, बाहुबल जिसके मूल में बसते हैं. ये जातीय अस्मिता से कहीं दूर आगे बढ़ चुकी मानसिकता है. इसमें जो घुसेगा वो उसी ‘जाति’ का हो जाएगा. बंगाल में एक कहावत है जेई जाए लॉन्का, सेई हॉए रावण यानी जो भी लंका जाता है, रावण बन जाता है.

ये थी असल कहानी

जानकारी के मुताबिक, विजय शंकर और दिलीप में जब पहली बार विवाद हुआ तो थोड़ी झड़प के बाद दिलीप वापस लौट गया. लेकिन फिर थोड़ी देर बाद अपने दोस्तों के साथ वो फिर वापस लौटा. क्यों? इसलिए कि उसे भी सिद्ध करना था कि वो तथाकथित बाहुबल में किसी से कम नहीं है. उसके वापस लौटने के बाद उसके और उसके साथियों द्वारा विजय शंकर और उसके दोस्तों पर कुर्सी से हमला करने के वीडियो भी मौजूद हैं. लेकिन इस बार जब विजय शंकर और उसके दोस्तों ने भी पलट कर हमला किया तो दिलीप के दोस्त भाग निकले. दिलीप गुस्साए विजय शंकर और उसके साथियों के हाथ लग गया. कहासुनी की एक सामान्य घटना दुर्दांत वारदात में तब्दील हो गई.

इसके बाद शहर में विवाद शुरू हुआ और जातीय रंग दिखने लगे. आरोपी ठाकुर जाति का है और पीड़ित दलित. बिना जाने समझे इसे सीएम योगी की जाति से जोड़ दिया गया.

लेकिन इसे जातीय विवाद से जोड़कर देखने वाले क्या इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब दिलीप की तरफ से फेंकी गई कोई कुर्सी जाकर विजय शंकर के सिर से टकरा जाती और उसकी मौत हो जाती तो भी क्या ये जातीय विवाद होता? शायद नहीं.

शब्दों के महत्व को खत्म कर देगी ये प्रवृत्ति

दिक्कत ये है कि सोशल मीडिया के जरिए तेजी से उग रही स्यूडो सेकुलर की फसल को ये मालूम नहीं है कि किसी संदर्भ के अत्यधिक इस्तेमाल के कुपरिणाम क्या होते हैं. बीती यूपीए की सरकार और वर्तमान एनडीए सरकार इसके प्रमाण हैं. यूपीए की सरकार के दौरान ‘सेकुलर’ शब्द का इतना बेजा इस्तेमाल हुआ कि अगर 2014 में किसी शब्द का सबसे ज्यादा मजाक उड़ा तो वो ‘सेकुलर’ ही था. ठीक ऐसा ही वर्तमान सरकार राष्ट्रवाद के साथ कर रही है. हर बात को राष्ट्रवाद के एंगल पर खत्म किया जा रहा है. हर बात के साथ राष्ट्रवाद प्रीफिक्स के तौर पर जोड़ दिया जा रहा है. टीवी पर बहुत आम बहस में बीजेपी के नेता ये कहते सुने गए कि भारत माता की जय बोलिए. स्थिति ये बन चुकी है कि राष्ट्रवाद जैसा बेहद गंभीर टर्म अब मजाक के तौर पर भी इस्तेमाल होने लगा है. शायद ऐसा पहले होते हमने कभी नहीं सुना था.

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दिलीप सरोज की हत्या के बाद शहर में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान फूंकी गई बस

अब जिस तरीके से घटनाओं को जातीय रंग दिया जा रहा है वो भी आने वाले समय में ‘जातीय विवाद’ टर्म के महत्व को समाप्त कर देगा. ये सिर्फ सोचने वाली बात हो सकती है कि भारत जैसे देश जहां सामंतवाद के खिलाफ लंबी जंग चली हो वहां जातीय विवाद मजाक का पात्र बन जाए. और शायद ऐसा होना शुरू भी हो चुका है.

धर्मवीर भारती और जवाहर लाल नेहरू के शहर कहे जाने वाले इलाहाबाद के लिए जितना दुखद दिलीप सरोज की हत्या का मामला है उतना ही दुखद ये भी है कि आपराधिक घटना को सवर्ण बनाम दलित की लड़ाई से जोड़ दिया जाए. आखिर इसका हासिल क्या होगा? ये तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग इस बात को समझने की भूल कर रहा है कि जो घृणा हमारे समाज में पहले से मौजूद है उस आग में वो घी डालने का काम कर रहा है. ये हमारे समाज को सिर्फ बीमार करेगा और इसका जिम्मेदार हमारा यही बुद्धिजीवी वर्ग होगा.

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