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मौत की सजा से क्या लड़कियों की सुरक्षा मुमकिन है!

Updated On: Apr 23, 2018 08:43 PM IST

Sonia Pereira

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मौत की सजा से क्या लड़कियों की सुरक्षा मुमकिन है!

बच्चियों के साथ दुष्कर्म और घिनौनी हरकतों की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं. कठुआ, उन्नाव और सूरत में हुए रेप कांड के बाद उभरे जनाक्रोश को देखते हुए सरकार ने एक अध्यादेश पेश किया है, जिसमें 12 साल से कम उम्र की बच्ची से रेप पर मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान किया गया है. इस प्रावधान से रेप के मामले कम होने के बजाय इसका उल्टा असर होगा यानी यह नुकसानदेह साबित हो सकता है.

दरअसल, इससे बच्चियां और खतरे में पड़ सकती हैं. यह आगामी चुनाव को अपने पक्ष में करने और तुष्टिकरण के मकसद से सरकार द्वारा एक और त्वरित प्रतिक्रिया का मामला है. बाल अधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इस सिलसिले में व्यापक शोध किया है और उनकी विशेषज्ञता के मुताबिक मौत की सजा के प्रावधान से रेप की घटनाएं कम होने की बात कई गलतफहमियों पर आधारित है.

गलतफहमी#1:  मौत की सजा के डर से बच्चियों से रेप के मामले कम होंगे

मौत की सजा किसी भी अपराध को रोकने के टूल के तौर पर काम करती है, इस बात को लेकर संतोषजनक सबूत नहीं हैं और इस तरह का कोई भी लिंक ठोस तौर पर देखने को नहीं मिला है. पहला, जस्टिस वर्मा कमेटी ने कहा था कि रेप के लिए मौत की सजा दिया जाना प्रतिगामी है और मुमकिन है कि इसका बचावकारी असर नहीं हो. दूसरा, हमें रेप को लेकर समझ का दायरा बढ़ाते हुए इसे सेक्स संबंधी हिंसा से परे देखने की जरूरत है. साथ ही, यह समझना चाहिए कि सदियों से चले रहे पुरुषों के दबदबे की पृष्ठभूमि में मामला लड़कियों पर हावी होने और उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करने का है.

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मौत की सजा के प्रावधान से रेप की संख्या में कमी के बजाय इससे बच्चियों और खतरे में पड़ जाएंगी. दरअसल अपराध करने वाला शख्स पीड़ित बच्ची की हत्या भी करने से बाज नहीं आएगा, जैसा कि कठुआ मामले में हुआ. इससे बच्ची के अदालत में बयान देने का खतरा भी रहेगा.

इसके अलावा, बच्चियों के साथ यौन हिंसा के मामले दर्ज होने की संख्या पहले ही काफी कम है और मौत की सजा के डर से परिवार इस तरह के अपराध दर्ज कराने में और हिचकिचाएंगे. खासतौर पर ऐसी स्थिति में यह देखने को मिलेगा, जब अपराध करने वाला कोई जान-पहचान का शख्स हो, जैसा कि अक्सर देखने को मिलता है.

गलतफहमी#2: बच्ची से रेप में मौजूदा सजा पर्याप्त नहीं है

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत रेप का दोषी पाए जाने और बच्चे/बच्चियों को यौन अपराध से सुरक्षा कानून 2012 के तहत यौन हिंसा के मामले में एक शख्स को कम से कम 10 साल की सश्रम जेल हो सकती है. आईपीसी के तहत अधिकतम सजा आजीवन कारावास है, प्रस्तावित अध्यादेश के तहत 12 साल से कम की बच्ची से रेप पर अधिकतम सजा 20 साल की जेल होगी और इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास या मौत की सजा तक किया जा सकता है.

हालांकि, इस सिलसिले में की गई शोध से खुलासा हुआ है कि अधिकतम सजा का आदेश नहीं के बराबर जारी किया जाता है. [3] दरअसल, रिपोर्ट में बताया गया है कि सजा के अधिकतर मामलों में विशेष अदालतें न्यूनतम सजा का ऐलान करती हैं और यहां तक कि कुछ मामलों में जरूरी न्यूनतम सजा से कम सजा ऐलान करती हैं. न्याय सुनिश्चित करने के लिए सजा की निश्चितता जरूरी है, न कि सजा को और बढ़ाया जाना.

गलतफहमी#3: हमारी मौजूदा आपराधिक न्याय प्रणाली बच्चियों से यौन हिंसा के मामलों से असरदार तरीके से निपटने में कारगर है

बच्चे/बच्चियों को यौन अपराध से सुरक्षा कानून 2012 के तहत त्वरित और कारगर न्याय के लिए विशेष अदालतें बनाई गईं, ताकि इस वर्ग की खास जरूरतों का ध्यान रखा जा सके. हालांकि, ये विशेष अदालतें वास्तव में विशेष नहीं थीं। रिसर्च बताते हैं कि न्याय प्रक्रिया में शामिल शख्सियतें नियमित तौर पर जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन करती हैं.

मिसाल के तौर पर बच्चों को अक्सर अभियुक्त के सामने पेश किया जाता है और पीड़िता से कड़ी पूछताछ की जाती है, इससे पीड़िता गवाही में टूट जाती है. खास तौर पर गवाहों के लिए सुरक्षा का कोई सिस्टम नहीं होने के कारण ऐसा होता है. जांच में ढिलाई और उम्र तय करने में दिक्कतों का मामला काफी आम है और मुकदमे अक्सर एक साल से ज्यादा तक खिंच जाते हैं, जबकि ऐसे मामलों को निपटाने के लिए एक साल की समयसीमा तय की गई है.

एनसीआरबी के 2016 के अपराध संबंधी आंकड़ों के मुताबिक, बच्चे-बच्चियों की यौन हिंसा से सुरक्षा कानून के तहत 89 फीसदी ट्रायल पेंडिंग थे. इसके अलावा, उसी रिपोर्ट के मुताबिक, रेप के मामले में सजा की दर महज 29 फीसदी थी. इस बात को ध्यान में रखते हुए न्याय मुहैया कराने की मौजूदा प्रणाली में कानूनों पर अमल ठीक ढंग से नहीं पो रहा है, इस बात की संभावना बेहद कम है कि पुलिस और न्याय प्रणाली मौत की सजा दिए जाने के लिए बड़े पैमाने पर जरूरी दस्तावेजों को इकट्ठा करने में सक्षम होंगे.

गलतफहमी#4 : बच्चियों से साथ यौन उत्पीड़न हमेशा निर्मम तरीके से होता है और ज्यादातर अनजान लोग इसे अंजाम देते हैं

यौन अपराध के कई मामलों में अभियुक्त पीड़िता को जानता है और वह पड़ोसी, रिश्ते का भाई, बच्ची का सौतेला बाप या अपना पिता होता है. दरअसल, एनसीआरबी के आंकड़े यह भी बताते हैं कि 94.6 फीसदी मामले में पीड़िता अभियुक्त को जानती है. ऐसे मामलों में पीड़िता और यहां तक कि उसके परिवार से भी भावनात्मक रिश्ता बनाया जाता है. लिहाजा, अपराध दर्ज कराने के लिए लोग बिल्कुल तैयार नहीं होते.

खास तौर पर जब पीड़ित परिवार अभियुक्त पर वित्तीय और किसी अन्य तरीके से निर्भर रहता है या अभियुक्त असरदार शख्स है, तो अपराध दर्ज कराने को लेकर हिचकिचाहट और बढ़ जाती है. कठुआ और उन्नाव दोनों मामलों में इस जघन्य अपराध को दबाने के लिए पुलिस अफसरों और स्थानीय नेताओं की तरफ से जबदस्त दबाव देखने को मिला.

मौत की सजा के प्रावधान के कारण पीड़ित बच्चियों का मुंह बंद करने के लिए उसके साथ और निर्ममता से पेश आया जा सकता है और उस बच्ची पर उस शख्स को फांसी दिलाने के अपराधबोध का बोझ होगा, जिसे वह अच्छी तरह से जानती है और किसी न किसी तरह से उससे जुड़ी हुई है.

गलतफहमी #5: पीड़िता इस अपराध के शिकार लोगों के लिए मौत की सजा चाहती है

बाल यौन उत्पीड़न की शिकार लड़की चाहती है कि उसकी बात पर यकीन किया जाए. उसके द्वारा बयां किए गए दर्द को गंभीरता से लिया जाए. यौन उत्पीड़न में सामाजिक कलंक का मामला काफी हावी है, लिहाजा, परिवार के करीबी सदस्य या तो बच्ची की बात पर भरोसा नहीं करते या फिर उसे चुप रहने के लिए मजबूत कर देते हैं.

RETRANSMISSION ----------Mumbai: Film producer and wife of actor Aamir Khan, Kiran Rao, takes part in a protest demanding justice for the victims of Kathua and Unnao rape cases, in Mumbai on Sunday. PTI Photo by Shashank Parade(PTI4_15_2018_000263B)

RETRANSMISSION ----------Mumbai: Film producer and wife of actor Aamir Khan, Kiran Rao, takes part in a protest demanding justice for the victims of Kathua and Unnao rape cases, in Mumbai on Sunday. PTI Photo by Shashank Parade(PTI4_15_2018_000263B)

पीड़िता में अक्सर शर्म और अपराधबोध का जबदस्त भाव होता है. पीड़िता अक्सर सख्त सजा से ज्यादा यह चाहती है कि उसके साथ दुष्कर्म का सिलसिला बंद हो और उसकी कहानी पर यकीन किया जाए.

इसके अलावा पीड़िता को घर बदलने, अपनी पढ़ाई जारी रखने या मेडिकल या मनोवैज्ञानिक इलाज के लिए मुआवजे की जरूरत होती है, खास तौर पर ऐसी स्थिति में जब वह वित्तीय तौर पर अभियुक्त पर निर्भर है. हालांकि, विशेष अदालतों द्वारा कभी-कभार ही मुआवजे का आदेश दिया जाता है और इसे गवाही और सजा की शर्त से भी जोड़ दिया जाता है, लिहाजा अंतरिम मुआवजे का मकसद पूरा नहीं हो पाता है.

हमारा रेस्पॉन्स क्या होना चाहिए?

बदले की भावना पर केंद्रित न्याय और मौत की सजा को समाधान की तरह पेश करने के बजाय रेप से जुड़ी अंतर्निहित मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक वजहों को दिमाग में रखते हुए इस पर गौर करना चाहिए.

-समुदाय और स्कूलों के अंदर जागरूकता और रोकथाम संबंधी अभियान, ढर्रागत चीजों को चुनौती देना और इस खतरे से जुड़े बच्चों की पहचान जरूरी है.

-न्याय मुहैया कराने की प्रणाली से जुड़े शख्स को संवदेनशील बनाया जाना चाहिए और उन्हें मौजूदा नियमों को असरदार तरीके से लागू करने के बारे में प्रशिक्षण मिलना चाहिए.

-कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए और जवाबदेही से जुड़े सख्त उपायों को लागू किया जाना चाहिए. इस प्रक्रिया में बाधा पहुंचानने वाले अफसर, वकील, जज और नेता के किलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए.

-केंद्र सरकार के स्तर पर पीड़िता और गवाह के लिए सुरक्षा योजना या कानून बाल गवाहों को समर्थन और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी ढांचा मुहैया कराएगी.

-निपुण सक्सेना बनाम केंद्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए यौन अपराधों से निपटने के लिए एनएएलएसए द्वारा तैयार की गई मुआवजा स्कीम को शुरू कर इस पर तेजी से अमल करना चाहिए. [12]

-काउंसेलिंग और शिक्षा जैसे पुनर्वास संबंधी उपाय काफी महत्वपूर्ण हैं.

-हर जिले में वन स्टॉप क्राइसिस सेंटर बनाया जाना चाहिए.

यह मानने के बजाय कि फांसी (जिस पर अमल की संभावना बेहद कम है) की सजा के प्रावधान से इस तरह से अपराधों को रोका जाएगा, यह जरूरी है कि हम इस बात के लिए हर मुमकिन कोशिश करें कि घटनास्थल पर इस तरह के अपराध को रोकन पर ध्यान केंद्रित किया जाए. ऐसा अपराध जिसका सिलसिला सदियों से चला आ रहा है.

(लेखिका मानवाधिकार मामलों से जुड़ी वकील हैं. वह फिलहाल बच्चों के अधिकारों के साथ काम करने वाले एक एनजीओ की कोऑर्डिनेटर भी हैं)

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