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बेटियां नहीं बचाई जा सकीं और भूख का ‘निवाला’ बन गईं

बात दो जून की रोटी की नहीं रही क्योंकि इन बच्चियों के पास रोटी के दो निवाले भी नहीं थे

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jul 26, 2018 11:20 PM IST

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बेटियां नहीं बचाई जा सकीं और भूख का ‘निवाला’ बन गईं

काम की तलाश में पिता घर से बाहर था. मां को होश नहीं था और भूख उसके तीन मासूमों को ‘निवाला’ बनाने में जुटी हुई थी. दिल्ली के एक मोहल्ले में बंद कमरे से तीन बेटियों के शव बरामद हुए. न तो उनके शरीर पर चोट के निशान थे और न ही उन्होंने जहर खाया था. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में जो सच सामने आया उससे सरकारें ही नहीं बल्कि दिल्ली और हम सब शर्मसार हुए हैं. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कहती है कि ये तीन बच्चियां 8 दिनों से भूखी थीं और इन्हें भूख ही खा गई. बात दो जून की रोटी की होती है लेकिन इन बच्चियों के पास  रोटी के दो निवाले भी नहीं थे.

दिल्ली यानी राजधानी ही नहीं बल्कि वो शहर जिस पर देश-दुनिया की नजर होती है. यहां की छोटी सी खबर भी देश के लिये बड़ी होती है. दिल्ली के मायने सिर्फ राजधानी तक ही सीमित नहीं. चकाचौंध, ग्लैमर, सियासत की उठापटक का शहर, तरक्की की रफ्तार के साथ तेज भागती जिंदगी और बड़े चेहरों-बड़े नामों से अपनी पहचान बनाने वाली ऐतिहासिक दिल्ली में मासूमों की मौत ने ये साबित कर दिया कि यहां किसी कोने में छुपा अंधेरा कितना स्याह है.

कहां गईं वो कैंटीन जो गरीबों को मुफ्त खाना देने का एलान करती हैं. कहां गई राशन की वो व्यवस्था जो हर परिवार को मुफ्त अनाज देने का दावा करती है. ये कितना शर्मनाक है कि गरीबों के लिये तमाम सरकारी योजनाओं को लागू करने का केंद्र कहलाने वाली दिल्ली में बेटियां भूख से मर जाती हैं और किसी को पता तक नहीं चलता है कि बच्चियां 8 दिनों से भूखी थीं.

डिजिटल इंडिया के दौर में देश को दुनिया के कोने-कोने से कनेक्ट करने की कोशिश की जा रही है और समाज अपने ही मोहल्ले में इस कदर कटा हुआ है कि उसे खबर ही नहीं कि 3 बच्चियां 8 दिनों से भूखी हैं.

इसी दिल्ली में एक सीजन में लाखों शादियां होती हैं जो रिकॉर्ड बनाती हैं. लाखों रुपये का खाना बर्बाद होता है. इसी जगमगाती दिल्ली की चकाचौंध में गरीब बस्तियों के बंद कमरे में भूखे पेट सोने वाले झूठी उम्मीद के साथ सुबह का इंतजार कर रहे होते हैं.

ये सिर्फ दिल्ली के मंडावली की कहानी नहीं है. ये समाज के संवेदनहीन होने के चलते देश के कई इलाकों की हकीकत  है. इससे पहले झारखंड के सिमडेगा में एक 11 साल की बच्ची की भूख से मौत हो गई थी. बच्ची के परिवार को अनाज इसलिये नहीं मिल सका था क्योंकि उसके राशन कार्ड से आधार कार्ड लिंक नहीं था. दोनों ही घटनाओं का लिंक भूख से है. यहां न राशन कार्ड था और न बनाने को राशन.

Arvind Kejriwal at P Chidambaram residence

सियासत सवाल उठा रही है दिल्ली सरकार पर. सवाल उठ रहे हैं सीएम केजरीवाल और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया पर. दिल्ली सरकार पर आरोप है कि वो फ्री पानी और फ्री वाईफाई तो दे सकती है लेकिन उसकी हुकूमत में मासूम भूख से मर रहे हैं. सवाल दिल्ली सरकार की तरफ से भी उठ रहे हैं कि उनकी डोर स्टेप राशन व्यवस्था ऐसी ही घटनाओं को रोकने के लिये है ताकि कोई भूख से न मरे.

सियासत आरोपों में उलझी हुई है और योजनाओं के फाइलों में फंसे होने की दलील दी जा रही है तो गरीबों के राशन कार्ड, बीपीएल कार्ड, पेंशन कार्ड जैसे न मालूम योजनाएं के कितने कार्ड न बनने के आरोप लग रहे हैं.

लेकिन बंद कमरों में भूख से बेटियों की मौत पर समाज के ठेकेदार मौन धरे हुए हैं. ये लोग उसी समाज का हिस्सा हैं जो कभी आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर संग्राम छेड़ देते हैं तो कभी जाति और मजहब के नाम पर सड़कों पर आक्रोश दिखाते हैं. लेकिन ऐसी संवेदनशील घटनाओं पर चुप्पी मार जाते हैं. अपने ही इलाकों में आपस में अंजान रहने और खुद में सिमटे रहने की आदत ही भावनात्मक रूप से शून्य बनाने का काम कर रही है.

मशहूर शायर दुष्यंत कुमार ने लिखा था कि, ' इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात....अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां.'

मंडावली की ये घटना आज के संवेदनहीन समाज के आइने का असल अक्स है जिसमें सिर्फ अपना पेट और अपनी जेब की फिक्र में इंसान इंसानियत से कटता दिखाई दे रहा है.

तीन बेटियों की दर्दनाक मौत हो गई. सिस्टम और समाज की संवेदनहीनता के चलते बेटियां बचाईं नहीं जा सकी. भूख से मौत की बेबसी आत्मा को झकझोर कर रख देती है. ये शर्मसार कर जाती है उन सियासी और गैर-सियासी लोगों को जो अपने अपने स्वार्थ में डूबे हैं. इस मौत के जिम्मेदार हम सब ही हैं. भले ही हम सरकार पर उंगली उठा कर खुद को मुंसिफ करार देने की कोशिश करें.

दलील दी जा रही है कि किसी को पता नहीं था कि बच्चियां भूखी हैं. ये दलील सही भी है. किसी को वाकई नहीं मालूम कि इस देश का एक तबका भूखे पेट ही सोता है. न ये सरकारों को अहसास है और न ही समाज के लोगों में ये अहसास जग सका है. समाज इसी तरह सोता रहेगा तो न किसी को भूख से मौत की खबर होगी और न फिर कभी फर्क ही पड़ेगा.

ऐसे ही संवेदनहीन हालातों को देखकर दुष्यंत ने ये भी कहा था, ' भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ ...आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दा.'

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