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भारत में आदिवासी, दलित और मुसलमानों की जल्दी होती है मौत

एक दशक से 2014 तक, आदिवासियों को छोड़कर सभी सामाजिक समूह 2004 में लंबे समय से जीवित थे

Updated On: May 02, 2018 01:38 PM IST

FP Staff

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भारत में आदिवासी, दलित और मुसलमानों की जल्दी होती है मौत
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43 वर्ष की आयु पर, आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों या एसटी) के लिए मृत्यु की औसत आयु सबसे कम थी, जिसका अर्थ है कि अन्य भारतीयों की तुलना में उनकी मृत्यु जल्द होने की संभावना अधिक है, जैसा कि एक नए अध्ययन में बताया गया है.

आदिवासियों के अलावा, दलित और मुसलमानों पर भी कम उम्र में मरने का जोखिम रहता है.  ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में प्रकाशित एक विश्लेषण में इस बत की पुष्टी की गई है.

एक दशक से 2014 तक, आदिवासियों को छोड़कर सभी सामाजिक समूह 2004 में लंबे समय से जीवित थे – 2004 से अनुसूचित जाति के लिए मृत्यु की औसत आयु घट गई है. पहले यह आयु 45 वर्ष थी.

दलित, जिनकी औसत उम्र 2004 में 42 थी, उनकी 2014 में छह साल ज्यादा जीने की संभावना थी, जैसा कि विश्लेषण में पाया गया है.

स्वास्थय स्थिती की होती है अहम भूमिका

ऊपरी वर्गों के गैर-मुस्लिम परिवार, 2014 में 60 साल की उम्र  के साथ  सबसे लंबे समय तक जीवित रहे है.  2004 में इनकी औसत आयु 55 साल या उससे ज्यादा थी. अलग-अलग समुदायों में ये अंतर उनकी स्वास्थ्य स्थति पर निर्भर करते हैं.

भारत में अपनी स्वास्थ्य स्थिति निर्धारित करने में, एक व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक स्थिति की अहम भूमिका होती है. यह मूल्यांकन करने के लिए बरूआ ने 2004 और 2014 से राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) डेटासेट का उपयोग किया है. एनएसएसओ 'सामाजिक समूह' और 'धर्म' श्रेणियों का संयोजन करके परिवारों को छह समूहों में विभाजित किया गया है- आदिवासी जिनमें से 56 फीसदी हिंदू थे और 33 फीसदी ईसाई थे, दलित जिनमें से 93 फीसदी हिंदू थे, गैर-मुस्लिम अन्य पिछड़े वर्ग, मुस्लिम अन्य पिछड़े वर्ग, और गैर-मुस्लिम ऊपरी वर्ग.

गैर-सामाजिक समूह में ( जाति और धर्म से संबंधित श्रेणियां ) एक मजदूर का औसत जीवन (45.2 वर्ष) गैर-मजदूर (48.4 वर्ष) की तुलना में तीन साल से कम था, जैसा कि विश्लेषण में पाया गया है. इसी प्रकार, ‘पिछड़े’ या कम विकसित राज्य में रहने से ‘आगे’ या अधिक विकसित राज्य (51.7 वर्ष) में रहने वालों की तुलना में सात साल से अधिक की मृत्यु (44.4 वर्ष) की औसत आयु कम हो गई है.

आदिवासियों में खराब स्वास्थ्य की रिपोर्ट करने की संभावना कम, मुस्लिमों में संभावना सबसे अधिक

अन्य सामाजिक समूह की तुलना में आदिवासियों की जल्दी मृत्यु होने के बावजूद उनमें से कम ही लोगों ने महसूस किया कि वे बीमार थे या उनका स्वास्थ्य खराब था. यह आंकड़ा मात्र 24 फीसदी है. हालांकि बीमार लोगों के द्वारा बीमारी की रिपोर्ट करने वाली संख्या 2004 से 19 फीसदी बढ़ी है. एक अध्ययन में सामाजिक समूहों में वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के) के बीच वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति की धारणा पर एनएसएसओ डेटा का भी विश्लेषण किया गया है. गैर-मुस्लिम ऊपरी वर्ग समूह के लोगों में यह समान था, जो 2004 (23 फीसदी) के बाद से कम ही बदला है.

स्थिति में इन लोगों को बेहतर, बहुत अच्छे, ठीक, या खराब स्वास्थ्य में बताया गया है, जो अध्ययन को खराब स्वास्थ्य (पीपीपीएच) की अनुमानित संभावना की गणना करने की अनुमति देता है.

अधिकतर खराब स्वास्थ्य में होने की रिपोर्ट करने वाले ( 35 फीसदी ) मुस्लिम थे ( ओबीसी और ऊपरी वर्ग दोनो ), जैसा कि डेटा में बताया गया है।

अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों (24 फीसदी) की तुलना में अधिक महिलाएं (28 फीसदी) खराब स्वास्थ्य में हैं.

गैर-सामाजिक समूहों में, अनुमानित पीपीएच उन स्व-नियोजित या नियमित वेतन (26 फीसदी) पाने वाले लोगों के मुकाबले में ‘मजदूर’ परिवारों (29 फीसदी) में व्यक्तियों के लिए काफी अधिक था, अध्ययन में पाया गया है.

2014 में, शहरी इलाकों में लोग अपने ग्रामीण समकक्षों (25.3 फीसदी) की तुलना में खराब स्वास्थ्य (28.7 फीसदी) में होने की रिपोर्ट करने की अधिक संभावना रखते थे, हालांकि यह एक दशक पहले नहीं था जब ग्रामीण (24.3 फीसदी) और शहरी (24.5 फीसदी) निवासियों ने समान विचार साझा किया है.

इसके अलावा, 'पिछड़े राज्यों' ( 29.2 फीसदी ) की तुलना में 'आगे के राज्यों' (24.2 फीसदी) में कम व्यक्ति खराब स्वास्थ्य में होने की रिपोर्ट करने की संभावना रखते थे.

गरीब, एकल व्यक्ति के खराब स्वास्थ्य की रिपोर्ट करने की संभावना सबसे अधिक

अध्ययन में पाया गया कि पीपीएच के लेखा-जोखा में व्यक्ति के घर की आर्थिक परिस्थितियों ने भी अहम भूमिका निभाई है.

अमीर परिवारों (25.4 फीसदी)  की तुलना में गरीब परिवारों में व्यक्तियों की खराब स्वास्थ्य में होने की रिपोर्ट मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है.

अन्य प्रकार की शौचालयों तक पहुंच या कोई शौचालय (27.9 फीसदी) तक पहुंच होने वाले व्यक्तियों की धारणा की तुलना में घर में फ्लश या सेप्टिक टैंक शौचालय तक पहुंच अनुमानित पीपीएच (24.6 फीसदी) कम करती है.

इसी प्रकार, अन्य ईंधन प्रकारों (27.8 फीसदी) की तुलना में गैस या बिजली (24.4 फीसदी) के साथ खाना पकाने से पूर्वानुमानित पीपीएच में काफी कमी आई है.

पीपीएच निर्धारित करने में व्यक्तिगत विशेषताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका

उदाहरण के लिए, एकल, विधवा या तलाकशुदा लोगों की तुलना में विवाहित व्यक्तियों के लिए पीपीएच का अनुमान कम था. जैसा कि अध्ययन में बताया गया है. अध्ययन में यह भी बताया गया कि अशिक्षित व्यक्तियों (27.9 फीसदी) की अनुमानित पीपीएच ग्रजुएट (18.3 फीसदी) की तुलना में काफी अधिक था.

(एलिसन सलदानहा की इंडियास्पेंड के लिए रिपोर्ट)

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