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क्रूड प्राइस बढ़ने के साथ रोज पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करना कितना सही?

तेल के महंगे होने से ट्रांसपोर्ट महंगा होगा और रोजाना की जरूरत की चीजें भी महंगी हो जाएंगी

Updated On: Apr 13, 2017 10:44 PM IST

Madhavan Narayanan

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क्रूड प्राइस बढ़ने के साथ रोज पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करना कितना सही?

देश की सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए रोजाना पेट्रोल और डीजल के दाम बदलने का फैसला क्या सही है?

इन कंपनियों ने फैसला किया है कि वे 1 मई से देश के पांच शहरों में पेट्रोल और डीजल के दाम हर रोज तय करेंगीं.

सैद्धांतिक तौर पर यह सही लगता है कि तेल कंपनियों को घाटे से बचाया जाए और ग्लोबल मार्केट के हिसाब से दाम तय करने के जरिए सरकार के सब्सिडी बोझ को कम किया जाए.

बेवजह भ्रम पैदा होगा 

लेकिन, व्यवहारिक तौर पर देखा जाए तो इससे बिना वजह का भ्रम पैदा होगा.

सरकार अभी इसे 5 शहरों में लागू कर एक प्रयोग करना चाहती है और डायनेमिक प्राइसिंग की स्टडी करना चाहती है.

इसके बाद ही इसे पूरे देश में लागू किए जाने का फैसला होगा. लेकिन, यह सिर्फ रोज पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव करने का मामला नहीं है.

इसमें दो मसले हैं. पहला मसला है हर रोज कीमतों में बदलाव का. हालांकि, ऐसा करना कहीं आसान है क्योंकि इंटरनेट आधारित और कंप्यूटराइज्ड सिस्टम की वजह से कीमतों में रोजाना घट-बढ़ को किया जा सकता है.

लेकिन, छोटे कारोबारी और सामान्य लोगों के लिए अपना बजट बनाने में यह मुश्किल भरा साबित हो सकता है.

स्टेबलाइजर के रोल में सरकार 

सरकार अब तक एक स्टेबलाइजर का रोल निभाती आई है. इस भूमिका से पैर पीछे खींच लेने से परेशानी होगी और इकनॉमी में व्यवहारगत उतार-चढ़ाव पैदा होंगे जिससे सामान्य व्यवहार में दिक्कतें आ सकती हैं.

एक ज्यादा गहरा असर निश्चित तौर पर बिना बफरिंग इंतजाम किए डोमेस्टिक इकनॉमी को ग्लोबल ऑयल कीमतों से जोड़ने का होगा.

भारत को एक ओर तो मॉनसून की बारिश में होने वाले उतार-चढ़ाव से जूझना पड़ता है, दूसरी ओर, ग्लोबल ऑयल प्राइसेज के चढ़ने-गिरने से भी सरकार को निपटना पड़ता है.

इनमें से किसी एक या दोनों का महंगाई पर असर होता है. इससे कंज्यूमर डिमांड और ब्याज दरों पर असर पड़ता है. कीमतें बढ़ने का राजनीतिक असर भी होता है. स्टेबलाइजर की भूमिका से हाथ खींचने से जोखिम भरा माहौल तैयार हो सकता है.

2014 से क्रूड का दाम 100 डॉलर से ऊपर

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मई 2014 में जब एनडीए सत्ता में आई, उस वक्त ब्रेंट क्रूड का दाम 100 डॉलर के ऊपर चल रहा था.

ब्रेंट क्रूड ऑयल प्राइसेज तय करने का ग्लोबल बेंचमार्क है. इसके बाद क्रूड के दाम गिरकर पिछले साल 40 डॉलर से नीचे के लेवल पर आ गए.

साफतौर पर तेल की कीमतों में गिरावट से वित्त मंत्री अरुण जेटली को अपने रिफॉर्म के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद पैदा हुई.

इससे घरेलू महंगाई और एक्सटर्नल अकाउंट मैनेजमेंट को मैनेज करने में आसानी हुई.

लेकिन, ग्लोबल ऑयल कीमतें उतनी ही रपटीली होती हैं, जितने चिकने पेट्रोलियम उत्पाद होते हैं जो कि क्रूड को रिफाइंड कर बनाए जाए हैं.

सीरिया हमले से बिगड़ा मामला?

ब्रेंट क्रूड के दाम पिछले एक साल से लगातार मजबूत हो रहे हैं और इस हफ्ते ये 56 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं. सीरिया पर अमेरिकी हमले के चलते मार्केट का मूड गड़बड़ाया हुआ है.

कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेल के दाम और ऊपर जा सकते हैं. ग्लोबल मार्केट पंडित मार्क मोबियस ने सीएनबीसी टीवी18 को इसी हफ्ते दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि वह ऑयल पर बुलिश (कीमतों में तेजी की उम्मीद) हैं.

उनके इस बयान को अर्थशास्त्री गंभीरता से ले रहे हैं. उन्होंने कहा था, ‘मैं कहना चाहूंगा कि हमें रिसोर्सेज सेक्टर, ऑयल और मिनरल्स को लेकर ज्यादा सजगता बरतनी चाहिए क्योंकि इनके दाम बहुत नीचे आ चुके हैं. इन उत्पादों की मांग खत्म नहीं हो रही है.’

क्या बंट जाएंगे तेल उत्पादक देश? 

हालांकि, ऐसे विश्लेषक भी हैं जिनको लगता है कि सीरिया को लेकर बने हुए मतभेद से तेल उत्पादक देश बंट सकते हैं और इससे क्रूड की कीमतें नीचे आ सकती हैं.

लेकिन, इसे भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि सउदी अरबिया तेल की कीमतों को ऊपर ले जाने के लिए पुरजोर कोशिशों में जुटा हुआ है.

इंडिया के लिए इसका मतलब यह है कि महंगाई में उछाल आ सकता है. इसे देखते हुए ही रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को लेकर अपना रुख पिछले फरवरी के ‘अकोमोडेटिव’ से बदलकर ‘न्यूट्रल’ कर लिया है.

सीरिया को लेकर चल रही तनातनी और क्रूड के दाम बढ़ने की आशंकाओं को देखते हुए मोदी सरकार को सस्ते तेल के फायदे मिलने का दौर गुजरता दिख रहा है.

हालांकि, कड़े फैसले लेने का यह सही वक्त न हो, लेकिन असम और उत्तर प्रदेश में राज्य चुनावों में बीजेपी की जीत हासिल करने से उत्साहित सरकार पीछे नहीं हटना चाहती है.

लेकिन, जब क्रूड की कीमतों में उछाल आएगा तो इससे न सिर्फ ब्याज दरों पर बुरा असर होगा, बल्कि इससे लोगों का मूड भी बिगड़ेगा.

तेल के महंगे होने से ट्रांसपोर्ट महंगा होगा और रोजाना की जरूरत की चीजें भी महंगी हो जाएंगी.

सरकार का मकसद ग्लोबल इकनॉमिक ग्रोथ की दौड़ में भारत को सबसे आगे पहुंचाने का है. हालांकि, इकनॉमिक रिफॉर्म कई मायनों में एक रपटीली राह है.

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