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EXCLUSIVE: सीआरपीएफ के जवान का दर्द, अफसर हमें मजदूर समझते हैं

खाने से लेकर गाड़ियों तक के लिए जो भी फंड आता है वो सीआरपीएफ के भ्रष्ट अधिकारियों की भेंट चढ़ जाता है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jan 13, 2017 11:37 AM IST

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EXCLUSIVE: सीआरपीएफ के जवान का दर्द, अफसर हमें मजदूर समझते हैं

बीएसएफ जवान तेजबहादुर का वीडियो वायरल होने के बाद सीआरपीएफ के जवान जीत सिंह का वीडियो भी सुर्खियां बटोर रहा है. पैरामिलिट्री के अंदरूनी तंत्र पर उठते सवालों के मद्देनजर फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने तफ्तीश की. सीआरपीएफ के एक कर्मचारी ने हमसे बातचीत में पैरामिलिट्री की कम सुविधाओं को लेकर कई सवाल उठाए हैं. हमारे संवाददाता रविशंकर सिंह से हुई उनकी बातचीत को हम हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं...

सीआरपीएफ हर समय एक्टिव रहती है. चाहे वह नक्सल समस्या से निपटने की बात हो या देश में शांतिपूर्ण चुनाव कराने की चुनौती. चाहे देश में कोई आतंकी हमले हो, लेकिन सेना की तुलना में कम वेतन, कम पेंशन और कम सुविधाएं मिलती है.

अंदर सामंतवादी व्यवस्था है. जवान खेतिहर मजदूर हैं. अफसर उनसे जमींदार की तरह व्यवहार करते हैं.

अफसर का ट्रांसफर अगर छत्तीसगढ़ के जंगलों में भी हो जाता है तो वहीं पर वह स्वर्ग बना लेते हैं. क्योंकि उसकी सेवा में पचासों जवान हमेशा लगे रहते हैं. हर सामान उनको मुहैया हो जाता है. जवान कैंप में रहते हैं और अफसर सर्किट हाउस में रहते हैं.

जो भी फंड आता है उसे वो लोग खा लेते हैं. खाने का पैसा आता है, तो ये लोग खा लेते हैं. गाड़ियों का पैसा आता है, तो ये लोग खा लेते हैं. इनके घरों में चार-चार गाड़ियां घूम रही हैं. लेकिन जवान पैदल चलता रहता है.

जवान अगर छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों में ड्यूटी करते हैं तो हमारे साथ जानवरों से भी गंदा व्यवहार किया जाता है. जवानों को छुट्टियों में घर जाने के लिए बस स्टैंड तक भी गाड़ी नहीं मिलती है.

मुझे छुट्टी में घर जाना होता है तो 10-15 लोगों की भीड़ पैदल-पैदल चल कर हथियार के साथ मुख्यालय में आते हैं, और फिर पैदल चल कर ही हम लोगों को घने जंगलों में 10-10 किलोमीटर जाना पड़ता है. बस स्टैंड से यात्री बस पकड़ कर रेलवे स्टेशन तक जाते हैं. इस बीच नक्सलियों ने पहचान लिया तो जान भी जा सकती है.

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अगर अफसरों को छुट्टी पर जाना होता है तो सरकारी गाड़ियों से जाते हैं. हमलोग प्राइवेट गाड़ियां ही हायर करते हैं.

एमटी है यानि मोटर ट्रांसपोर्ट विंग. हर जगह एक एमटी होता है. जो गाड़ियों के आने-जाने और रख-रखाव से संबंधित विंग है. इस विंग में कई ड्राइवर होते हैं. कई सिपाही ड्राइवर होते हैं. कई हवलदार ड्राइवर होते हैं. एमटी हवलदार ड्राइवर के ऊपर एक एमटी सब-इंस्पेक्टर होता है. इन सब के ऊपर एक एमटीए होता है जो असिस्टेंट कमांडेंट रैंक के जैसा होता है.

कमांडेंट एमटी में पैसा खाने का सबसे आसान तरीका अपनाते हैं. पूरा एमटी एक कमांडेंट के अंदर आता है. कमांडेंट अपने नीचे के लोगों को कहता है कि चार गाड़ियों में डिफेक्ट बताओ.

एसआई एक मेमो बना कर लाता है और कमांडेंट के पास पावर रहता है कि एमटी के फंड से जब चाहे पैसा निकाल सकता है. लाखों के खर्चे दिखा कर महीनों कमांडेंट चूना लगाता रहता है. किसी का ब्रेक खराब, किसी का टायर खराब बताकर फंड को मंजूर करा लेता है. पैसे को मंजूर करना उसी के हाथ में रहता है.

एक जनवरी 2004 से जो भी सीआरपीएफ में भर्ती हुए हैं, उनको पेंशन नहीं मिलेगी. जिसको पेंशन मिलती भी है उनको 50 फीसदी ही मिलती है. अंतिम महीने की आखिरी पे ड्रॉप के आधार पर पेंशन दी जाती है. सेना के जवानों को यही पेंशन इतनी अवधि तक के लिए 75 फीसदी मिलती है. सेना में जो कैंटीन सुविधा है उसकी तुलना में हमारी सीपीसी (सेंट्रल पुलिस कैंटीन) के समान महंगे होते हैं.

सीआरपीएफ के जवान का अगर ट्रांसफर होता है तो उसकी पत्नी और बच्चों के लिए सीआरपीएफ की गाड़ी नहीं मिलती है. पर वहीं अगर अधिकारी का ट्रांसफर हो जाता है तो उनके घर में बरसों दो-दो रसोइए और दो से तीन गाड़ियां रहती हैं.

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एक आईपीएस जो सीआरपीएफ के डीजी के पद से रिटायर हुए हैं. उनके घर में हर समय अभी भी सीआरपीएफ के 3-4 लोग रहते हैं. सीआरपीएफ से रिटायर होने के बाद भी डीजी साहब सरकारी सुविधा का लाभ ले रहे हैं.

सीआरपीफ के अधिकारी 'सीजर्स वाइफ' हैं. सीजर्स वाइफ एक टर्म है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वो लोग कभी गलती कर ही नहीं सकते.

इसका दो उदाहरण देता हूं. पहला उदाहरण 2010 में दंतेवाड़ा में एक घटना की है, जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे. नक्सलियों ने 76 सीआरपीएफ के जवानों की सामूहिक हत्या कर दी थी.

ये घटना सीआरपीएफ के 62वीं बटालियन की थी. इस बटालियन के दो बड़े अधिकारी हैं, भारत को छोड़कर कहीं और इस तरह की घटना होती तो इन दोनों की नौकरी चली जाती. इन दोनों को छत्तीसगढ़ से हटा कर दूसरी जगह पर तबादला कर दिया गया. ये घटना दोनों अधिकारियों के लिए वरदान साबित हुई. इनको ट्रांसफर कराना नहीं पड़ा. ट्रांसफर अपने-आप ही हो गया.

आज स्थिति ये है कि दोनों लोग आराम की जिंदगी जी रहे हैं. दोनों का प्रमोशन हो गया. पर नीचे जितने भी लोग थे- हवलदार, इंस्पेक्टर लेवल के सभी की नौकरियां चली गई.

दूसरा उदाहरण दे रहा हूं. एक एडिशनल डीआईजी हुआ करते थे. लास्ट रूट सेंटर उनका बेंगलुरु था. उन पर 20 से भी ज्यादा सेक्सुअल मोलेस्टेशन के मामले आए थे. लेकिन उनको भी एक खरोंच तक नहीं आई.

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