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तीन तलाक पर कोर्ट का फैसला: क्या सचमुच यह नए युग की शुरुआत है?

सवाल यह भी बनता है कि ‘हलाला’ और बहु-विवाह की प्रथा के बारे में क्या?

Updated On: Aug 24, 2017 05:59 PM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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तीन तलाक पर कोर्ट का फैसला: क्या सचमुच यह नए युग की शुरुआत है?

तीन तलाक के चलन को अमान्य, अवैध और असंवैधानिक करार देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक दलों खासकर बीजेपी और कांग्रेस की प्रतिक्रियाएं अनोखी हैं!

इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर एकबारगी तो ऐसा लग रहा है मानो मुस्लिम-समुदाय की महिलाओं के लिए 19 वीं सदी के बाद 21 वीं सदी के दूसरे दशक में नए सिरे से ‘नव-जागरण काल’ आ गया हो.

मजा यह कि कोर्ट के फैसले का सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस दोनों ने स्वागत किया है लेकिन अलग-अलग कारणों से.

एक तो इन दोनों पार्टियों ने कोर्ट के फैसले के असर को लेकर अपना मनचीता अर्थ निकाला—वह समझा जो उनकी राजनीति को माफिक पड़ता है ना कि वह जो कि सचमुच कोर्ट के फैसले में है.

दूसरे, इन प्रतिक्रियाओं से यह भी जाहिर है कि दोनों दल के प्रमुख नेता कोर्ट के फैसले को लेकर एक हद तक एक-दूसरे से उलट निष्कर्ष निकाल रहे हैं.

प्रतिक्रियाओं का विरोधाभास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर में कोर्ट का फैसला महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. उन्हें उम्मीद है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलेगा.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की भी प्रतिक्रिया इसी टेक पर है. उन्हें लगता है कि ‘कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं के लिए स्वाभिमान-पूर्ण एवं समानता के एक नए युग की शुरुआत हुई है’. बीजेपी इसे संकल्पवान न्यू इंडिया की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखती है.’

जाहिर है, इन दोनों प्रतिक्रियाओं के पीछे मान्यता यह है कि तलाक को लेकर एक खास इस्लामी प्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) मुस्लिम महिलाओं की समानता की राह में रोड़ा था और कोर्ट के फैसले से यह रोड़ा हट गया है.

अगर बीजेपी की सोच यही है तो पूछा जा सकता है कि ‘हलाला’ और बहु-विवाह की प्रथा के बारे में क्या? शायरा बानो और अन्य की जिस याचिका पर कोर्ट का फैसला आया है उसमें ‘हलाला’ और बहु-विवाह के इस्लामी चलन का भी जिक्र था.

क्या बीजेपी इन इस्लामी प्रथाओं को मुस्लिम महिला की बराबरी की राह में रोड़ा नहीं मानती? क्या हलाला और बहु-विवाह की इस्लामी प्रथा बीजेपी के न्यू इंडिया के विजन में शामिल है?

कोर्ट के फैसले का स्वागत कांग्रेस ने भी किया है लेकिन उसकी शब्दावली बीजेपी से एकदम अलग है. कांग्रेस को यह तो लगता है कि फैसला मुस्लिम महिलाओं की समानता की तरफदारी में है लेकिन कांग्रेस ने इसे सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) फैसला भी माना है.

कोर्ट का फैसला मुस्लिम महिलाओं की समानता की राह में कहां तक मददगार सिद्ध होगा यह बहस और आंकलन का विषय हो सकता है लेकिन क्या सचमुच कोर्ट के फैसले को सेक्युलर करार दिया जा सकता है ?

अगर कोर्ट के फैसले का स्वभाव सेक्युलर है तो फिर मामले में कोर्ट के आगे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से तीन तलाक के पक्ष में दलील देने वाले नामी वकील और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने यह क्यों कहा कि यह फैसला मुस्लिम पर्सनल कानून की हिफाजत करता है?

क्या धार्मिक समुदायों के लिए निजी कानूनों का होना सेक्युलर होने की निशानियों में से एक है?

मामले में कोर्ट के लिए न्यायमित्र की भूमिका निभा चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद को ऐसा क्यों लग रहा है कि फैसला सही इस्लाम को उजागर करता है? क्या किसी फैसले को ‘सेक्युलर’ और ‘सही इस्लाम को उजागर करने वाला’ एक साथ करार दिया जा सकता है?

Salman-Khurshid

क्या है कोर्ट का फैसला

किसी चलन को असंवैधानिक करार देने वाले फैसले ठहरकर सोचने और पर्याप्त धीरज के साथ विश्लेषण की मांग करते हैं. अफसोस कि तीन तलाक के चलन को असंवैधानिक करार देने वाले फैसले को लेकर ऐसा धीरज ना तो मीडिया की रिपोर्टिंग में दिखा और ना ही राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं में.

कोर्ट के फैसले से अर्थ कुछ ऐसा निकाला जा रहा है मानो विवाह-विच्छेद की तमाम इस्लामी प्रथाएं कोर्ट के फैसले के बाद अमान्य, अवैध और असंवैधानिक हो गईं और चूंकि कानून की नजर में विवाह-विच्छेद की कोई इस्लामी प्रथा मान्य और वैध ही नहीं सो हलाला (पुनर्विवाह की वह प्रथा जिसमें तलाकशुदा पत्नी किसी दूसरे से शादी और तलाक के बाद ही अपने पहले शौहर से निकाह कर सकती है) की प्रथा भी अप्रभावी हो गई साथ ही बहु-विवाह के चलन का एक बड़ा कारण खत्म हो गया.

अचरज कीजिए कि कोर्ट के फैसले का बहुमत वाला हिस्सा इसके एकदम अलग बात कहता है. कोर्ट ने विवाह-विच्छेद की तीन इस्लामी प्रथाओं तलाक-ए-अहसन, तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-बिद्दत का उल्लेख किया है.

कोर्ट के फैसले के मुताबिक तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-हसन में फर्क है. इस फर्क के हिसाब से ही तलाक-ए-अहसन को इस्लाम में ‘विवाह-विच्छेद का सबसे उपयुक्त तरीका’ बताया गया है जबकि ‘तलाक-ए-हसन को सिर्फ ‘एक उपयुक्त तरीका.’

तलाक-ए-अहसन में एक दफे तलाक कहा जाता है और फिर संयम की 90 दिनों की अवधि (इद्दत) का पालन करना होता है. तलाक-ए-हसन में भी इद्दत की अवधि का पालन अनिवार्य है लेकिन इसमें नियमित अंतराल पर कुल तीन दफे यानी हर 30 दिन की अवधि के बाद तलाक बोलना अनिवार्य है. इन दोनों तरीकों में इद्दत की अवधि तक पति-पत्नी में अगर संबंध कायम हो जाए तो फिर माना जाता है विवाह-भंग नहीं हुआ.

कोर्ट ने विवाह-विच्छेद के इन इस्लामी तरीकों से तलाक-ए-बिद्दत को साफ अलग माना है. कोर्ट के मुताबिक तलाक-ए-बिद्दत में एक दफे स्पष्ट स्वर में कहा जाता है कि मैं तुमसे हमेशा के लिए तलाक लेता हूं या फिर इसकी जगह एक झटके में तीन दफे तलाक-तलाक-तलाक कहा जाता है. तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-हसन की तरह इसमें इद्दत की कोई अवधि नहीं होती और तलाक शब्द के उच्चारण के साथ विवाह-भंग मान लिया जाता है सो इस्लामी धर्मशास्त्र की पुस्तकों में तलाक के इस चलन को पर्याप्त उपयुक्त तरीका नहीं माना गया है.

कोर्ट का फैसला सिर्फ तलाक-बिद्दत को अमान्य, अवैध और असंवैधानिक करार देता है. कोर्ट के बहुमत वाले फैसले में जस्टिस जोसेफ कूरियन ने लिखा है- ‘धर्मशास्त्र में जिसे बुरा बताया गया है वह कभी कानून की नजर में अच्छा था लेकिन शरीअत के पर्सनल लॉ घोषित हो जाने के बाद हमारे सामने विचार का प्रश्न यह है कि क्या जो चीज कुरान में गलत मानी गई है उसे कानून की नजर में ठीक करार दिया जा सकता है. इसलिए मामले में सिर्फ इस सरल सवाल पर विचार किया जाना है कि तीन तलाक कानून के हिसाब से संगत है या नहीं. कोर्ट ने शमीम आरा बनाम यूपी सरकार के मामले में भी माना था कि तीन तलाक कानून की नजर में असंगत है. इसलिए, अनुच्छेद 141 के मुताबिक शमीम आरा (मामले का फैसला) ही बतौर कानून भारत में प्रभावी है.’

कोर्ट के बहुमत के फैसले में जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने लिखा है— ‘यह देखते हुए कि तीन तलाक तात्कालिक और बेबदल होता है, साफ है कि इसमें पति और पत्नी के बीच मेल-मिलाप कराने के लिए उनके परिवार-जन की कोशिशों के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता जबकि ऐसा होना विवाह-संबंध को बचाने के लिए जरुरी है. शमीम आरा मामले में आए फैसले के बाद यह मानने का कोई आधार नहीं रह जाता कि बगैर उचित कारण के ऐसे तलाक को मान्य करार दिया जाए.’

गौर करने की बात यह है कि शमीम आरा मामले में जस्टिस आर सी लाहोटी और जस्टिस पी वेंकटरामा की पीठ ने मशहूर न्यायविद् जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर के हवाले से अपने फैसले में लिखा था- 'यह एक प्रचलित झूठ है कि कुरान आधारित नियमों में मुस्लिम पुरुष को विवाह-भंग के मामले में बेलगाम अधिकार हासिल है. पत्नी वफादार और बात मानने वाली हो तो पूरे कुरान में ऐसी पत्नी को तलाक देने के बहाने तलाशने के बारे में पुरुष को साफ-साफ मना किया गया है.'

A member of Khawateen Markaz, a Kashmiri women's separatist group, attends a protest against recent riots, in Srinagar August 12, 2013. Three people died in riots between Hindus and Muslims over the weekend. Opposition parties linked the rioting to the renewed border tensions between India and Pakistan, because some of the protesters involved had brandished a Pakistani flag.  Pakistan accused Indian troops of firing shells across the disputed border in Kashmir on Monday and tensions ran high in both countries after last week's killing of Indian soldiers set off a wave of skirmishes between the two nuclear-armed rivals. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: MILITARY CIVIL UNREST) - RTX12IDE

तलाक-ए-बिद्दत की जमीनी सच्चाई

जब तक यह सिद्ध ना हो जाय कि तलाक-ए-बिद्दत ही मुस्लिम-समाज में विवाह-भंग का सबसे प्रचलित तरीका है, यह उम्मीद नहीं बांधी जा सकती कि कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं के लिए समानता के एक नए युग की शुरुआत हुई है, जैसा कि बीजेपी जताना चाहती है.

लेकिन क्या तलाक-ए-बिद्दत को मुस्लिम समाज में विवाह-भंग का सबसे प्रचलित तरीका माना जा सकता है? प्रचलित धारणा के विपरीत एक सर्वे का निष्कर्ष है कि तलाक-ए-बिद्दत का चलन मुस्लिम समाज में ना के बराबर है

मामले पर सुनवाई से एक दिन पहले दिल्ली की एक संस्था सेंटर फॉर रिसर्च एंड डेबेटस् इन डेवलपमेंट पॉलिसी ने मार्च से मई (2017) के बीच 20,671 मुस्लिम पुरुष और 3811 मुस्लिम महिलाओं के एक अखिल भारतीय नमूने पर आधारित सर्वेक्षण के निष्कर्ष में कहा कि तलाक-ए-बिद्दत का तरीका विवाह-भंग की 100 स्थितियों में से महज 1 में अपनाने की बात सामने आई है.

नेशनल काउंसिल फॉर अप्लायड इकॉनॉमिक रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री डा. अबू सालेह शरीफ की अगुवाई में हुए इस सर्वेक्षण में यह तथ्य दिखा कि 331 तलाकशुदा स्त्री-पुरुषों में से मात्र 1 मामले (0.3 फीसद) में विवाह-भंग के लिए तलाक-ए-बिद्दत का तरीका अपनाया गया था. ज्यादातर मामलों में धार्मिक-संस्था, पंचायत या फिर काजी की मध्यस्थता के जरिए विवाह-विच्छेद किया गया था.

इस सिलसिले का दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अन्य धार्मिक समुदायों की तुलना में विवाह-विच्छेद को मुस्लिम महिलाओं की दुर्दशा का प्रधान कारण नहीं ठहराया जा सकता. 2011 की जनगणना के मुताबिक हिन्दू समुदाय में तलाक की दर (0.76 फीसद) मुस्लिम समुदाय (0.56 फीसद) की तुलना में ज्यादा है और इसी के अनुकूल जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि तलाकशुदा भारतीय महिलाओं में 68 प्रतिशत तादाद हिन्दुओं की है जबकि 23.3 प्रतिशत ऐसी महिलाएं मुस्लिम हैं.

कोर्ट के फैसले के तथ्य, सर्वेक्षण के निष्कर्ष और जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अब आप खुद ही फैसला करें कि तीन तलाक की समस्या क्या सचमुच मुस्लिम महिलाओं की मुख्य समस्या है और क्या तीन तलाक के चलन के अमान्य, अवैध और असंवैधानिक करार होने से सचमुच मुस्लिम महिला के लिए समानता के नए युग की शुरुआत हो गई है जैसा कि कांग्रेस और बीजेपी जताना-बताना चाह रहे हैं.

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