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पूरी तैयारी से लागू नसबंदी और बिना तैयारी के लागू हुई नोटबंदी में क्या फर्क है?

नसबंदी और नोटबंदी में एक समानता जरूर है और वो ये है कि ये दोनों शब्द भारतीय लोग और भारतीय राजनीति दोनों के लिए अपने-अपने समय में अहम रहे हैं

Updated On: Sep 01, 2018 04:32 PM IST

S Murlidharan

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पूरी तैयारी से लागू नसबंदी और बिना तैयारी के लागू हुई नोटबंदी में क्या फर्क है?
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नसबंदी और नोटबंदी वैसे तो सुनने में एक जैसे लगते हैं लेकिन दोनों के मतलब काफी अलग-अलग हैं. वैसे इन दोनों में एक समानता जरूर है और वो ये है कि ये दोनों शब्द भारतीय लोग और भारतीय राजनीति दोनों के लिए अपने-अपने समय में अहम रहे हैं.

देश में आपातकाल के दौरान 1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने जबरदस्त नसबंदी अभियान चलाया था. इसके अंतर्गत जबरदस्ती और अंधाधुंध तरीके से व्यस्क पुरुषों की नसबंदी की गई. खास करके ग्रामीण इलाकों में इस अभियान में ज्यादा ही तेजी दिखाई गई थी. लेकिन इस नसबंदी अभियान का खामियाजा इंदिरा सरकार को आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए आम चुनावों में भुगतना पड़ा था. लोग सरकार के जबरन नसबंदी अभियान से इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने 1977 के चुनावों से पहले ही इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंकने का मन बना लिया था.

नसबंदी और नोटबंदी के बाद के हालात काफी अलग रहे

लेकिन 8 नवंबर 2016 को मोदी सरकार की ओर से लागू किए गई नोटबंदी को लेकर ऐसा माहौल नहीं बना. केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समालोचकों और राजनैतिक प्रतिद्वदियों को मोदी के नोटबंदी ने नाराज किया है और उनकी नाराजगी भी कृत्रिम है. 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित कर तानाशाही की धारणा को जीवित करने का सबसे विषाक्त उदाहरण अभी भी नसबंदी ही है. वैसे कांग्रेस पार्टी भारतीय राजनैतिक इतिहास में अपने ऊपर लगे कलंक के दो गहरे धब्बों को मिटाने में आज भी कामयाब नहीं हो सकी है. ये घटनाएं हैं 1975 की इमरजेंसी जब लोगों पर कई तरह के जुल्म ढाए गए और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख दंगे, जिनमें हजारों सिखों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया और उनकी संपत्ति लूट ली गई.

2014 के लोकसभा चुनावों में जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को धूल चटाई उसके बाद से ही कांग्रेस मोदी सरकार को घरने के लिए मुद्दों की तलाश में जुटी हुई है. इसके लिए उसने हर तरह के मुद्दों से सरकार पर हमला करने की कोशिश की, चाहे वो राफेल डील हो, अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णुता का मामला हो या फिर दलितों पर अत्याचार का मामला इन सबसे कांग्रेस मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करती रही. नोटबंदी भी उसी तरह के मामलों में एक है.

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बेशक तैयारी पूरी नहीं थी लेकिन योजना भयावह नहीं थी

नरेंद्र मोदी सरकार ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा की थी. इसके अंतर्गत 500 और 1000 के नोटों के चलन पर रोक की घोषणा की गई थी. इसमें कोई शक नहीं कि नोटबंदी की योजना परिपूर्ण नहीं थी. बिना पर्याप्त तैयारी के इसे लागू किया गया और जालसाजों और धोखेबाजों से इससे बचने के लिए कई रास्तों को खुला छोड़ दिया गया था लेकिन इन सब कमियों के बाद भी नोटबंदी का इरादा 1975 के आपातकाल के दौरान लागू किए गए नसबंदी जैसे कुटिल और भयावह योजना जैसा नहीं था.

इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी विदेशों में घूम-घूमकर नोटबंदी के खिलाफ तीखी बयानबाजी में जुटे हुए हैं. नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री ने देश के नाम अपने संबोधन में की थी और इसका पहले से किसी को जरा सा भी आभास नहीं था. नोटबंदी का मुख्य मकसद था कि देश में जमा काले धन का पकड़ा जा सके. इसके अलावा नकली नोटों के चलन पर रोकथाम लगाना और देश में काम कर रहे आंतकी संगठनों को मिलने वाले फंड पर नकेल कसना भी नोटबंदी का उद्देश्य था. हालांकि कांग्रेस नोटबंदी को लेकर दूसरे आरोप लगाती आई है. पार्टी का कहना था कि नोटबंदी के माध्यम से देश के गरीब लोगों के पैसे सरकार ने जमा करवा कर इस देश के पंद्रह बड़े उद्योगपतियों का फायदा पहुंचाने की कोशिश की थी.

किसी भी बड़े निर्णय, खास करके जो कि बड़े स्तर पर और बड़े समूह को प्रभावित करने का माद्दा रखते हों, उसे लोगों के समर्थन की कसौटी पर ही परखा और मापा जाता है. इंदिरा गांधी की इमरजेंसी और नसबंदी दोनों को जनता ने आगामी चुनाव में सिरे से खारिज करके उन्हें सबक सिखा दिया था. हां, ये अलग बात है कि जनता ने ही इसके कुछ सालों बाद ही एक बार फिर से देश का शासन उन्हें सौंप दिया था. दरअसल जनता उस समय की खिचड़ी सरकार की आपसी खींचतान से पक चुकी थी. शासक वर्ग अपने अपने विचारधारा से बाहर निकल ही नहीं पा रहे थे ऐसे में लोग उस सरकार के कामकाज को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने इंदिरा को वापस प्रधानमंत्री की गद्दी सौंप दी.

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नोटबंदी पर सरकार को समर्थन मिला

लेकिन नोटबंदी का मामला जरा दूसरा है. मोदी सरकार के इस कदम को लगभग पूरे देश में ठीक-ठाक समर्थन मिला. हालांकि नोटबंदी के लागू होने के तीन महीने बाद तक लोगों को जिंदगी में उठापटक मचती रही लेकिन इसके बाद भी लोगों ने सरकार के इस कदम का खुले दिल से स्वागत किया. वैसे जिस देश की 86 फीसदी करेंसी को अचानक से नॉन लीगल टेंडर घोषित कर दिया गया हो वहां अफरातफरी का मचना स्वाभाविक है. भारत जैसे देश में जहां नगद प्रचलन में सबसे ज्यादा रहा हो और वहां पर पुरानी करेंसी को तुरंत बदलने में सरकार नाकाम साबित हो रही हो तो लोगों का परेशान होना जायज है.

हालांकि, इन परेशानियों को झेलने के बावजूद यहां के मतदाताओं ने सरकार की इस उम्मीद पर भरोसा किया कि नोटबंदी का उद्देश्य उत्कृष्ट था. लोगों ने मान लिया कि सरकार काला धन रखने वाले लोगों से उनका छिपा हुआ धन निकालने के लिए नोटबंदी कर रही है हालांकि इसका परिणाम उनके जीवन पर भी पड़ रहा है, और नोटबंदी से उन्हें भी परेशानियां उठानी पड़ रही है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सरकार के इस कदम का समर्थन किया. विपक्ष के लगातार इस मुद्दे पर बवाल करने और सरकार को घेरने की कोशिश के बाद भी यूपी चुनावों में मोदी के बीजेपी को बंपर बहुमत से सफलता मिली. नोटबंदी के बाद यूपी के अलावा भी कई अन्य राज्यों के चुनावों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया.

हालांकि सरकार को अपना ढीला रवैया छोड़ना होगा

मोदी के विरोधियों को लगता था कि नोटबंदी मोदी के लिए नसबंदी के बाद जैसे परिणाम लेकर आएगा. लेकिन लोगों ने मोदी के इस कदम को सराहा और परेशानियों के झेलने के बाद भी इसको अपना समर्थन दिया. ऐसे में केवल मोदी के राजनीतिक विरोधी नोटबंदी को लेकर बेवजह का प्रलाप अलापते रहे. मोदी की अच्छी किस्मत केवल नोटबंदी मामले तक ही सीमित नहीं रही बल्कि देश के और सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में से एक गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स या यानी जीएसटी भी देश में सफलतापूर्वक लागू हो गया. नोटबंदी के बाद जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में अहम भूमिका निभाई. नोटबंदी के 16 लाख करोड़ रुपए में से लगभग 99.3 फीसदी रुपया बैंकों में वापस पहुंच गया. बैंकों तक पहुंचा यही रुपया बिजनेस के माध्यम से मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में पहुंच गया जो कि अब तक छिपी हुई अर्थव्यवस्था में काम कर रहा था.

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जीएसटी लागू होने के बाद प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के संग्रहण में जबरदस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली है. ये भी नोटबंदी के साकारत्मक परिणामों का ही नतीजा है. वित्त मंत्री अरुण जेटली और अधिकारी भी नोटबंदी को सफल बताने के लिए इस तर्क को भी सामने रख रहे हैं.

अभी भी सरकार को इस मोर्चे पर कई काम करने हैं. सरकार को 18 लाख संदिग्ध बैंक खातों की जांच में तेजी लाने की कोशिश करनी चाहिए. जेटली का कहना था कि इन खातों में उस समय नोटबंदी के दौरान अवैध राशि जमा की गई थी जिस समय लोगों को धन जमा करने की छूट दी गई थी. ऐसा नहीं है कि इन खातों की जांच ‘चल रही है’ वाली स्थिति लंबे समय तक बनी रह जाए.

बहुत लोगों के नजर में मोदी सरकार की छवि ईमानदार सरकार के रूप में है लेकिन सरकार को चाहिए होगा कि वो हमेशा अपने ढीले-ढाले रवैये से काम करने वाली छवि से पार पा सके. जैसे माल्या को भागने का मौका दिया गया, नीरव मोदी को भागने दिया गया और बिना किसी ठोस तैयारी के नोटबंदी जैसी बड़ी योजना को लागू कर दिया गया. न तो नई करेंसी को तेजी से छापने का सही तरह से इंतजाम किया गया था और न ही उसे एटीएम तक पहुंचाने में तत्परता दिखाई गई. ऐसे में जरूरी है कि सरकार अपने ढीले रवैये वाली छवि से जल्दी पीछा छुड़ाए.

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