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लोग चुनाव आयोग पर भरोसा करते हैं... वो टूटना नहीं चाहिए

गुजरात चुनाव की तारीख का ऐलान न करने के बाद हो रही राजनीति के बीच चुनाव आयोग तरफ उछलते आरोप अच्छे संकेत नहीं हैं

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Oct 14, 2017 09:22 AM IST

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लोग चुनाव आयोग पर भरोसा करते हैं... वो टूटना नहीं चाहिए

चुनाव आयोग द्वारा हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात विधानसभा चुनावों की तारीख न घोषित करना अब राजनीतिक रूप लेता जा रहा है. कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने प्रेस कांफ्रेस कर कहा है कि चुनाव की तारीख में देरी का कारण रेवड़ियां बांटे जाने के लिए किया गया है.

उन्होंने आरोप लगाया है कि बीजेपी गुजरात में अपने डूबते जहाज को चुनाव आयोग के जरिए बचाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने लोकलुभावन घोषणाओं के सैंटा क्लॉज शब्द का इस्तेमाल किया. मतलब साफ था कि चुनाव आयोग ने देरी सरकार के इशारे पर की है और चुनाव में देरी का इस्तेमाल बीजेपी लोकलुभावन घोषणाओं में करेगी.

इससे पहले पार्टी नेता रणदीप सुरजेवाला ने चुनाव आयोग की घोषणा के तुरंत बाद ही ट्वीट कर केंद्र सरकार पर आरोप लगाए थे. सुरजेवाला का साफ आरोप था कि आगामी 16 अक्टूबर को पीएम गुजरात जा रहे हैं. देरी का स्पष्ट कारण है कि पीएम वहां जाकर लोकलुभावन घोषणाएं करेंगे.

चुनावी तारीख को विवाद में बदलते देखकर एक आम मतदाता को जरूर आश्चर्य हो रहा होगा क्योंकि चुनाव आयोग के हाल-फिलहाल के इतिहास में ऐसा कोई वाकया याद नहीं आता है जब ऐसा हुआ हो. इसके बजाए टीएन शेषन ने चुनाव आयोग में लोगों का जो भरोसा जगाया था वो बिहार के चुनाव में केजे राव से होते हुए हाल में गुजरात राज्यसभा चुनावों तक आता है. गुजरात राज्यसभा चुनाव के दौरान भी चुनाव आयोग के बेहतरीन रोल के लोगों की निगाह में सम्मान और बढ़ा ही था.

पिछली बार एक साथ घोषित हुए थे तारीख

इससे पहले के कई चुनावों के दौरान भी गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों की घोषणा होती रही है. हां ये जरूर होता है कि हिमाचल प्रदेश में चुनाव हो जाने के बाद नतीजे आने तक लंबा इंतजार करना पड़ता है लेकिन इस बार गुजरात के चुनावों की घोषणा ही नहीं की गई.

5 साल पहले जब इन दो राज्यों गुजरात और हिमाचल में चुनाव हुए थे, चुनाव आयोग ने 3 अक्टूबर 2012 को दोनों राज्यों के लिए एक साथ मतदान कार्यक्रमों की घोषणा की थी. हिमाचल में 4 नवंबर को एक चरण में मतदान हुआ था, जबकि गुजरात में दो चरणों में 13 दिसंबर और 17 दिसंबर को वोट डाले गए थे. और दोनों राज्यों में चुनाव नतीजे 20 दिसंबर को घोषित किए गए.

ऐसे में गुजरात की चुनावी तारीख का ऐलान न होना लोगों के लिए आश्चर्यजनक तो था लेकिन विपक्षी पार्टियों को सरकार पर निशाना साधने का एक और मौका मिल गया. लेकिन सबसे बुरी बात ये हुई कि एक संवैधानिक संस्था राजनीति के घेरे में आ गई है. वो भी बेवजह.

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कांग्रेसी नेता अभिषेक सिंघवी ने सैंटा क्लॉज नाम का इस्तेमाल कर दिया है. संभव है बहुत जल्द ही चुनाव आयोग के लिए भी कोई नई उपमा जल्दी राजनीतिक बाजार में आ जाए.

ठीक नहीं है आयोग की छवि के लिए यह विवाद

इसके अलावा चुनाव आयोग को ये भी समझना चाहिए कि राजनीतिक पार्टियों के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच अगर एक बार उसका नाम आएगा तो लोग इसे लंबे समय तक याद रखेंगे. याद न भी रखें, इसे उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल करेंगे. जो बेहतरीन काम कर रही एक संवैधानिक संस्था के लिए तो कतई ठीक नहीं है.

इससे अलग चुनाव आयोग ने एक साथ कई राज्यों में चुनाव कराने का मौका भी गंवाया है. पीएम मोदी भी देशभर में साथ चुनाव कराने की बात कह चुके हैं. हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति ने भी कहा था कि हम अगले साल पूरे देश में एक साथ चुनाव करा सकने की स्थिति में हैं. एक साथ चुनाव कराने के अलावा आयोग इस प्रयोग में असफल रहा है कि वो कम समय में चुनाव कराए. महीनों चलने वाले चुनाव के समय को कम करने का वक्त आ गया है जिस पर चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए.

हालांकि कांग्रेस के रेवड़ी बांटने के दावा प्रथम दृष्टया तो आकर्षित भले ही कर ले लेकिन राजनीतिक आकलन किया जाए तो ये मजबूत नहीं दिखता. इसके कई उदाहरण हैं. हमने हाल में कई राज्यों में देखा जहां केंद्र और राज्य सरकारों ने चुनाव से पहले जमकर लोकलुभावन घोषणाएं कीं लेकिन नतीजे जीत की बजाए हार में तब्दील हो गए.

लेकिन चुनाव आयोग को इस बात का खयाल जरूर रखना चाहिए कि जिन लोगों को भी टीएन शेषन से पहले का समय याद है, वो इससे बेहद दुखी होंगे. बूथ कैप्चरिंग से लेकर फर्जी मतदान और क्षेत्रीय रसूख को दो दशकों में मिटाने के काम पर फिर से दाग लगना ठीक नहीं है क्योंकि ये कपड़ों के नहीं सामाजिक हैं जिन्हे धुलने में लंबा वक्त लगता है.

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