S M L

बिना किसी नियम-कायदे के चल रहा है पूरे देश में कोचिंग सेंटर्स का धंधा

एक ओर स्कूलों की भारी भरकम फीस तो दूसरी ओर ट्यूशन फीस, बच्चों के अभिभावकों को कर्ज के तले दबा रही है. कोचिंग संचालकों द्वारा अधिक नंबरों से पास होने के नाम पर मोटी और मनमानी फीस वसूली जा रही है

Fahmina Hussain Updated On: May 13, 2018 09:16 AM IST

0
बिना किसी नियम-कायदे के चल रहा है पूरे देश में कोचिंग सेंटर्स का धंधा

कई शहरों में बड़े पैमाने पर कोचिंग सेंटर चलाएं जा रहे हैं. वही सर्वाधिक नंबरों से पास होने के सुनहरे सपने दिखा कर शिक्षा के व्यापार की दुकान धड़ल्ले से चलाई जा रही हैं. शहर की गलियों-नुक्कड़ों पर खुली कोचिंग सेंटर ना ही सरकार से निबंधित हैं और ना ही सरकार के द्वारा जारी मानकों का अनुपालन करते हैं. ऐसे में परिणाम आने के बाद छात्र अपने आपको ठगा महसूस करते हैं.

इस मामले में बिहार के सासाराम के कोचिंग संस्थान में पढ़ने वाले छात्र विकास कुमार सिंह का कहना है, स्कूल में क्लास होने के बाद भी सही से पढाई नहीं हो पाती है इसलिए कोचिंग करना ज़रूरी हो जाता है. विकास कुमार 11th विज्ञान के स्टूडेंट हैं. बताते हैं, 'जो सर स्कूल में पढ़ते हैं वहीं यहां मैथ की क्लास भी लेते हैं इससे और मदद मिल जाती है क्योंकि सर का एग्जाम के लिए गेस प्रश्न बहुत सटीक होता है.'

गया जिले की रहने वाली इशरत नाज़ बताती हैं स्कूल में सिलेबस पूरा नहीं होता है ऐसे में कोचिंग करना जरूरी हो जाता है. एग्जाम से पहले कोर्स भी कम्प्लीट करनी होती है ऐसे में अधिक फीस होने बावजूद कोचिंग जरूरी हो जाती है. कोचिंग सेंटर्स में पढ़ने वाले कई बच्चों से बातचीत करने पर ये बात सामने आई कि सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों में कार्यरत होने के बावजूद शिक्षकों ने खुद का कोचिंग सेंटर भी खोल रखे हैं, जो गैर कानूनी है. इसके अलावा नगर के प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ाने वाले अध्यापकों ने भी बिना पंजीकरण के अपना कोचिंग सेंटर खोल रखा हैं. कितने विद्यार्थी ऐसे हैं जो अपने विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों से परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लालच में अधिक शुल्क देकर पढ़ रहे हैं.

नाम ना प्रकाशित करने की शर्त पर सरकारी विद्यालय के एक शिक्षक बताते हैं कि सरकार की तरफ से मिलने वाली वेतन कभी भी समय पर नहीं मिलती है, कभी-कभी तो छह-छह महीने तक वेतन नहीं आ पाती, ऐसी स्थिति में घर कैसे चलेगा इसलिए ट्यूशन और कोचिंग चलना जरूरी हो जाता है.

GST के नाम पर हो रही है मनमानी वसूली

जहां एक ओर स्कूलों की भारी भरकम फीस तो दूसरी ओर ट्यूशन फीस, बच्चों के अभिभावकों को कर्ज के तले दबा रही है. कोचिंग संचालकों द्वारा अधिक नंबरों से पास होने के नाम पर मोटी और मनमानी फीस वसूली जा रही है. वहीं दूसरी तरफ GST के नाम पर भी इन्होंने अभिभावकों को लूटना शुरू कर दिया गया है. इस मामले में अभिभावक रितेश कुशवाहा कहते हैं, 'पहले कोचिंग की फीस 300 थी लेकिन कुछ दिन पहले बच्चे ने बताया की GST की वजह से सर ने फीस बढ़ाकर 400 कर दी है. इस तरह मनमानी फीस लेकर अभिभावकों को परेशान किया जा रहा है. अभिभावकों से GST लेने का क्या मतलब है.'

EDS PLS TAKE NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY::::::::: Moradabad: Students do the last minute revision before appearing in the 12th standard CBSE board re-examination outside an examination centre in Moradabad on Wednesday. PTI Photo (PTI4_25_2018_000048A)(PTI4_25_2018_000163B)

प्रतीकात्मक तस्वीर

वहीं इस मामले में बिहार के स्थानीय निवासी संतोष कुमार, मनोज शर्मा जो सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं और अपने बच्चों को कोचिंग में पढ़ा रहे हैं, उन्होंने बताया कि कोचिंग संचालक कोर्स पूरा करने के नाम पर 3-4 महीने की फीस एक साथ ले लेते हैं. जिसमें एक बार फीस जमा होने के बाद कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं है.

इस पूरे कालाबाज़ारी में जहां एक तरफ ज्यादा फीस लेने की बात सामने आती है वहीं छात्र जो शुल्क देतें हैं उसका असली रसीद भी नहीं दिया जाता है. जिसके कारण ऑफ दी रिकॉर्ड कितनी राशि फीस के तौर पर ली जाती है इसका कोई आंकड़ा नहीं मिल पता.

बिना रजिस्ट्रेशन चल रहा है व्यापार

देश के कई शहरों, जिलों में अधिकांश कोचिंग सेंटर्स बिना पंजीकरण के ही बड़ी आसानी से फल-फूल रहे हैं. जिसमें दिल्ली, पटना, गया, इलाहाबाद जैसे शहरी क्षेत्र शामिल हैं जहां सैकड़ों कोचिंगें सेंटर बिना पंजीकरण के ही चल रहे हैं. जबकि कोचिंग चलाने के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में पंजीकरण अनिवार्य है. इसके लिए नियमावली की बात करें तो पंजीकरण तीन सालों के लिए मान्य होता है, इसके बाद निर्धारित समय पूरा होने पर पुन: पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है. कोचिंग संचालक को 20 छात्रों पर 1000 रुपए अदा करना होता है. लेकिन कोचिंग संचालक सारे नियमों की विरुद्ध अपने व्यापार को बढ़ाने में लगे हैं.

वाराणसी के कोचिंग संस्थान में 12th की कोचिंग करने वाले मज़हर अंसारी बताते हैं हमारे यहां एक बैच में 35 बच्चे पढ़ते हैं. ओपन स्कूल से पढाई कर रहा हूं स्कूल जाने का मौका नहीं मिलता है क्यूंकि अब्बा के साथ टायर की दुकान भी चलता हूं.

वो आगे बताते हैं, 'कोचिंग की फीस 600 रुपए है जिसमें दो सब्जेक्ट सर पढ़ते हैं. क्लास जा नहीं पातें इसलिए शाम में कोचिंग से पढाई कर लेते हैं.'

कई कोचिंग सेंटर्स स्कूल-कॉलेज के समय पर क्लासेज चलते हैं जिससे स्कूल और कॉलेजों में छात्रों की नियमित उपस्थिति नहीं हो पाती. राज्य सरकार द्वारा कोचिंग संस्थानों के संचालन के नए नियम बनाए गए हैं जिसमे स्कूल-कॉलेज की कक्षाओं के समय कोचिंग क्लासेज की अनुमति नहीं है लेकिन नियमों का अनुपालन नहीं किया जाता है.

Students

प्रतीकात्मक तस्वीर

इतना ही नहीं कोचिंग की इंफ्रास्ट्रक्चर की बात की जाए तो एक-दो कमरों में भेड़-बकरियों की तरह बैठाकर पढ़ाया जाता है. यहां तक की शहर के कई आवासीय कॉलोनियों में धड़ल्ले से कोचिंग सेंटर्स चलाएं जा रहे हैं. एक-एक कक्षा में कम से कम 30 से 40 तक बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं. जिससे वहां के आवासीय लोगों को बहुत से दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

दिल्ली के बदरपुर में रहने वाले भावेश कुमार बताते हैं, 'कोचिंग ज्यादा अच्छा है. स्कूल में पढाई होती नहीं है और घर पर ट्यूशन फीस मास्टर बहुत लेते हैं इसलिए कोचिंग सही है. फिर मोहल्ले में ही बहुत सी कोचिंग खुल गई है इसलिए घर से दूर भी नहीं जाना पड़ता है.'

वही दिल्ली के मुखर्जी नगर में कोचिंग संचालक नाम ना प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं, तीन साल से सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं साथ-साथ 11th-12th के बच्चों को कोचिंग भी देते हैं 3 शिफ्ट में कोचिंग चलाते हैं.

कहते हैं एक तरफ पढ़ाई भी हो जाती है और साथ-साथ खर्च भी निकल जाता है. और टीचिंग से समाज में प्रतिष्ठा भी बनी रहती है. इनका मानना है बेरोज़गारी से अच्छा है कोचिंग चलना.

रेसिडेंशियल कॉलोनियों में भी खुल गए हैं कोचिंग सेंटर्स

इस मामले में बिहार के गया जिले के रेसिडेंशियल कॉलोनी के योगेंद्र सिन्हा बतातें हैं, गली में पिछले एक साल में 6 कोचिंग खुल गएं हैं. पूरे दिन बच्चों का आना-जाना लगा रहता है जिससे शोर तो होता ही है साथ ही घर की प्राइवेसी भी भंग होती है.

आवासीय कॉलोनियों में या घरों में कोचिंग चलने से जहां लोगों तो तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है वहीं पार्किंग की भी समस्या खड़ी हो जाती है. इस पर योगेंद्र बताते हैं बच्चे साइकिल और मोटरसाइकिलों को रोड पर या गलियों में खड़ी कर देतें हैं. जिससे आने-जाने की समस्या तो होती ही है आए दिन रास्ते और पार्किंग को लेकर भी बहस होती है. लोगों द्वारा शिकायत करने के बाद भी कोचिंग संचालक सुनने को तैयार नहीं होते हैं.

बिहार सासाराम जिला शिक्षक पदाधिकारी महेंद्र पोद्दार ने बताया कि कई कोचिंग संचालक पंजीकरण शुल्क अदा करने से कहीं ज्यादा छात्रों को पढ़ा रहे हैं. लेकिन अभी तक कोई शिकायत नहीं आई कि जिले में अवैध कोचिंग सेंटर्स चल रहे हैं. यदि कोई कोचिंग बिना पंजीकरण के संचालित होती मिली तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिक्षा का व्यवसायीकरण आज देश के लिए बड़ी चुनौती बन कर खड़ा हो गया है. अच्छी शिक्षा के नाम पर जिस तरह से कोचिंग सेंटर्स का बाजारीकरण हो रहा है इससे अभिभावकों की जेबें और ढीली होने लगी है. अभिभावक भी अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए प्राइवेट कोचिंग संगठनों को प्राथमिकता देने लगे हैं और इनकी फीस भी चुकाने को तैयार हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Social Media Star में इस बार Rajkumar Rao और Bhuvan Bam

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi