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राजस्थान: भड़के गुर्जर तो फौरन झुकीं 'महारानी' वसुंधरा

गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर राजस्थान सरकार ने एक बार फिर हथियार डाल दिये हैं

Updated On: Jul 02, 2018 09:36 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: भड़के गुर्जर तो फौरन झुकीं 'महारानी' वसुंधरा
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गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर राजस्थान सरकार ने एक बार फिर हथियार डाल दिये हैं. एक सर्कुलर जारी किया गया है जिसमें कहा गया है अति पिछड़ा वर्ग को एक फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. अति पिछड़ा वर्ग में मुख्य रूप से गुर्जर ही शामिल हैं. गुर्जरों के अलावा राइका, रैबारी, गाड़िया लुहार जैसी 4 और जातियां भी इसमें हैं. पिछले कई दिन से सरकार और गुर्जरों के बीच वार्ता के दौर चल रहे थे. लेकिन बात बनती नजर नहीं आ रही थी. तब गुर्जरों ने अपना सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र चलाया और 24 घंटे के अंदर वसुंधरा सरकार को झुकना पड़ा.

गुर्जरों की चेतावनी से चित्त हुई राजे सरकार

दरअसल, रविवार को मंत्रिमंडलीय उपसमिति और गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के बीच 4 घंटे से भी लंबी मीटिंग चली थी. संघर्ष समिति के प्रवक्ता हिम्मत सिंह ने बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए सरकार पर पुराने समझौते के पालन में ढीले रवैये का आरोप लगाया था. उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर 24 घंटे के अंदर सरकार ने आरक्षण पर आदेश जारी नहीं किया तो 7 जुलाई को प्रधानमंत्री की रैली का विरोध किया जाएगा.

इसके बाद सरकार के हाथ पांव फूल गए. गुर्जर आरक्षण आंदोलन का हिंसक इतिहास देखते हुए सरकार किसी भी तरह की रिस्क लेने के हालात में नहीं थी. हालांकि बैठक से बाहर आकर पंचायतीराज मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने यही दावा किया कि गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के साथ देवनारायण योजना, गुरुकुल आवास योजना, गुर्जर आंदोलन के दौरान दर्ज केस वापस लेने संबंधी मामलों पर बात हुई और सभी प्रतिनिधि संतुष्ट होकर गए हैं.

gurjar agitation

गुर्जर आंदोलन की प्रतीकात्मक तस्वीर

लेकिन बैठक के बाद 24 घंटे पूरे होने से पहले ही सरकार ने सर्कुलर जारी कर दिया. इससे साफ है कि सरकार गुर्जरों की धमकी से बैकफुट पर थी. प्रदेश अध्यक्ष के मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व से आरपार के बाद वसुंधरा राजे प्रधानमंत्री की रैली को लेकर कोई रिस्क लेने की स्थिति में नहीं थी.

क्या है सर्कुलर में ?

कार्मिक विभाग की और से जारी आदेश में लिखा गया है कि अति पिछड़ा वर्ग को एक फीसदी आरक्षण दिया जाए जो कि निर्धारित 50 फीसदी के अंदर ही है. सर्कुलर में स्पष्ट किया गया है कि मेरिट के आधार पर MBC के जो बच्चे सामान्य श्रेणी में शामिल नहीं हो पाए हैं, उनको अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का 21% आरक्षण दिया जाए. इसके बाद बचे अभ्यर्थियों को MBC का 1% आरक्षण दिया जाए.

सर्कुलर में पिछले साल जुलाई में ही निकाले गए आदेशों का हवाला भी दिया गया है. हालांकि इस आदेश से सरकार ने प्रधानमंत्री की रैली को लेकर फौरी राहत की सांस ली है. लेकिन ये स्थाई शांति नहीं है. गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रवक्ता हिम्मत सिंह ने दावा किया कि 13 साल से गुर्जर संघर्ष कर रहे हैं जबकि सरकार ने उनके साथ की गई संधि के एक भी बिंदु का पालन नहीं किया है.

गुर्जर नेता और पूर्व संसदीय सचिव रामस्वरूप कसाणा ने भी कहा कि 1 फीसदी आरक्षण का आदेश जारी कर सरकार ने कुछ नया नहीं किया है बल्कि ये तो गुर्जर समाज का अधिकार है. बीजेपी ने 2013 के अपने चुनाव घोषणापत्र में गुर्जरों को आरक्षण का वादा किया था. लेकिन चुनाव दोबारा सिर पर हैं और बीते साढ़े चार साल में इस दिशा में कुछ विशेष नहीं किया गया है.

बार-बार फंसता है गुर्जर आरक्षण का मामला

अपने कई लेखों में हम बता चुके हैं कि आरक्षण की गुर्जरों की मांग पुरानी है. 2007-08 में वसुंधरा राजे की पिछली सरकार में ये आंदोलन सबसे ज्यादा हिंसक हो गया था. अब तक इस आंदोलन में 70 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जबकि अरबों रुपये की संपत्ति का नुकसान हम देख चुके हैं.

इस मामले में बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर ही विपक्ष में रहते वोटों के लिए गुर्जरों को भड़काने के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि वसुंधरा सरकार इस मामले में विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर चुकी है. लेकिन हर बार कुल आरक्षण 50% के ऊपर जाने के चलते अदालत में खारिज हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा से बचने के लिए गुर्जर आरक्षण के मसले को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने की मांग भी की जाती रही है.

gurjar quota

2008 में भड़के आंदोलन की तस्वीर ( रॉयटर्स इमेज )

गुर्जर नेता वसुंधरा सरकार पर आरक्षण के मसले को न्यायालय में ठीक से पैरवी न करने का आरोप भी लगाते रहे हैं. हालांकि बीजेपी नेता हर बार इसका खंडन करते हैं और गुर्जर आरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी जाहिर करते हैं. बीजेपी नेता और पूर्व विधायक अतर सिंह भड़ाना का कहना है कि बीजेपी ने जिस तरह जाट जाति को ओबीसी में शामिल करवाया, उसी तरह गुर्जरों को भी उनका हक देने को तैयार है. लेकिन सबसे बड़ा पेंच फंसता है 5% आरक्षण की मांग का 50% की सीलिंग से ऊपर चले जाना.

बाकी जातियां गुर्जरों से सहमत नहीं

आरक्षण को लेकर सरकार जिस तरह से बार-बार गुर्जरों के सामने घुटने टेक देती है, उसने समाज में नकारात्मक संदेश ही ज्यादा फैलाया है. पहले भी पूर्वी राजस्थान में गुर्जर और दूसरी प्रभावी जाति मीणा के बीच सामाजिक संघर्ष के हालात पैदा हो गए थे. हालात इस कदर बिगड़ गए थे कि दोनों समुदाय आमने-सामने आ डटे थे.

इसके बाद गुर्जरों ने एसटी वर्ग की जगह विशेष पिछड़ा वर्ग (SBC) के तहत आरक्षण की मांग शुरू की. इसके सुप्रीम कोर्ट में अटकने के बाद गुर्जरों ने ओबीसी कोटे का वर्गीकरण कर 5% उनके लिए आरक्षित करने की मांग की. सरकार इस मांग के आगे भी झुक गई और ओबीसी कोटे को 21% से बढ़ाकर 26% करने और ये बढ़ा हुआ प्रतिशत SBC को देने का मन बना लिया.

तुष्टिकरण के आरोप कांग्रेस पर लगाए जाते रहे हैं लेकिन गुर्जरों को शांत रखने के लिए बीजेपी भी इसी का सहारा लेती रही है. गुर्जरों की धमकियों के बाद देवनारायण योजना का विस्तार किया गया. नए आवासीय विद्यालयों की घोषणा की गई. गुर्जरों को विशेष छात्रवृत्तियां बांटी जा रही हैं. सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के दर्ज मामले वापस लिए जा रहे हैं. और तो और, प्रधानमंत्री की रैली में बाधा पहुंचाने की धमकी के बाद सरकार ने गुर्जर प्रतिनिधियों को देवनारायण योजना के 1 हजार करोड़ रुपये का रोडमैप भी मुहैया करा दिया.

गुर्जरों के सामने सरकार के बार-बार के ऐसे रवैये ने बाकी जातियों में रोष उत्पन्न कर दिया है. आरक्षण खत्म करने की लड़ाई लड़ रहे समता आंदोलन समिति के पाराशर नारायण शर्मा का कहना है कि सरकार की ये नीति दूसरे समूहों को भी अपनी मांगों के लिए धमकी देने का रास्ता अपनाने को प्रोत्साहित करेगी. शर्मा का आरोप है कि बीजेपी ने आर्थिक रूप से पिछडों (EBC) को आरक्षण देने का भी वादा किया था. लेकिन 6 महीने से भी ज्यादा समय से EBC आयोग की रिपोर्ट को खोला तक नहीं गया है.

बहरहाल, समाज से अपवंचना दूर किए बिना संविधान सम्मत सकारात्मक भेदभाव को गैर-जायज नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन सरकारों को ऐसे हालात भी पैदा नहीं होने देना चाहिए कि आरक्षण के लिए बार-बार धमकियों का सहारा लेना पड़े. राजस्थान में अगले कुछ महीनों तक चुनाव प्रचार का जोर रहने वाला है. ऐसे में राजे सरकार को ऐसी कोई व्यवस्था बनानी चाहिए कि किसी को रैलियों में बाधा पहुंचाने का रास्ता अपनाने को मजबूर न होना पड़े.

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. )

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