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अगर नहीं हुई ईमानदारी से कोशिश, तो न खाना बचेगा न जमीन...

मौसम परिवर्तन के खतरे केवल बढ़ते तापमान के रूप में ही सामने नहीं आने वाले हैं, बल्कि भीषण तबाही मचाने वाली बाढ़ और हाड़ कंपाने वाली सर्दी भी आने वाले दिनों में आम होने जा रहे हैं

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar Updated On: Jul 29, 2017 09:56 AM IST

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अगर नहीं हुई ईमानदारी से कोशिश, तो न खाना बचेगा न जमीन...

इस साल मॉनसून के केरल पहुंचने के महज हफ्ते भर बाद जब पूरा देश गर्मी से राहत पाने के लिए बारिश का इंतजार कर रहा था, उसी समय इरविन में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की ओर से प्रकाशित जर्नल साइंस एडवांसेज ने एक रिपोर्ट जारी की.

रिपोर्ट में कहा गया था कि 1960 से 2009 के बीच 50 सालों में भारत में औसत तापमान में 0.5 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है, जिसका नतीजा यह हुआ है कि इस दौरान गर्म हवाओं के थपेड़ों में 150 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और इसके कारण कम से कम 100 लोगों की मौत हुई है.

रिपोर्ट में 2009 के बाद तापमान में हुई तेज बढ़ोतरी का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि 2010 में लू से 1300 लोगों की मौत हुई, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 1500 और 2015 में 2500 तक पहुंच गया. गर्मियों के आखिर में जारी इस रिपोर्ट में मौसम में बदलाव के कारण बढ़ते औसत तापमान पर चिंता जाहिर की गई थी, लेकिन उस समय शायद ही किसी को अंदाजा था कि आने वाली बारिश भी इस बदलाव का कहर साथ लेकर आने वाले ही.

अगले छह-सात हफ्तों में देश के लगभग हर हिस्से में आई भीषण बाढ़ ने यह भी साबित कर दिया कि मौसम परिवर्तन के खतरे केवल बढ़ते तापमान के रूप में ही सामने नहीं आने वाले हैं, बल्कि भीषण तबाही मचाने वाली बाढ़ और हाड़ कंपाने वाली सर्दी भी आने वाले दिनों में आम होने जा रहे हैं.

ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से बिजली गिरने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है.

इतना ही नहीं, मौसम में बदलाव का असर भूजल के स्तर, कृषि, स्वास्थ्य, पेयजल की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों पर भी बेहद भयानक रूप में सामने आ सकता है.

विकास और जनजीवन पर मौसम में बदलाव के असर को ठीक तरह से समझने के लिए विश्व बैंक ने इस दशक की शुरुआत में पॉट्सडम इंस्टीट्यूट ऑफ क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च एंड क्लाइमेट एनालिटिक्स को कमीशन किया, जिसे दक्षिण एशिया में औसत तापमान 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने के कारण होने वाले संभावित दुष्परिणामों पर रिपोर्ट देनी थी. इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में भारत पर इसके असर को खास तौर पर रेखांकित किया गया.

इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के कुछ मुख्य निष्कर्ष इस तरह थेः

 पश्चिमी तट और दक्षिण भारत एक नए उच्चतर तापमान वाले जलवायु के दौर में पहुंच जाएंगे, जिसका खेती पर बहुत बुरा असर होगा

 दुनिया का तापमान 2 डिग्री बढ़ने से भारत में गर्मियों का मानसून एकदम अप्रत्याशित हो जाएगा और 4 डिग्री की वृद्धि से अभी 100 वर्षों में एक बार आने वाली बेहद भारी बारिश 10 वर्षों में एक बार आनी शुरू हो जाएगी और यह स्थिति इसी सदी के आखिर दिखने लगेगी. जब मौसम सूखा होगा, तो बिलकुल सूखा होगा और जब बारिश होगी, तो इतनी होगी कि तबाही आ जाए.

 उत्तर-पश्चिम भारत, झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में सूखे का दौर शुरू हो जाएगा और 2040 तक कृषि उत्पादकता में महत्वपूर्ण गिरावट दिखने लगेगी.

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 2.5 डिग्री तापमान बढ़ने से हिमालय पर बर्फ की परत हल्की पड़ने लगेगी और ग्लेशियर से निकलने वाली नदियां, खास तौर पर गंगा और ब्रह्मपुत्र में पानी का स्तर घटने लगेगा. अतिशय वर्षा से जरूर इन नदियों में पानी रहेगा, लेकिन साल भर पानी का एक जैसा बहाव देखने को नहीं मिलेगा. इससे इन दोनों नदियों के कैचमेंट एरिया में होने वाली खेती प्रभावित होगी और करोड़ों लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा.

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 भूमध्यरेखा के ज्यादा करीब रहने के कारण भारत पर दुनिया के कई दूसरे देशों के मुकाबले समुद्र स्तर में होने वाली बढ़ोतरी का ज्यादा असर पड़ेगा. समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी और तूफानों से तटीय इलाकों में खेती के लिए उपलब्ध पानी की गुणवत्ता में गिरावट आएगी, पेयजल में संक्रमण बढ़ेगा और भूजल की गुणवत्ता गिरेगी.

इससे दस्त और हैजा जैसी बीमारियां फैलेंगी. दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के पार्था सेन और श्रीकांत गुप्ता की संयुक्त रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय तटों के गिर्द मौजूद समुद्रतल में प्रति वर्ष 1.3 एमएम की बढ़ोतरी होगी.

 खाद्य सुरक्षा पर मौसम में बदलाव का घातक असर दिखना पहले ही शुरू हो चुका है. चावल विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक मौसम में बदलाव का यह असर अगर नहीं होता तो भारत में चावल उत्पादन का औसत यील्ड करीब 6 प्रतिशत ज्यादा होता, जिससे हम 7.5 करोड़ टन ज्यादा चावल का उत्पादन कर रहे होते.

इसी तरह रिपोर्ट के मुताबिक भारत और बांगलादेश में 2001 में गेहूं की उत्पादकता अपने चरम पर पहुंच चुकी है और इसके बाद से इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. ऐसे में यदि 2050 तक दो डिग्री तापमान और बढ़ जाता है तो भारत को बिना क्लाइमेट चेंज के जितने अनाज का आयात करने की जरूरत पड़ती, उससे दोगुना अनाज विदेशों से खरीदना पड़ेगा.

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 सेन और गुप्ता की रिपोर्ट में दावा किया गया है 2030 तक तापमान दो डिग्री तक बढ़ जाएगा, जिससे मक्के की उत्पादकता आधी रह जाएगी, चावल की उत्पादकता में 4-35 प्रतिशत तक कमी होगी, नारियल की उत्पादकता बढ़ेगी, सेब का उत्पादन घटेगा हर इलाके में पशुओं पर बुरा असर दिखेगा.

 भारतीय प्रायद्वीप में क्लाइमेट चेंज के कारण आने वाले दशकों में जो अनिश्चितता बढ़ेगी और जिस तरह बाढ़, सूखे व अनाज की कमी की परिस्थितियां उत्पन्न होंगी, उससे एक बड़ा भू-राजनीतिक संकट खड़ा होगा और बड़े पैमाने पर माइग्रेशन, दंगे और कानून-व्यवस्था की समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

क्या हैं बचाव के उपाय 

मौसम में बदलाव के कारण पैदा होने वाले इन संकटों की पृष्ठभूमि में सबसे अहम सवाल यही खड़ा होता है कि क्या इनसे बचने का कोई उपाय है या फिर हम केवल एक ‘सिटिंग डक’ की भांति इस तबाही का शिकार बनने तक इंतजार करने के लिए ही मजबूर हैं.

कड़वा सच यही है कि इस स्थिति को रोकने के लिए बहुत कुछ कर सकना मुमकिन नहीं है क्योंकि मौसम में आ रहा बदलाव पिछले 100 से ज्यादा सालों की इंसानी गतिविधियों और कुदरत के प्रति असंवेदनशील रवैये का नतीजा है.

लेकिन कुछ उपाय जरूर हैं, जिन्हें अपना कर आने वाले दशकों में होने वाली तबाही की गति को धीमा किया जा सकता है और साथ ही आगे के लिए सकारात्मक पहल की जा सकती है.

 सबसे बड़ा बदलाव शहरों की योजना में करना होगा. हम शहरीकरण को नहीं रोक सकते, इसलिए जरूरी है कि शहरों की बसावट, उसमें भवन निर्माण और नागरिक सुविधाओं की उपलब्धता के बारे में निश्चित नियम बनें और उनका कठोरता से पालन हो.

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रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए अनिवार्य प्रावधान होना चाहिए और विद्युतीकरण के लिए रीन्युएबल एनर्जी पर ज्यादा से ज्यादा निर्भरता बढ़नी चाहिए. बिल्डिंग कोड बनाकर भवन निर्माण का बुनियादी ढांचा ऐसा सुनिश्चित करना चाहिए कि वह ज्यादा से ज्यादा तापमान और बारिश का असर सह सके. भूजल के बेहतर इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

 मौसम की भविष्यवाणी के लिए मौजूद सिस्टम को और दुरुस्त किए जाने की जरूरत है ताकि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को पहले से भांप कर प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को समय रहते बाहर निकाला जा सके.

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 कृषि से संबंधित शोध में सूखे या कम से कम पानी में पैदा हो सकने वाली फसलों की प्रजातियां विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए. बहुफसलीकरण, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों के जरिए सिंचाई में पानी का बेहतर इस्तेमाल, मिट्टी संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान इत्यादि ऐसे उपाय हैं, जिनसे खेती पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है.

 पानी के स्टोरेज पर निवेश बढ़ा कर उसे बड़े-बड़े बांधों की जगह छोटी-छोटी मात्रा में ज्यादा जगहों पर किया जाना चाहिए ताकि ज्यादा बारिश होने पर उसे इकट्ठा किया जा सके और फिर सूखे की स्थिति में उसका इस्तेमाल किया जा सके. तटीय इलाकों में जहां जरूरी हो वहां अभी से बांध बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए और तटीय विनियमित क्षेत्र के नियम लागू किए जाने चाहिए.

देश के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़ और सूखे के खतरनाक हालात ने क्लाइमेट चेंज के असर के वैज्ञानिक शोधपत्रों से निकल हमारे घर में घुसने का ऐलान तो कर ही दिया है. अब इससे होने वाली साल दर साल की तबाही को किस हद तक कम किया जा सकेगा, वह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्लाइमेट चेंज के प्रति हमारी संवेदनशीलता और जागरूकता को किस हद तक हम बुनियादी उपायों में ढाल पाते हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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