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क्लाइमेट चेंज: मॉनसून की लुकाछिपी में हलकान होते किसानों के अरमान

देश में होने वाली बरसात का पैटर्न लगातार बदलने से बढ़ रही है किसानों की मुश्किलें

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar Updated On: Jul 14, 2017 09:59 PM IST

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क्लाइमेट चेंज: मॉनसून की लुकाछिपी में हलकान होते किसानों के अरमान

भारतीय किसानों की मौसम पर निर्भरता एक ऐसा जाना-माना तथ्य है, जिस पर शायद ही कोई भ्रम या विवाद हो. देश में करीब 14.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है, जिसमें से करीब 8 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है. यानी देश में कुल खेती योग्य जमीन का 55 प्रतिशत अपनी फसलों के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर है.

देश की खाद्य सुरक्षा और खाने-पीने की चीजों की महंगाई पर इस स्थिति का गहरा प्रभाव है. एक आंकड़े के जरिए इसे और बेहतर तरीके समझा जा सकता है कि इस असिंचित जमीन पर ही देश के कुल दाल और मोटे अनाज के उत्पादन का 85 प्रतिशत, तिलहन का 75 प्रतिशत और कॉटन का 65 प्रतिशत पैदा होता है. जाहिर है कि सिंचाई की सुविधा नहीं होने के कारण कुल खेती योग्य जमीन की 55 प्रतिशत पर उत्पादकता बहुत कम है. इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है.

हाल के सालों में मॉनसून का पैटर्न बदलने से बढ़ी हैं मुश्किलें

यह तो हुई पारंपरिक हालात की बात. लेकिन हाल के वर्षों में स्थितियां और बिगड़ी हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि देश में होने वाली बरसात का पैटर्न लगातार बदलता जा रहा है. इस अनिश्चितता के कारण पहले से 55 प्रतिशत असिंचित भूमि के किसान तो मुश्किल में थे ही, लेकिन अब बाकी के 45 प्रतिशत जमीन के किसान भी हलकान हैं.

पिछले साल राजस्थान के जोधपुर में बाढ़ के कारण सड़कों पर बहती गाड़ियों के दृश्य हों या महाराष्ट्र, कर्नाटक और तामिलनाडु में पिछले 3-4 वर्षों से पड़ा सूखा, बदलते मौसम के चलते देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली वर्षा की अनिश्चितता सदियों की पारंपरिक खेती का बेड़ा गर्क कर रही है.

खेती के हालात और बिगड़ते जाएंगे!

एक समाचार वेबसाइट को 2010 में दिए इंटरव्यू में आईसीएआर के तत्कालीन उप महानिदेशक ए के सिंह ने बताया था कि मौसम में बदलाव के कारण 2039 तक फसलों की उत्पादकता में 4.5 से 9 प्रतिशत तक की गिरावट आ जाएगी, जो कि 2099 तक 25 प्रतिशत तक कम हो सकती है. इसकी सीधी चोट किसानों की आमदनी पर पड़नी तय है.

लगभग 3000 विशेषज्ञों वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था आईपीसीसी (मौसम में बदलाव पर अंतरसरकारी पैनल) के अध्ययन में भी संकेत दिया गया है कि क्लाइमेट चेंज के कारण भारत में चावल और गेहूं के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है. पैनल ने अनुमान जताया है कि तापमान में 1.5 प्रतिशत और बारिश में 2 एमएम की बढ़ोतरी से चावल की उत्पादकता में 3-15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है.

औसत तापमान में हो रही है लगातार बढ़ोतरी

इसके साथ ही देश के बड़े भूभाग में कई मानसून तक पर्याप्त बारिश न होने से भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है. कई इलाकों में तो यह 1000 फुट तक नीचे चला गया है, जिसके कारण सिंचाई के लिए ट्यूबवेल के इस्तेमाल में किसान की लागत लगातार बढ़ती जा रही है. बारिश के अलावा मौसम में बदलाव का एक अन्य बड़ा असर औसत तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी और गर्मी और सर्दी के सामान्य महीनों में हो रहा बदलाव भी है.

इन सब कारणों से सीधे तौर पर किसान की उपज की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है क्योंकि हर फसल के तैयार होने की कुछ आदर्श स्थितियां होती हैं. उन स्थितियों में जितना ज्यादा अंतर (वैरिएशन) आएगा, फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में उतना ही कमी आएगी. इसे नीचे दिए गए टेबल से समझा जा सकता हैः

cropchart

गुणवत्ता और उत्पादकता में आने वाली इस कमी का सीधा कारण है. कारण यहै है कि मौसम में बदलाव आया है. इस वजह से मिट्टी की गुणवत्ता में भी बदलाव हुआ है. मिट्टी में जब गर्मी बढ़ती है तो एक ओर तो उसके कार्बन और नाइट्रोजन का अनुपात कम हो जाता है. दूसरी ओर उसमें कार्बनिक तत्वों (ऑर्गेनिक एलिमेंट्स) की मात्रा भी कम होने लगती है.

मिट्टी में नमी घटती है और इससे जड़ों की वृद्धि प्रभावित होती है. साथ ही ऑर्गेनिक एलिमेंट्स के डिकम्पोजिशन की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है. इन सब प्रक्रियाओं से पौधे कीटों और बीमारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं. नतीजा, ज्यादा खाद, कीटनाशकों का इस्तेमाल यानी किसानों के लागत खर्च में बढ़ोतरी और अनाज की गुणवत्ता में कमी.

कितना रंग लाएगी सरकारों की कोशिशें

मौसम में बदलाव को रोकने के लिए दुनिया भर की सरकारें पेरिस समझौते के तहत अपनी-अपनी कोशिशें कर रही हैं. लेकिन भारत में इसके कारण आने वाली इन दिक्कतों का मुकाबला करने के लिए सरकार और किसान संगठनों को अपनी तरह से तैयारी करने की जरूरत है. सबसे पहले किसानों को आने वाली इन मुश्किलों के बारे में जागरूक करने की जरूरत है.

इसके बाद ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई तकनीकों को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने और रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों की जगह जैविक इनपुट का इस्तेमाल बढ़ाने पर ध्यान देना होगा. गुणवत्ता और उत्पादकता को बदलते मौसम की मार से बचाने के लिए किसानों और नीति निर्माताओं को एक सुर-ताल के साथ कदम बढ़ाना होगा, तभी इस खतरे का सामना किया जा सकता है.

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