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चर्चों में कायम है यौन उत्पीड़न की अलग ही दुनिया, 'दरिंदों' और 'ईश्वर' दोनों से है लड़ाई

काफी पहले ही चर्चों में सफाई अभियान को चलाने की जरूरत थी. क्या हम अब अपने युवाओं को सेक्स के इन दरिंदों से बचाने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं?

Updated On: Sep 23, 2018 09:14 AM IST

Romal Laisram

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चर्चों में कायम है यौन उत्पीड़न की अलग ही दुनिया, 'दरिंदों' और 'ईश्वर' दोनों से है लड़ाई

(संपादक की टिप्पणीः यह खबर चर्च और उसके द्वारा चलाए जा रहे अन्य संस्थानों में यौन उत्पीड़न के मामलों की पड़ताल से जुड़ी सीरीज का हिस्सा है. इस सीरीज में पेश रिपोर्ट वैचारिक लेखों, पीड़ितों, आरोपियों, चर्च से जुड़े वरिष्ठ लोगों, इस धार्मिक संस्था के अन्य सदस्यों और सरकारी अधिकारियों के साथ इंटरव्यू पर आधारित हैं. इन रिपोर्ट्स का मकसद इस मुद्दे से संबंधित तीन महत्वपूर्ण संस्थाओं की भूमिका की पड़ताल करना है. इन संस्थाओं में चर्च, समुदाय और सरकार शामिल हैं.)

बाकी ईसाई लड़कों की तरह रिजो* की परवरिश भी 'ईश्वर से डरने वाले पारंपरिक ईसाई' परिवार में हुई थी. रिजो का परिवार पारंपरिक चर्च प्रणाली में जिस पादरी समुदाय से ताल्लुक रखता था, उसे चर्च और पादरियों के बीच काफी सम्मान प्राप्त था. रिजो भी खुद पादरी बनने की इच्छा के साथ बड़े हुए. उनकी राय में यह सबसे प्रतिष्ठित काम था और उनका परिवार भी पूरी तरह से उनकी इस आकांक्षा को लेकर सहमत था. हालांकि, दसवीं पास करने के तुरंत बाद पादरियों के साथ उनके कड़वे अनुभवों की शुरुआत हो गई.

मुलाकात के बाद से ही बिशप की हरकतों को लेकर पैदा हो गई थी शंका

लगभग 16 साल की उम्र में रिजो की मुलाकात बेंगलुरु स्थिति अपने घर में एक मशहूर बिशप से हुई. इस जाने-माने बिशप से मिलकर रिजो की खुशी का ठिकाना नहीं था. मुलाकात के दौरान रिजो ने पादरी के जीवन को लेकर अपनी पसंद के बारे में बिशप को बताया. इससे प्रभावित होकर बिशप ने युवा रिजो से फोन नंबर देने और नियमित तौर पर संपर्क में रहने को कहा. बिशप और रिजो की अधिकांश बातचीत इस युवा शख्स को पादरी बनाने के बारे में होती थी. उस वक्त सब कुछ ठीक-ठाक नजर आ रहा था.

तकरीबन एक साल बाद बिशप ने बेंगलुरु का दौरा किया. बेंगलुरु पहुंचने के बाद उन्होंने खुद से रिजो के घर भी आने की इच्छा जाहिर की. साथ ही, अचानक से एसएमएस के जरिये बिशप का अंदाज पूरी तरह से बदला हुआ नजर आ रहा था. रिजो ने इस घटना को याद करते हुए बताया कि जब इसी तरह का एक एसएमएस उन्हें मिला था, तो उनका दिमाग पूरी तरह से चकरा गया था. वह कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि बिशप का इरादा क्या है.

बिशप की तरह से भेजे गए एसएमएस का टेक्स्ट कुछ इस तरह था: 'चिंता मत करो, मैं घर आऊंगा और तुम्हारे साथ सोना पसंद करूंगा. हम एक ही बिस्तर साझा करेंगे और एक ही कंबल में सोएंगे.' उस दौर में रिजो खुद भी शारीरिक बदलाव के दौर से गुजर रहे थे और मैसेज का यह अंदाज उन्हें काफी अटपटा और असहज करने वाला लगा. जब बिशप उनके घर नहीं आ सके, तो उन्हें काफी खुशी और राहत महसूस हुई. दरअसल, इसके बदले बिशप ने बिशप हाउस का निमंत्रण स्वीकार कर लिया था. हालांकि, बिशप हाउस में रिजो भी पहुंचे और दोनों की मुलाकात के दौरान लंबे समय तक जमकर धार्मिक चर्चाएं हुईं. इसके बाद बिशप इस बात के लिए दबाव डालने लगे कि रिजो रात में उनके साथ बिशप हाउस में ही ठहरें. हालांकि, रिजो बिशप के इस आग्रह को स्वीकार नहीं कर सके क्योंकि उनके लिए रात में अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए घर लौटना जरूरी था.

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एक रात की घटना ने रिजो के पूरे नजरिए को बदल दिया

इसके बाद एक साल गुजर गया और इस दौरान दोनों के बीच संपर्क भी लगातार बढ़ता गया. बहरहाल, इस दौरान ऐसा लग रहा था कि बिशप किसी तरह का नुकसान पहुंचाने वाले नहीं हैं और धीरे-धीरे रिजो की चिताएं दूर हो गई थीं.

इसके बाद रिजो को चेन्नई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला मिल गया था और वह अब भौगोलिक रूप से बिशप के ज्यादा करीब पहुंच चुके थे. रिजो के कॉलेज में दाखिला लेने के बाद शुरू-शुरू में धर्मशास्त्र के प्रति रुझान रखने वाले कुछ छात्रों को बाइबिल से जुड़े अध्ययन के लिए इस बिशप की तरफ से बिशप हाउस आने का निमंत्रण दिया गया. दिलचस्प बात यह थी कि जब ये छात्र समूह में रहते थे, तो बिशप का व्यवहार सौम्य और भरोसेमंद बना रहता था. हालांकि, एक रात की घटना ने सब कुछ बदल गया, जब रिजो को अजीबो-गरीब अनुभव से गुजरना पड़ा.

रिजो को यह घटना अब तक अच्छी तरह से याद है. उन्होंने इसे याद करते हुए बताया, 'हमने उस रोज बाइबिल से जुड़ा अध्ययन काफी देर में समाप्त किया और बिशप ने रात गुजारने के लिए हमें अपने घर पर ही बुला लिया. बिशप हाउस में गेस्टरूम बिशप के कमरे से अलग फ्लोर पर था और जब हम रात में आराम करने के लिए गेस्टरूम में आ गए तो मुझे बिशप की तरह से एक मैसेज मिला. बिशप की इच्छा थी कि मैं उस शख्स के कमरे में जाकर उनसे मुलाकात करूं.'

'किसी तरह की अनहोनी की आशंका के बिना मैं बिशप के कमरे में पहुंच गया. कमरे में पहुंचने के बाद हम दोनों के बीच बेहद आध्यात्मिक मुद्दों पर बातचीत होने लगी. इसी बीच, बिशप ने अचानक से बातचीत का रुख मेरे निजी अंगों की साफ-सफाई की तरफ मोड़ दिया. बिशप यह जानना चाहते थे कि क्या मैं गुप्तांगों के पास के अपने बाल को शेव करता हूं. जाहिर तौर पर इस तरह की बात को सुनकर मैं सदमे में था और मेरे पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे. इसके तुरंत बाद बिशप का हाथ मेरी पैंट के भीतर था. बिशप ने मेरी जिप खोल दी और मेरा हाथ अपने अंगों (गुप्तांगों) की तरफ करने लगे. इसके बाद वह धीरे-धीरे इसी तरह की कुछ और आपत्तिजनक हरकतें करने लगे.'

'यह अब कुछ अचानक और तेजी से हो रहा था, लिहाजा मुझे पूरी तरह से चीजों का भान होने में थोड़ा सा वक्त लगा. मैंने पूरी हिम्मत जुटाकर बिशप से पूछा, 'आपका आत्मनियंत्रण और संयम कहां है?' ऐसा लगा कि इसके बाद उनके दिमाग को थोड़ा सा झटका लगा और उन्होंने बदुबुदाते हुए कहा कि उनका आत्मनियंत्रण कायम है, क्योंकि वह स्खलित नहीं हुए. इसके अलावा, बिशप का यह भी कहना था कि यह किस भी तरह से पाप नहीं है. इसके बाद बिशप ने मुझसे जाने को कहा.'

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रिजो अगली सुबह ही बिशप हाउस से चले गए और इस घटना के तकरीबन एक साल तक बिशप द्वारा उन्हें अश्लील सामग्री भेजने का सिलसिला जारी रहा. अश्लील सामग्री भेजने का सिलिसिला तब थमा, जब वह बिशप की इस तरह की हरकतों को लेकर और मुखर हुए. बिशप अब रिजो को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं. रिजो कहते हैं, 'मैं उन चुनिंदा खुशकिस्मत लोगों में शामिल हूं, जो इस तरह की थोड़ी-बहुत दिक्कतों का सामना कर ही इस तरह की चीजों से बच निकले. जिन लोगों ने इस शख्स का विरोध नहीं किया होगा, पता नहीं उन्हें किस तरह के अनुभवों का सामना करना पड़ा होगा.'

केरल में एक नन की ओर से बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर लगाए गए रेप के आरोप पर कार्रवाई की मांग करती ननें.

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इन ‘दरिंदों’ से लोगों को बचाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत

रिजो देशभर के वैसे हजारों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें ईसाई धर्म से जुड़े संगठनों में तभी स्वीकार किया जाता है, जब वे पादरियों और अन्य धार्मिक नेताओं के हाथों होने वाले इस तरह के बर्ताव पर चुप्पी साधे रहते हैं. अगर ये लोग ईसाई धर्म के इन प्रतिनिधियों के खिलाफ बोलते या विद्रोह करते हैं तो उन्हें अपने ही साथ होने वाले 'पाप' के लिए धर्म से बहिष्कृत कर दिए जाने का डर होता है. पादरियों और सामान्य लोगों के लिए नियमों और नैतिकता के अलग-अलग पैमाने होते हैं... कम से कम कई चर्च तो बिल्कुल ऐसा ही चाहते हैं.

इस तरह का माहौल बनाया जाता है कि अगर आप इन चीजों के बारे में खुलकर बात करते हैं तो आप 'पापी' हैं. अगर आप इन मुद्दों पर खुलकर नहीं बात करते हैं, तो इस तरह का उत्पीड़न आपको ईश्वर के करीब पहुंचा सकता है और इस तरह से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से युवाओं के संवेदनशील दिमाग को गुमराह किया जाता है. काफी पहले ही चर्चों में सफाई अभियान को चलाने की जरूरत थी. इसके कारण हम पहले ही कई युवा निर्दोष लोग गंवा चुके हैं. क्या हम अब अपने युवाओं को सेक्स के इन दरिंदों से बचाने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं? या क्या कम से कम इस सिस्टम के दायरे के भीतर मौजूद दरिंदों के संरक्षण का काम बंद किया जा सकता है?

*पहचान सुरक्षित रखने के लिए नाम बदल दिया गया है

(लेखक गे मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और वह इससे संबंधित अधिकारों के लिए ईसाई संगठनों के साथ काम करते हैं)

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