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राजस्थान: सिर्फ मुस्लिम कर्मचारियों की गिनती क्यों कर रही है सरकार?

मुसलमान कर्मचारियों की अलग से गिनती करने का ये कदम 70 साल बाद अब फिर से चर्चा में आया है. वो भी ऐसे वक्त में जब एक बार फिर देश में अविश्वास के माहौल की चिंताएं हैं

Mahendra Saini Updated On: Dec 15, 2017 08:21 AM IST

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राजस्थान: सिर्फ मुस्लिम कर्मचारियों की गिनती क्यों कर रही है सरकार?

राजस्थान सरकार अपने अधीन मुस्लिम कार्मिकों की गिनती करवा रही है. फिलहाल ऐसे आदेश स्वास्थ्य विभाग ने जारी किए हैं. चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सेवाओं के संयुक्त निदेशक के लेटरहैड पर एक आदेश जारी किया गया है. इसमें कहा गया है कि स्वास्थ्य विभाग के उपकेंद्रों/पीएचसी/सीएचसी पर जितने भी मुस्लिम कार्मिक तैनात हैं, उनका ब्यौरा जल्द से जल्द इकट्ठा किया जाए.

हालांकि अभी ये कदम स्वास्थ्य सेवाओं में ही देखने को मिला है. हो सकता है कि दूसरे विभागों में भी जल्द ही ऐसा करने की तैयारी की जा रही हो. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि ऐसा सिर्फ राजस्थान में नहीं किया जा रहा है. दूसरे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी मुस्लिम कर्मचारियों की गिनती या तो शुरू हो चुकी है या जल्द शुरू हो जाएगी.

ऐसा इसलिए कह पा रहे हैं क्योंकि आदेश में ही स्पष्ट किया गया है कि मुस्लिम कर्मचारियों की ये गिनती भारत सरकार के लिए की जा रही है. राजस्थान सरकार के लेटरहैड के साथ केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का पत्र भी संलग्न है. उपसचिव जिले सिंह विकल के दस्तखत से जारी इस पत्र में पुराने पत्रों का हवाला देकर कहा गया है कि मुस्लिम कार्मिकों की जानकारी देने में अब और देरी न की जाए.

पत्र में 2 ई-मेल आईडी दी गई हैं, जिनपर निर्धारित प्रफॉर्मा में ये जानकारी भेजनी है. पत्र के साथ संलग्न अनुसूची में स्वास्थ्य उपकेंद्रो/पीएचसी/सीएचसी में ग्रुप ए, ग्रुप बी, ग्रुप सी और ग्रुप डी में तैनात मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या और उनकी तैनाती की जगह भरने के कॉलम बने हुए हैं.

मुसलमान कार्मिकों की गिनती पहली बार नहीं

आजादी के तुरंत बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी ऐसा ही एक आदेश जारी किया था. इसके तहत केंद्र सरकार के सभी विभागों में मुसलमान कर्मचारियों के बारे में खुफिया तौर पर रिपोर्ट मांगी गई थी. हालांकि घोषित तौर पर ये सिर्फ पाकिस्तान से सहानुभूति रखने वाले संदिग्ध मुस्लिमों के लिए थी. लेकिन विभागाध्यक्षों ने इसे निजी दुश्मनी निकालने का माध्यम बना लिया. मुसलमानों के बीच सरकार के इस कदम ने व्यापक अविश्वास का माहौल बना दिया था.

Not In My Name

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में विस्तार से इसका उल्लेख किया है. गुहा के मुताबिक, सरदार पटेल ने अपने विभाग के इस पत्र से पहले जनवरी, 1948 में लखनऊ में दिए एक भाषण में इशारा किया था कि पाकिस्तान न जाने वाले मुसलमानों को भारत के प्रति स्वामीभक्ति का ‘व्यावहारिक सबूत’ भी देना चाहिए.

सरकार के इन कदमों से अविश्वास का माहौल बढ़ता ही जा रहा था. बाद में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र में लिखा कि अगर पाकिस्तान में हिंदुओं को प्रताड़ित किया जा रहा है तो उसके आधार पर वे भारतीय मुसलमानों से बदला लेने या उन्हे दंडित करने की आलोचना करते हैं.

नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को भी पत्रों की श्रृंखला में लिखा कि हमें अपने अल्पसंख्यकों के साथ हर हाल में सभ्य तरीके से पेश आना है. उन्हे पूरी सुरक्षा देनी है और एक लोकतांत्रिक देश के नागरिकों को मिलने वाले सभी अधिकार भी समानता के साथ सौंपने हैं. नेहरू ने ऐसा न हो पाने पर चेतावनी देते हुए लिखा था कि आने वाले वक्त में भेदभाव हमारी पूरी राजनीतिक व्यवस्था को खत्म कर देगा.

मुस्लिम कार्मिकों की गिनती, सच्चर कमेटी का हवाला

मुसलमान कर्मचारियों की अलग से गिनती करने का ये कदम 70 साल बाद अब फिर से चर्चा में आया है. वो भी ऐसे वक्त में जब एक बार फिर देश में अविश्वास के माहौल की चिंताएं हैं. बीजेपी सरकारों पर पहले से ही हिंदू ध्रुवीकरण और मुसलमानों से भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं. अब इस कदम ने तरह-तरह की नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है.

इस सबके बावजूद चिकित्सा विभाग, राजस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ बी एल सैनी इसे रूटीन कार्यवाही बताते हैं. उनका कहना है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. सच्चर कमेटी पहले भी हर साल ऐसी जानकारी मांगती रही है. सैनी ने इसे मुस्लिम कल्याण के निमित्त ही बताया है.

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सच्चर कमेटी का गठन 2005 में तत्कालीन यूपीए-1 सरकार ने किया था. इसका उद्देश्य भारतीय मुस्लिमों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति की रिपोर्ट करना था. तब बीजेपी ने ही मुखर विरोध करते हुए इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार दिया था. लेकिन अब बीजेपी सरकार ही सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू करने के नाम पर मुसलमान कर्मचारियों की गिनती करवा रही है.

ये समझ से परे है कि केवल कर्मचारियों की गिनती से मुसलमानों की भलाई कैसे हो सकेगी. ये भी स्पष्ट नहीं है कि सच्चर कमेटी की कौन-कौन सी सिफारिशों पर वर्तमान सरकार काम कर रही है. कमेटी ने सरकार में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ाने की सिफारिश भी की थी. तो क्या 2019 चुनाव से पहले मोदी सरकार ऐसा कदम भी उठा सकती है.

मुस्लिमों पर मोदीनीति में स्पष्टता नहीं!

मुस्लिम समुदाय के प्रति वर्तमान सरकार की नीति में स्पष्टता का अभाव और भारी उतार-चढ़ाव दिखता है. प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम टोपी पहनने से सार्वजनिक तौर पर इनकार कर दिया था. लेकिन हाल ही में गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने अजान की आवाज पर अपना भाषण रोक दिया. हालांकि पहले बंगाल की मुख्यमंत्री के ऐसा ही करने पर बीजेपी ने उन्हे आड़े हाथों लिया था.

हो सकता है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं और उदार मुस्लिम वर्गों के वोट मिलने के बाद मोदी की नीति में लचीलापन आया हो. वैसे भी, मोदी कट्टर हिंदू तत्वों और तथाकथित गौरक्षकों को एक से ज्यादा बार लताड़ चुके हैं. हो सकता है कि नौकरीपेशा मुस्लिम वर्गों से सच्चर कमेटी के बहाने नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की जा रही हो. आखिर, बीजेपी ने ओबीसी में आरक्षण के फायदे से महरूम रहे वर्गों और दलितों में महादलितों को अपने पाले में लाने में कुछ इसी तरह से सफलता हासिल की है.

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होने को कुछ भी हो सकता है. लेकिन सरकार के रवैए ने ही संशय पैदा किया है. अगर मुस्लिम कर्मचारियों की गिनती वाकई उनकी भलाई के लिए है तो पहले इसे छिपाया क्यों गया. बाद में खुलासा होने पर ही विभाग की वेबसाइट पर इसे अपलोड किया गया. सरकारी मंशा पर अल्पसंख्यकों को भी शायद इसीलिए संदेह है. इसे अल्पसंख्यक अधिकारी कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष हारून खान के इस बयान से समझा जा सकता है कि गिनती के बजाय मुसलमानों को नौकरियां दी जानी चाहिए.

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