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चर्च में भेदभाव: क्रिश्चियन हो तो क्या हुआ, हो तो दलित?

दलित क्रिश्चियन चर्च के कार्यकलापों में, छुआछूत और भेदभाव जैसी बीमारियां भुगतने पर मजबूर हैं

Updated On: Dec 20, 2016 09:02 AM IST

Nazim Naqvi

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चर्च में भेदभाव: क्रिश्चियन हो तो क्या हुआ, हो तो दलित?

यह एक एतिहासिक घटना है. इंडियन कैथलिक चर्च ने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना है कि दलित क्रिश्चियन चर्च के कार्यकलापों में छुआछूत और भेद-भाव जैसी बीमारियां भुगतने पर मजबूर हैं और नेतृत्व के ऊंचे पदों पर उनकी सहभागिता सिरे से गायब है.

सोमवार, 12 दिसंबर को आयोजित कैथलिक बिशप कांफ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के नीति-पत्र में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है.

यह समिति क्रिश्चियन समाज के पिछड़ा-वर्गों के प्रति भेदभाव को समाप्त करने और उन्हें इससे मुक्त कराने का काम करती है.

ये प्रश्न अनायास ही उठता है कि इस सच्चाई को ‘अब’ स्वीकार करने के पीछे की सच्चाई क्या है?

‘भारतीय कैथलिक चर्च में दलितों को सशक्त बनाने हेतु नीति’ शीर्षक से एक रिपोर्ट तैयार की गई है.

इस रिपोर्ट में चर्च के सभी 171 धर्म-प्रदेशों से कहा गया है कि वे साल भर के भीतर ऐसी छोटी-बड़ी योजनाएं बनाएं, जिससे ‘दलित-क्रिश्चियनों’ के साथ हो रही इस छुआछूत को खत्म किया जा सके.

अगर यह जाति-आधारित दोहरा व्यवहार हममें मौजूद है तो इसे तत्काल प्रभाव से समाप्त होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो चर्च के संबंधित अधिकारी कठोर कदम उठाने पर मजबूर होंगे'. सवाल और मजबूत होता है कि अब इतनी कठोरता क्यों?

क्योंकि यह भेद-भाव तो चर्च के काम-काज में हमेशा से मौजूद है और आम दलित-क्रिश्चियन ने जब भी इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उसे कठोरता से कुचला गया है.

आज, उन्हें कुचलने की बात हो रही है जो अब तक कुचलते आये हैं. ‘कैथलिक बिशप’ कांफ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष, बेसलिओस कार्डिनल क्लिमेस कैथालिकोस इसे दलित क्रिश्चियन के हक में एक क्रांतिकारी कदम मानते हैं.

'क्रिश्चियन भावनाओं के अनुसार यह भेदभाव जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है. हम इसे मान रहे हैं, और जो नीति हम बना रहे है, वह चर्च द्वारा हो रहे इस भेद-भाव की समाप्ति के प्रति एक अहम कदम है, एक संदेश है और आत्मविश्लेषण है'.

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में रह रहे 19 लाख कैथलिक-क्रिश्चियन में लगभग 12 लाख दलित-क्रिश्चियन हैं. लेकिन चर्च के उच्च-कार्यकलापों में उनका नेतृत्व शून्य है.

पांच हजार बिशप यानी कैथोलिक धर्मगुरुओं में केवल 12 बिशप दलित हैं. यह इस बात का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि कैथोलिक क्रिश्चियनों में दलितों का क्या हाल है.

भारत में जब कभी धर्मांतरण की चर्चा होती है और विशेषकर ईसाइयत और दलितों के संदर्भ में तो सबसे पहले एक प्रश्न उभरता है. दलित क्यों इसाई धर्म स्वीकार करते हैं?

जाहिर है इसका आसान जवाब यही सूझता है कि हिंदू-जाति व्यवस्था से छुटकारा पाने के लिए.

पर यह पूरा सच नहीं है. इसका सच जानने के लिए आपको बेंगलुरु से 60 किलोमीटर दूर स्थित ‘हरोबेले’ तक जाना पड़ेगा. यहां सैकड़ों साल पहले इसाईयत ने अपने कदम रक्खे.

कर्नाटक का सबसे पुराना ईसाई मिशन यहीं है जो 1675 में स्थापित हुआ. एक समझ बनाने के लिए आप कह सकते हैं कि हजार परिवारों में से 980 परिवार यहां, कैथलिक हैं.

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इन परिवारों में, हिंदू उच्च जाति से धर्मांतरित होकर इसाई बने हुए परिवार भी शामिल हैं. इन्होने धर्म तो बदल लिया है लेकिन जाति के बंधन से छूट नहीं पाए हैं.

यह स्थिति केवल इसाईयों में ही नहीं है, इस्लाम में भी, कहते हैं, जात-पात का चक्कर नहीं है, फिर भी जब यह धर्म भारत में प्रवेश करता है तो जाति-चक्र से अछूता नहीं रह पता है.

यहां मुसलमानों में जुलाहा, बहना, धुनिया, नाई आदि जातियां उसी जाति-वर्ग का दूसरा रूप हैं. हमने तो अपने गावों में मुसलमान-मेहतर भी देखे हैं.

अशराफ (यानी उच्च श्रेणी के मुसलमान) इन नीची जातियों से रिश्ता नहीं बनाते हैं. यानी मुसलमान तो आप हो गए हैं लेकिन किस जाति से आकर मुसलमान या ईसाई हुए हैं यह धर्मांतरण से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

सोचिये इकबाल के एक बहुत मशहूर शेर, इन दलितों के साथ कितना भद्दा मजाक है- 'एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद-ओ-अयाज़/ फिर कोई बाँदा रहा और ना कोई बंदा-नवाज़.'

ईसाइयत में भी जो नायर, रामास्वामी जैसे उच्च-जाति के ब्रह्मिन आये, वह निचली जाति के ईसाई बने दलितों को बर्दाश्त नहीं कर पाए.

और यह छुआछूत या भेद-भाव जो आज कैथलिक-चर्च में चिंता का विषय है वह सदियों से चला आ रहा है.

मुझे अपने विद्यार्थी जीवन के अध्यापक की बात हमेशा याद रहेगी जो समाज-शास्त्र पढ़ाते हुए इस बात पर विस्तार से चर्चा करना कभी नहीं भूलते थे कि इस देश में जाति-व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं जिन्हें शायद कभी खत्म नहीं किया जा सके.

आज यदि ‘कैथलिक बिशप’ कांफ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष, बेसलिओस कार्डिनल क्लिमेस कैथालिकोस आत्मविश्लेषण कर रहे हैं तो उनका यह कदम स्वागत योग्य है.

सदियों बाद ही सच सामने आया, आया तो. वसीम बरेलवी के इस शेर के साथ आइये अपनी बात को ख़त्म करते हैं- सच घटे या बढ़े तो सच न रहे / झूठ की कोई इंतहा ही नहीं.

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