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ऐसा भी एक मुसलमान: जिसने मंदिर पर लुटा दी दौलत, ठुकरा दिया पंडित नेहरू का ‘तोहफा’

भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद तमाम लोग उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के उस वक्त वीरान पड़े कटरा मानराय इलाके में खुले आसमान तले तंबू लगाकर बाल-बच्चों के साथ आकर रहने लगे

Updated On: Feb 24, 2018 09:26 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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ऐसा भी एक मुसलमान: जिसने मंदिर पर लुटा दी दौलत, ठुकरा दिया पंडित नेहरू का ‘तोहफा’

चुन्ना मियां. वही चुन्ना मियां जिन्होंने जीवन भर की पूंजी लुटा दी मंदिर-गुरुद्वारे और स्कूल कॉलेज बनवाने में. इंसानियत की हिफाजत के लिए. चुन्ना मियां ने मंदिर बनवाने में तो सिर पर ईंट-रेता-बजरी ढोकर श्रमदान (कार-सेवा) भी किया. इससे भी बड़ी बात यह है कि उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जो बेशकीमती तोहफा इस जिंदादिल मुसलमान को भेंट करने की पेशकश की थी. उन्होंने उसे भी लेना मुनासिब नहीं समझा. हम आज झांकने की कोशिश कर रहे हैं उन्हीं मरहूम फज़ल-उर-रहमान साहब के अतीत में..जिन्हें लाड से जमाना ‘चुन्ना मियां’ के नाम से जानता-पहचानता है.

‘मियां के मंदिर’ का दिल-ओ-दिमाग झकझोरने वाला सच

बात है सन् 1957-58 की. भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद तमाम लोग उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के उस वक्त वीरान पड़े कटरा मानराय इलाके में खुले आसमान तले तंबू लगाकर बाल-बच्चों के साथ आकर रहने लगे. यह जगह चुन्ना मियां की थी. कुछ समय बाद पाकिस्तान से आए लोगों ने अस्थाई रूप से खाली पड़ी जमीन पर पूजा-पाठ शुरू कर दिया. चुन्ना मियां का माथा तब ठनका जब निर्वासित होकर पहुंचे अजनबियों ने बिना उनकी इजाजत उन्हीं की खाली पड़ी जमीन पर मंदिर बनाने की शुरुआत कर दी. बात नाक की थी. सो मामले को चुन्ना मियां अदालत ले गए.

वो सतसंग जिसने बदला मुसलमान का मन और मंशा

मुकदमेबाजी चल ही रही थी. एक दिन हरिद्वार से हरमिलापी महाराज वहां सतसंग के लिए आए. सतसंग चुन्ना मियां ने क्या सुना...उनका हृदय परिवर्तन कुछ इस हद तलक हो गया कि उन्होंने मंदिर की विवादित जमीन का मामला कोर्ट से वापस ले लिया. इतना ही नहीं चुन्ना मियां की जमीन पर जो लोग जबरिया कब्जा करके मंदिर बनाने की कोशिश में जुटे थे, उन्हें मुकदमेबाजी में खर्च हुए रुपए भी चुन्ना मियां ने लौटाए. चुन्ना मियां ने मंदिर के लिए जमीन तो दी ही मुफ्त में. साथ ही मंदिर निर्माण में उस जमाने में सबसे ज्यादा चंदा (एक लाख दस हजार एक रुपए) भी दिया. इसका उल्लेख मंदिर में मौजूद दानदाता सूची में दर्ज है. जिसमें सबसे ऊपर चचा चुन्ना मियां का ही नाम दर्ज है.

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खुद ही बनवाई मंदिर समिति और किया जी भर के खर्च

इतना ही नहीं चुन्ना मियां ने बाकायदा खुद ही भागदौड़ करके सनातन धर्म सभा पंजीकृत करवाई. इस पंजीकरण में हुए खर्चे में से 20 हजार 700 रुपए की रकम खुद उन्होंने अपनी जेब से भरी थी. साथ ही श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के निर्माण में मुसलमान होकर भी किसी हिंदू से ज्यादा कार-सेवा (श्रमदान रेता-बजरी-ईंटों की परातें ढोईं) भी चुन्ना मियां ने ही की.

मंदिर की मूर्तियां लेने खुद गए थे जयपुर चुन्ना मियां

बकौल चुन्ना मियां के पोते शमशुल-उर-रहमान और नजमुल-उर-रहमान- ‘दादा ही मंदिर के लिए श्री लक्ष्मी नारायण की मूर्तियां लेने खुद जयपुर गए थे. उन्हें लगता था कि इस मंदिर के लिए उनसे बेहतर और खूबसूरत असली संगमरमर की मूर्तियां कोई दूसरा पहचान कर नहीं ला पाएगा.’शायद चुन्ना मियां की हदों से पार मंदिर बनवाने की ललक का ही नतीजा है कि आज बरेली शहर में इस मंदिर को ‘लक्ष्मी नारायण मंदिर’ के नाम से बहुत कम लोग जानते हैं. मंदिर को ‘चुन्ना मियां मंदिर’ के नाम से शहर में रिक्शे वाले से लेकर बच्चा-बच्चा जानता है.

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इकलौता मंदिर जिसमें मौजूद है अशोक की लाट

अमूमन ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिले कि किसी मंदिर के बाहर अशोक की लाट स्थापित की गई हो. चुन्ना मियां मंदिर परिसर में (प्रवेश द्वार पर) अशोक की चमचमाती हुई लाट स्थापित है. बकौल चुन्ना मियां के पोते शमशुल-उर-रहमान – ‘चूंकि मंदिर का उद्घाटन उस जमाने में 16 मई 1960 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से कराया गया था. शायद इसीलिए महामहिम की शान में मंदिर में अशोक की लाट लगवाई गई हो.’

कृष्ण जन्माष्टमी को जन्मे मुसलमान को मुफलिसी ने जीना सिखा दिया

चुन्ना मियां का जन्म 1889 में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन बरेली में ही हुआ. 7-8 साल के थे तभी चुन्ना मियां के वालिद का इंतकाल हो गया. कुछ साल बाद मां का साया भी सिर से उठ गया. इसके बाद से ही चुन्ना मियां को मुफलिसी ने घेर लिया. रिश्तेदारों के आसरे कभी इस देहरी कभी उस देहरी दो जून की रोटी के जुगाड़ में इधर-उधर भटकने लगे.

सेठ के सहयोग ने ‘कंगाल’ को ‘धन्नासेठ’ बना दिया

यूं ही भटकते-भटकते एक दिन बरेली शहर में उस वक्त के सेठ लाला गुजराती लाल उर्फ दद्दा जी से मुलाकात हो गई. कुछ दिन दद्दा जी की नौकरी की. बाद में दद्दा जी ने 2 रुपए पांच आने पैसे उधार दिए. इस हिदायत के साथ कि जाओ नौकरी करने के बजाए कुछ अपना बिजनेस करो. सेठ से मिले उधार के 2 रुपए 5 आने से चुन्ना मियां ने एक टोकरी, रस्सी खरीदी. उसे गले में लटकाकर गली-मोहल्ले में कंघा, तेल, बीड़ी-पान-सिगरेट बेचने लगे. इससे हुई कमाई से चुन्ना मियां दद्दा की उधारी जब निपटाने गए तो, वे चुन्ना मियां से बोले...हमारी उधारी मत उतारो. इस कमाई को धंधे को आगे बढ़ाने में लगाओ.

दौलत के लिए फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा

दद्दा की उदारता और उनकी जिंदादिली मासूम और बेसहारा चुन्ना मियां के लिए बड़े काम की साबित हुई. उस पैसे से चुन्ना मियां ने उस जमाने में देश की नंबर वन बीड़ी कंपनी की बरेली में एजेंसी ले ली. वो भी उधारी में नहीं. बीड़ी एजेंसी नकद लेकर उन्होंने बरेली शहर में साबित कर दिया कि शहर को आने वाले वक्त का कोई सेठ मिलने जा रहा है. इसके बाद चुन्ना मियां ने दौलत के लिए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

फ़ज़ल-उर-रहमान से यूं बन गए चचा ‘चुन्ना मियां’

दरअसल लाला गुजराती लाल को फ़ज़ल-उर-रहमान नाम बोलने में काफी दिक्कत पेश आती थी. वे अक्सर चुन्ना मियां को कभी फ़ज़ल कभी रहमान कहकर बुलाते थे. एक दिन उनके मुंह से छोटा बच्चा देखकर चुन्ना निकल गया. और उसी दिन से बरेली शहर का यह गांधी फ़ज़ल-उर-रहमान के बजाए चुन्ना मियां के नाम से मशहूर हो गया.

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यादें जो होती जा रही हैं जमींदोज

बरेली शहर की अधिकांश सड़कों, अस्पताल स्कूल-कॉलेज पर जिधर भी नजर दौड़े, वहां चुन्ना मियां के नाम के शिलालेख अक्सर दिखाई पड़ जाते हैं. यह अलग बात है कि वक्त के साथ चुन्ना मियां के नाम के यह शिलालेख हिफाजतमंदों की ही लापरवाही के चलते या तो धूमिल पड़ गए हैं या फिर देखरेख के अभाव में जमींदोज हो चुके हैं. या फिर समय के साथ घिसकर दीवारों में ही समाते जा रहे हैं. इसका उदाहरण है शहर के सबसे बड़े और पहले महिला अस्पताल क्लेरा स्वेन मिशन हॉस्पिटल की वो सड़क जिसे चुन्ना मियां ने ही बनवाया था. इसी सड़क के पास लगा है वो शिलापट्ट जिस पर सड़क बनवाने वाले के रूप में चुन्ना मियां का नाम दर्ज है.

मंदिर हो या गुरुद्वारा हर जगह चुन्ना मियां

बरेली शहर का फ़ज़ल-उर-रहमान (एफआर) इस्लामिया इंटर कॉलेज, महात्मा ज्योतिबा फूले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के अधीन संचालित बरेली कॉलेज का ‘कॉमर्स ब्लॉक’, गली मनिहारन का गुरुद्वारा या फिर कुहाड़ापीर (नैनीताल रोड) का गुरुद्वारा, बरेली सदर बाजार में मौजूद धोपेश्वर नाथ मंदिर (धोपा शिव मंदिर). ऐसी कोई पाक जमीन या धर्म स्थल नहीं है, जिसमें इस रहम दिल मुसलमान चुन्ना मियां का नाम या अंश मौजूद न हो.

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तालीम के वास्ते घर-घर घूमकर की थीं जब मिन्नतें

बकौल चुन्ना मियां के पोते शमशुल-उर-रहमान और नजमुल-उर-रहमान- ‘दादा जी ने बरेली में लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्थापना के बाद अपने खर्चे पर चंदौसी (मुरादाबाद) में हाईस्कूल तक का विद्यालय बनवाया. बड़ी मुश्किल यह आई कि, मां-बाप बच्चों को उस विद्यालय में पढ़ने भेजने को राजी नहीं थे. कई महीने-साल तक स्कूल खाली पड़ा रहा. आखिरकार चुन्ना मियां इलाके के गांवो में घर-घर गए. मां-बाप से मिन्नतें कीं. उनके हाथ-पांव जोड़े कि वे अपने बच्चों को तालीम के वास्ते स्कूल में पढ़ने भेजें.’ चुन्ना मियां के नाम से संचालित हो रहा कल का हाईस्कूल अब साइंस स्ट्रीम में फ़ज़ल-उर-रहमान इंटर कॉलेज बन चुका है.

धरोहर खोजने में जुटा एक हिंदू शिक्षाविद्

हमेशा धर्म की ओछी राजनीति से परे इंसानियत की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर चलने के धुनी चुन्ना मियां के सुनहरे इतिहास को संजोकर रखने की भले ही सरकारी एजेंसियों को कोई परवाह न हो. लेकिन बरेली के शिक्षाविद प्रोफेसर (डॉ.) अभय कुमार सिंह चुन्ना मियां की धरोहर को खोजकर संजोने में जुटे हैं. यह अलग बात है कि महात्मा ज्योतिबा फूले रुहेलखंड विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष और डीन प्रोफेसर सिंह को अभी इसमें कोई विशेष सफलता हाथ नहीं लगी है.

बकौल डॉ. अभय कुमार सिंह- ‘मैंने चुन्ना मियां के परिजनों से भी बातचीत की है. उनसे जुड़े दस्तावेज मसलन चुन्ना मियां के हस्ताक्षर, उनकी आवाज, चुन्ना मियां की वो छड़ी जिसे वे हर वक्त साथ रखते थे, उनकी हैंड राइटिंग के नमूने, वे डायरियां जो चुन्ना मियां रोजमर्रा की जिंदगी में लिखते रहते हों, वो वीडियो/ तस्वीरें जिसमें भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ चुन्ना मियां मौजूद रहे हों, चुन्ना मियां लक्ष्मी नारायण मंदिर में सिर पर ईंट-मिट्टी ढोकर कार सेवा करते के फोटो इत्यादि तलाशने को कहा है. मगर अभी एक दो दुर्लभ फोटो के अलावा और कुछ हासिल नहीं हो सका है.’

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चुन्ना मियां के मुख से आई ‘ऊं’ की गूंज आज भी हिंदुओं के कानों में है मौजूद

‘मेरी उम्र उस वक्त ब-मुश्किल यही कोई तीन-चार साल रही होगी. कक्षा-नर्सरी या पहली का विद्यार्थी रहा होउंगा. मां के साथ घर की बैठक में बैठा था. उसी वक्त पिता के साथ एक बुजुर्ग सफेद कुरता-पायजामा और काली बंडी (सदरी जैकेट) पहने हुए कमर झुकाए वहां आए. उन्हें देखकर मैं और मां खड़े हो गए. छड़ी टिकाकर वह बुजुर्ग बैठक में बिछे तख्त पर बैठ गए. उन्होंने हॉल की छत की ओर देखा और जोर से बोले 'ऊं'. उनके मुख से निकला ऊं इस कदर लंबा और तेज आवाज वाला था कि, मेरे जेहन में आज भी उस ‘ऊँ’ की वो आवाज गूंज जाती है. बाद में पता चला कि, ऊं की कभी न भुलाने वाली वो आवाज निकालने वाले कोई हिंदू पंडित या संस्कृत के विद्वान नहीं, पांच वक्त का नमाजी और एक कट्टर मुसलमान फ़ज़ल-उर-रहमान मतलब चचा चुन्ना मियां थे.’

गरीबी से सेठ बने थे इसलिए सादगी नहीं छोड़ी

दादा की खूबियां गिनाते हुए चुन्ना मियां के पोते शमशुल-उर-रहमान बताते हैं , ' मैं यही कोई 5वीं जमात में पढ़ रहा था. एक बार दादा चुन्ना मियां ट्रेन से लेकर चंदौसी गए. ट्रेन पैसेंजर थी. मेरा आधा टिकट 65 पैसे का लगा. जबकि मेरे पिता हमेशा मुझे ट्रेन के प्रथम दर्जे के टिकट पर ही यात्रा कराते थे. दौलतमंद होने के बाद भी दादा चुन्ना मियां ने दौलत-शोहरत को कभी खुद पर सवार नहीं होने दिया. रास्ते में होटल वगैरह पर कुछ नहीं खाते थे. घर से भुने चने की पोटली लेकर चलते. वही खाकर पानी पी लेते.'

दादा ने बनवाया मंदिर, पोते जाते हैं वैष्णो देवी

जिंदगी के अंतिम दिनों में चुन्ना मियां के काफी करीब रहे उनके पोते शमशुल के मुताबिक, दादा ने लक्ष्मी नारायण मंदिर बनवाया. शायद वहीं से हम लोगों के भी मन बदले. मैं वैष्णो देवी की यात्रा भी कर चुका हूं. जब भी किसी मंदिर-गुरुद्वारे के सामने से गुजरता हूं, तो कार में बज रहे स्टीरियो को बंद करने के लिए हाथ खुद-ब-खुद ही उठ जाते हैं.

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जब पंडित नेहरू का ‘तोहफा’ भी कबूल नहीं किया

मझले बेटे अतीकुर्रहमान के पुत्र शमशुल और नजमुल-उर-रहमान (चुन्ना मियां के पोते) के मुताबिक, लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्थापना मुसलमान ने की है. यह सुनकर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बेइंतहा खुश हुए. बरेली दौरे पर नेहरू जी ने चुन्ना मियां से कहा कि हमारी पार्टी (कांग्रेस) आपको राज्यसभा का मेंबर बना रही है. इतना सुनते ही चुन्ना मियां ने हाथ जोड़ लिए. नेहरू जी से बोले...मोहतरम बेवजह की जलालत में न उलझाएं. गुरबत की जिंदगी जीने वाले का भला पॉलिटिक्स और राज्यसभा से क्या वास्ता? इस झंझट के लिए आप उत्तर प्रदेश से किसी और शिकार की गर्दन तलाश कर लीजिए तो मेहरबानी होगी. चुन्ना मियां का यह जवाब सुनकर नेहरू जी तो हंस ही पड़े पास खड़े बाकी लोग भी इतनी खरी-खरी सुनकर हंसी नहीं रोक पाए.

देहरी आए मेहमान की इज्जत मतलब खुदा की इबादत

बकौल चुन्ना मियां की पौत्रवधु तलत परवीन शम्सी  (चुन्ना मियाँ के मझले बेटे मरहूम अतीकुर-उर-रहमान के बेटे की पत्नी),- ‘घर के दरवाजे पर दस्तक चाहे छोटे ने दी हो या फिर बड़े ने. दिन हो या रात..दिसंबर की ठंड हो या फिर जून की तपती दुपहरी...घर की कुंडी हमेशा उन्होंने ही खोलने की कोशिश की. उनके मुंह से सबके लिए ताउम्र ‘कौन साहब...आया हुजुर..जी जनाब आया’ ही निकला.

मौत ईद के दो दिन बाद होगी जानते थे चुन्ना मियां

ऐसे जिंदादिल चचा चुन्ना मियां को दुनिया से अपनी रुखसती का अहसास क्या पहले ही हो चुका था? शायद इसीलिए उन्होंने अस्पताल में भर्ती रहते हुए घर-कुनबे वालों से कह दिया था- ‘मैं ईद के दो दिन बाद परदा (मर जाऊंगा) कर जाऊंगा’. और वही हुआ. गंगा-जमुनी तहजीब का यह पहरेदार 23 दिसंबर 1968 को अलसुबह ब्रह्ममुहूर्त में (तड़के) करीब तीन से चार बजे के बीच दुनिया छोड़ गया.

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यादें जो हो रही हैं नेस्तनाबूद

जकाती मुहल्ला गली नवाबान बरेली में चुन्ना मियां का पुश्तैनी मकान अब भीड़ भरे मार्केट में तब्दील हो चुका है. इस मकान की कुछ जगह चुन्ना मियां के बेटों ने वफ्फ बोर्ड को दान कर दी थी.

सुलगते हैं जेहन में तमाम सवाल

आज अगर जेहन में एक सवाल बार-बार कौंधता है तो वह बस यही है कि गरीब से अमीर बने उन चुन्ना मियां की, जिसने अपनी तमाम दौलत-जवानी कौम से ऊपर जाकर इंसानियत के रास्ते पर चलते हुए जमाने पर लुटा दी, की यादें आज आखिर किसी ने भी संजो कर क्यों नहीं रखी हैं? वह चाहे परिवार हो या फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग हो. गंगा-जमुनी तहजीब के इस पहरेदार की आज शायद ही किसी के पास यादें मौजूद हों. वो चाहे सरकार हो या फिर कुनबे वाले. आखिर यह बेरुखी उस चुन्ना मियां के प्रति क्यों जिसने जिंदगी की हर खुशी कुर्बान कर दी इस रंगीन दुनिया की खुशी के लिए.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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