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Christmas 2018: सांता जैसा कोई नहीं लेकिन 8 साल से बच्चे जान जाते हैं सांता है ही नहीं

ब्रिटेन की ‘यूनिवर्सिटी आफ एक्सेटर’ में मनोविज्ञान के प्रोफेसर क्रिस बोयल ने विश्व में लोगों से पूछा कि वह उन्हें बताए कि उन्होंने सांता के बारे में अपना मन कैसे बदला

Updated On: Dec 16, 2018 06:16 PM IST

FP Staff

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Christmas 2018: सांता जैसा कोई नहीं लेकिन 8 साल से बच्चे जान जाते हैं सांता है ही नहीं

कई साल तक हमें इस बात का अहसास नहीं था कि क्रिसमस हिंदुओं का पर्व नहीं है. केक, पेस्ट्री, क्रिसमस ट्री, कैंडल, लाइट्स और फिर सबसे खास 'सांता'. क्रिसमस सभी धर्म के लोगों के लिए खास है क्योंकि इसमें सांता हैं. मोटा, बूढ़ा, सफेद दाढ़ियों वाला सांता, जो कभी भी बच्चे को उसका धर्म देखकर गिफ्ट नहीं बांटता. वो हमें हमारे बूढ़े बाबा की याद दिलाता है, जो रोज शाम घर के बच्चों के लिए बाजार से कुछ ना कुछ जरूर लेकर आते  थे. जिनके कुर्ते के पॉकेट में एक टॉफी जरूर रखी होती थी.

खैर, मुझे विश्वास है कि जब आप छोटे होंगे तो आपको भी क्रिसमस वाली रात ये किस्सा जरूर सुनाया गया होगा. 'क्रिसमस ट्री को अच्छे से सजा लो, अपने मोजे को साफ कर के उसके बगल में रख दो, विश मांग लो कि सांता से क्या चाहिए. रात में तुम्हारे सो जाने के बाद सांता अपना झोला लेकर आएगा और मोजे में गिफ्ट रखकर चला जाएगा.'

सुबह जब नींद खुलती तो ये सारी कहानी सच हो जाती. हमने जो कुछ भी सांता से मांगा था, वह अगली सुबह हमारी आंखों के सामने होता था, लेकिन असली सांता को देखने की कसक रह जाती.

सांता तो है ही नहीं

जब हम थोड़े बड़े हुए तो सांता को देखने की ललक ने इस सच्चाई से हमें वाकिफ कराया कि ओह! सांता जैसा तो कुछ है ही नहीं. गिफ्ट रखने वाले तो हमारे ही मां-बाप थे. एक सर्वे के अनुसार ज्यादातर बच्चों को 8 साल की उम्र तक इस सच का पता चल जाता है और पूरी दुनिया में बच्चे आठ वर्ष की आयु के आसपास सांता क्लाज में विश्वास करना बंद कर देते हैं. यह बात एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में पता चली है जिसमें यह बात भी सामने आई कि करीब 34 प्रतिशत वयस्क चाहते हैं कि वे अभी भी ‘फादर क्रिसमस’ में विश्वास करें.

इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि सांता क्लाज में कई बच्चे विश्वास नहीं करते लेकिन कई ऐसे युवा भी हैं जो यह दिखावा करते हैं कि वे सांता क्लाज में विश्वास करते हैं जबकि उन्हें पता है कि उसका कोई अस्तित्व नहीं है.

दिल है कि मानता नहीं

ब्रिटेन की ‘यूनिवर्सिटी आफ एक्सेटर’ में मनोविज्ञान के प्रोफेसर क्रिस बोयल ने विश्व में लोगों से पूछा कि वह उन्हें बताए कि उन्होंने सांता के बारे में अपना मन कैसे बदला है. और यह पता चलने पर क्या उनका अपने अभिभावकों पर भरोसा कम हुआ कि सांता जैसे दिखते हैं वैसे हैं नहीं .

बोयल को ‘इ एक्सेटर सांता सर्वे’ पर पूरे विश्व से 1200 जवाब मिले. यह अपने तरह का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय अध्ययन था. जवाब देने वालों में अधिकतर वयस्क थे. इस अध्ययन से यह पता चलता है कि 34 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि वे अभी भी सांता क्लाज में विश्वास करें जबकि 50 प्रतिशत इस बात को लेकर काफी संतुष्ट हैं कि उनका अब इसमें विश्वास नहीं है. अध्ययन के मुताबिक आठ वर्ष की औसत आयु में बच्चे सांता क्लाज में विश्वास करना बंद कर देते हैं.

(भाषा से इनपुट)

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