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गोविंदाचार्य की स्मृति से: चो रामास्वामी के लिए हमेशा ‘नेशन फर्स्ट’ रहा

चो रामास्वामी का विचारों में किसी से विरोध हो लेकिन उनका व्यवहार मधुर ही रहता था.

Updated On: Dec 08, 2016 08:34 AM IST

KN Govindacharya

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गोविंदाचार्य की स्मृति से: चो रामास्वामी के लिए हमेशा ‘नेशन फर्स्ट’ रहा

7 दिसंबर 1992 की बात है. चो रामास्वामी ने तुगलक का अंक निकाला था जिसका पहला पन्ना पूरा काला था. मैं गुरुमूर्ति के घर पर था. तभी उनका कॉल आया. उन्होंने कहा कि यह एसओएस कॉल है, बहुत इमरजेंसी है. जल्दी चले आइए. हमने शर्त रखी कि आने पर उन्हें कुछ खिलाना होगा.

जब हम उनके दफ्तर पहुंचे तो चो की एक महिला से उग्र बहस चल रही थी. राधाराजन नाम की वह महिला बड़ी पढ़ी-लिखी थीं. उनकी बहस चल रही थी कि आखिरी चो ने पहला पन्ना काला क्यों रखा. चो ने उनसे कहा, 'आपको समझाना मेरे बस में नहीं है, इसलिए मैंने इनको बुलाया है.' राधाराजनजी से हमारी राष्ट्रीय पहचान यानी नेशनल आइडेंटिटी को लेकर बहस चली. 6 दिसंबर 1992 की घटना के बारे में हमने यह रुख रखा था कि न तो इसकी भर्त्सना की जाएगी और न ही इसकी प्रशंसा की जाएगी बल्कि केवल इससे सबक लिए जाएंगे. चो ने आखिर समझा-बुझाकर उन्हें शांत कराया. उन्होंने हंसते हुए कहा कि लोग मुझे भी आरएसएस का वर्कर कहते हैं तो लेकिन आज मैंने आइडियोलॉजी के मुद्दे पर एक और वर्कर की पहचान कर ली.

जैसा तय हुआ था कि उन्होंने हमें डोसा खिलाया.

चो के लिए 'नेशन फर्स्ट' का सिद्धांत सबसे ऊपर था. उन्होंने अपने काम को सबसे ऊपर रखा. वह खुले दिमाग और आजाद ख्यालों वाले आदमी थे. उनकी सोच पर विचारधारा का परछाई नहीं थी. वह काम देश और समाज की भलाई के बारे में सोचकर ही करते थे.

मुझे याद है कि असम में नरसंहार के बाद जांच के लिए एक टीम भेजी जानी थी. हमने चो को इस टीम के लिए चुना था. उन्होंने मुझसे कहा, 'देखो मैं जाने को तैयार हूं लेकिन मुझे किसी होटेल के कमरे में ठहरा देना. मैं तुमलोगों की तरह किसी कार्यकर्ता के यहां नहीं रूक पाऊंगा.' उन्होंने कहा, 'मैं इसके लायक नहीं हूं.' वह चाहते थे कि वह स्वतंत्र रहकर चीजों को देखें और रिपोर्ट तैयार करें. उन्होंने बहुत अच्छी रिपोर्ट तैयार भी की.

चो लिट्टे की ओर से की जा रही हिंसा के पक्षधर नहीं थे. उन्होंने उनके खिलाफ काफी कुछ बोला और लिखा भी. इस दौरान उन्हें कई धमकियां भी मिलीं. चुप हो जाने को कहा गया. लेकिन वह डरे नहीं.

वह चंद्रशेखर से लेकर आडवाणी कई बड़े नेताओं के करीबी रहे. लेकिन उनकी बातों को भी उन्होंने हमेशा ऑब्जेटिक्टीव तरीके से ही परखा. साथ ही वह संबंधों का आदर भी करते थे. विचारों में भले ही किसी से उनका विरोध हो लेकिन उनका व्यवहार मधुर ही रहता था. वह संबंधों को मानवीय आधार पर ही रखते थे. उनके लिए कोई अछूत नहीं था.

चो बड़े हरफनमौला आदमी थे. वह लेखक भी थे. रंगमंच के कलाकार भी थे. संपादक और पत्रकार भी थे. मुझे शायद ही कोई और याद आता है जो इतने बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी रहा हो.

(पावस कुमार से बातचीत के आधार पर)

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