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अरुणाचल पर आंख गड़ाए है चीन, भारत को अमेरिका से उम्मीद!

ऐसे वक्त में जब चीन के साथ हमारे रिश्तों में मिठास की जगह कड़वाहट घुल रही है, मैकमास्टर से उम्मीद बांधना ठीक है

Sreemoy Talukdar Updated On: Apr 20, 2017 03:26 PM IST

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अरुणाचल पर आंख गड़ाए है चीन, भारत को अमेरिका से उम्मीद!

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन ने नए सिरे से उकसावे का रुख अख्तियार किया है. चीन के उकसावे से तुरंत पहले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के सबसे अहम अधिकारियों में शुमार हर्बर्ट रेमन्ड मैकमास्टर से भारत की बातचीत हुई थी.

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर आसीन मैकमास्टर से भारत की आमने-सामने की यह पहली बातचीत थी और चीन की उकसावा भरी कारस्तानी इस बातचीत के बाद और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठी है. अब उसके बारे में पहले से कहीं ज्यादा गहरी समझ बनाई जा सकती है.

नरेंद्र मोदी और उनके शीर्ष सहयोगियों के साथ कई चरणों की बातचीत पूरी करने के बाद जैसे ही मैकमास्टर अमेरिका के लिए रवाना हुए, मीडिया में खबरें आने लगीं कि चीन ने भारत के पूर्वोत्तर के सूबे अरुणाचल प्रदेश के 6 जगहों के नए नाम चीनी भाषा में मानकीकृत किए हैं और ऐसा करके वह अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जता रहा है.

जाहिर है, चीन की यह कोशिश अहमकाना, बेशर्म और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता के लिहाज से अशुभ है और मैकमास्टर की निश्चित ही इस पर नजर गई होगी.

अमेरिका, अफगान को तालिबानी लड़ाई में मदद करता रहेगा

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डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के सबसे अहम अधिकारियों में शुमार हर्बर्ट रेमन्ड मैकमास्टर. [तस्वीर: रॉयटर्स]
अफगानिस्तान, भारत और पाकिस्तान के अपने पहले दौरे से आए मैकमास्टर ने जितनी भी बातें कहीं, तकरीबन सभी भारत के हितों के अनुकूल हैं. अफगानी तालिबान के साथ राष्ट्रपति अशरफ गनी की लड़ाई चल रही है. अफगानी तालिबान ने पाकिस्तान की शह पर नए सिरे से सर उठाया है.

इस मसले पर मैकमास्टर ने जो कुछ कहा उससे यही संकेत मिलता है कि अमेरिका अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी का अफगानी तालिबान के साथ लड़ाई में साथ देता रहेगा.

अफगानी टीवी चैनल टोलोन्यूज पर भरपूर प्रचार के साथ प्रसारित हुए एक साक्षात्कार में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मैकमास्टर ने कहा कि ‘यह वक्त अबतक हासिल हुई उपलब्धियों को ठोस रूप देने और सुरक्षा पर कायम खतरे से जरूरी तौर पर निपटने का है.'

उन्होंने यह भी कहा कि ‘जंग के मैदान में तालिबान को हराना होगा’ और ‘वाशिंगटन अफगानिस्तान की हुकूमत और अफगानी फौज को हर जरूरी ताकत फराहम करने के लिए तैयार है.’

पाकिस्तान को लेकर भी मैकमास्टर का रुख सख्ती भरा था. ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को लेकर अब तक जितनी कड़ाई बरती है, उसकी तुलना में मैकमास्टर का रुख कहीं ज्यादा सख्त था. इसका एक अंदाजा मैकमास्टर के साथ आए प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से लगाया जा सकता है.

प्रतिनिधिमंडल में मैकमास्टर ने अपने सहयोगी के तौर पर लीजा कर्टिस को भी रखा था. लीजा कर्टिस ने हाल ही में एक रिसर्च पेपर लिखा है. इसमें कहा गया है कि अमेरिका को अपनी पाकिस्तान-नीति बदलने की जरुरत है, आतंकवाद को शह देने की कोशिशों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराना होगा, सिर्फ जबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलाया जाना चाहिए. इस रिसर्च पर हाल के समय में खूब बहस हुई है.

न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि टोलोन्यूज पर प्रसारित साक्षात्कार में मैकमास्टर ने पाकिस्तान पर अंगुली उठाते हुए कहा कि वह अफगानी तालिबान को फंड भी दे रहा है और सर छुपाने की जगह भी मुहैया करा रहा है. लेकिन उसे अफगानिस्तान के खिलाफ जारी अपना छद्मयुद्ध बंद कर देना चाहिए.

मैकमास्टर ने कहा, 'हम सबने सालों-साल उम्मीद लगाई है. हमने उम्मीद पाली कि पाकिस्तानी हुक्मरानों को समझ आएगी और वे इन जमातों के साथ चुनिंदा तरीके से पेश नहीं आएंगे जैसा कि वे एक वक्त से करते आ रहे हैं और इसी में उनकी भलाई है. अफगानिस्तान और बाकी जगहों पर अपने हितों को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान को कूटनीतिक प्रयासों का सहारा लेना चाहिए न कि उन जमातों का जो हिंसा का सहारा लेते हैं.'

भारत का रुख है कि पाकिस्तान अपनी विदेश-नीति में आतंकवाद का इस्तेमाल करता है और मैकमास्टर की बातें भारत के इस रुख के बहुत करीब हैं. मैकमास्टर के इस्लामाबाद दौरे के बाद अमेरिकी मीडिया में इसी किस्म का बयान आया. इससे कयास लगाए जा सकते हैं कि वाशिंगटन में भारत की बातों को सहानुभूति के साथ सुना जाएगा क्योंकि अब मैकमास्टर वहां मौजूद हैं.

आतंकवाद के हर रूप पर लगाम कसने की जरूरत है

मीडिया में आए बयान की शब्दावली बेशक अमेरिकी दूतावास से जारी की जाने वाली तमाम औपचारिकताओं से भरी है. इसके बावजूद उसका यह संदेश बड़ा स्पष्ट है कि अब अमेरिका पाकिस्तान को कहीं ज्यादा सख्त कसौटियों पर तौलेगा.

बयान में कहा गया है कि मैकमास्टर ने पाकिस्तान के लोकतांत्रिक और आर्थिक विकास की सराहना की और जोर देकर कहा कि आतंकवाद के हर रूप पर लगाम कसने की जरूरत है. बयान के सामने आते ही पाकिस्तान के माथे पर बल पड़ गए.

पाकिस्तानी फौज ने अपने प्रवक्ता मेजर जेनरल आसिफ गफूर का सहारा लिया. आसिफ गफूर ने ट्वीट किया कि ‘पाकिस्तान तो खुद ही राज्य-प्रायोजित आतंकवाद का शिकार है, पाकिस्तान इस आरोप का खंडन करता है कि वह अपनी जमीन से गुपचुप आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है.’

हालांकि अभी ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दिन ही चल रहे हैं लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि मैकमास्टर अमेरिकी विदेश नीति को उसके परंपरागत दायरे के भीतर एक खास मुकाम की तरफ मोड़ रहे हैं. अमेरिका अब पहले की तरह जोखिम उठाने को तैयार नजर आ रहा है.

थोड़े दिनों तक अमेरिका ने रूस के साथ प्यार की पीगें बढ़ाईं लेकिन अब उसकी गाड़ी फिर से पुरानी लकीर पर लौट आई है. अमेरिका फिर से रूस की छाया से भी नफरत करने वाली रीत पर लौट आया है. बसर-अल-असद के सीरिया को अमेरिका ने टॉमहॉक मिसाइल का निशाना बनाया और अफगानिस्तान में उसने ‘मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स’ की चोट मारी.

मैकमास्टर ने यह भी कहा है कि अफगानिस्तान में अमेरिका का मिशन अभी बंद नहीं हुआ, वह जारी है. इन बातों से जाहिर होता है कि ट्रंप प्रशासन में समझ बनी है कि विदेश नीति को रणनीतिक उद्देश्यों से जल्दी-जल्दी बदलना ठीक नहीं. ट्रंप प्रशासन की इस समझ की अनदेखी नहीं की जा सकती.

अगर अमेरिका अब तक एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा की कायम रखने की गारंटी लेता रहा है तो भारत अब भी उम्मीद लगा सकता है कि अमेरिका की यह भूमिका जारी रहेगी. हालांकि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिका अपनी आर्थिक नीति में अनुदार हो रहा है और वैश्विक स्तर पर पहले की तुलना में कुछ अलग-थलग भी पड़ा है. ट्रंप के वक्त में अमेरिका की विदेश नीति में कुछ इस तेजी से बदलाव हो रहे हैं मानो वह खौलता हुआ लावा हो.

अगर अमेरिका एशिया के सुरक्षा-तंत्र में संतुलन बरकरार रखने की अपनी जिम्मेवारी से कन्नी काटता है तो चीन को मौका मिलेगा और चीन इसके लिए तैयार बैठा है. चीन फिलहाल इस गुमान में है कि ज्यादातर एशियाई मुल्क अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए उस (चीन) पर निर्भर हैं और सुरक्षा की जरुरतों के मद्देनजर अमेरिका की तरफ झुकते हैं.

अपनी इसी समझ से चीन ने एशियाई क्षेत्र के लिए एक नई नीतिगत पहल की रूपरेखा तैयार करने में खूब ऊर्जा और वक्त लगाया है. नई नीतिगत पहल की चीन की तैयारी का खाका एक श्वेतपत्र के जरिए सामने आया है.

यह श्वेतपत्र इस साल जनवरी महीने में 'चाइनाज पॉलिसिज ऑन एशिया पैसेफिक सिक्यॉरिटी को-ऑपरेशन' शीर्षक से प्रकाशित हुआ.

ये भी पढ़ें: चीन की दादागीरी: अरुणाचल में 6 जगहों के नाम बदल दिए

चीन के दबदबे को कम करने के लिए भारत को अमेरिका की जरूरत

China-India

टिमोथी हीथ ने द डिप्लोमेट नाम की पत्रिका में लिखा है कि अपनी आर्थिक ताकत के जोर में चीन एशिया में अमेरिका को टक्कर दे रहा है. अमेरिका मानता है कि वह एशियाई क्षेत्र की हिफाजत का गारंटर है और चीन इसी मान्यता को चुनौती दे रहा है.

एशियाई महाद्वीप में सुरक्षा का एक वैकल्पिक ढांचा खड़ा करने के लिए चीन ने तीन चरणों वाली एक रणनीति तैयार की है. इस रणनीति के पहले चरण के अंतर्गत इलाके में अमेरिकी मौजूदगी के तेवर ढीले करने हैं. फिर एशियाई मुल्कों को क्षेत्रीय स्तर पर चीनी नेतृत्व की बातों को मानने के लिए बाध्य किया जाएगा और इसके लिए दंड तथा पुरस्कार का तरीका अपनाया जाएगा.

इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ताकत का समीकरण एक सिरे से बदल जाएगा. फिलहाल आर्थिक, भूराजनीतिक और सैन्य ताकत के मामले में भारत एशिया के सबसे बड़े मुल्क चीन से बहुत पीछे है और ऐसे में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के विस्तार को भारत अपने दम पर नहीं रोक पाएगा. भारत को अमेरिकी सहायता की जरूरत पड़ेगी.

इस जरुरत के लिहाज से भी मैकमास्टर ने बड़े उत्साहजनक संकेत दिए. उन्होंने भारत के अपने पहले ही दौरे में कहा कि रणनीतिक साथी के तौर पर अमेरिका भारत को बेशकीमती मानता है और इलाके में स्थिरता कायम रखने के लिहाज से यह रिश्ता बहुत अहम है. दौरे के वक्त दोनों देशों ने जो बयान जारी किए उससे भी मेलभाव का यही सरोकार झांकता है जबकि मैकमास्टर के इस्लामाबाद दौरे में मेलभाव के संकेत गायब थे.

अमेरिकी दूतावास ने कहा, 'दोनों देशों ने बहुत से द्विपक्षीय और इलाकाई मुद्दों पर चर्चा की, इसमें आतंकवाद रोकने और सुरक्षा बढ़ाने के लिए आपसी सहयोगी की साझी जरूरत पर हुई चर्चा भी शामिल है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मैकमास्टर ने भारत और अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी की अहमियत पर जोर दिया और बैठक को फलप्रद करार देते हुए कहा कि भारत सुरक्षा के मामलों में अमेरिका का बड़ा सहयोगी है.’

भारत और अमेरिका के आपसी सहयोग की चर्चा

भारत की तरफ से जारी बयान में कहा गया: ‘प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ टेलिफोन पर हुई सकारात्मक बातचीत को याद किया. इस बातचीत में दोनों देशों ने रणनीतिक सहयोग की अहमियत पर जोर दिया था, साथ ही कई मामलों में भारत और अमेरिका के आपसी सहयोग की चर्चा हुई थी. दोनों देश इलाके में शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने तथा आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए कैसे कारगर ढंग से काम कर सकते हैं, इस मुद्दे पर भी बैठक में विचारों का आदान-प्रदान हुआ.’

अगर बयान के संकेतार्थों को पकड़ने की कोशिश करें तो साफ नजर आता है कि मैकमास्टर ओबामा प्रशासन के दौरान अपनाई गई संतुलन की रणनीति को जारी रखेंगे. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर मैकमास्टर की नियुक्ति भी अमेरिकी विदेश नीति में जारी निरंतरता का ही संकेत है.

घोर आलोचक भी मानते हैं कि अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा फ्रेमवर्क के भीतर मैकमास्टर को जगह देना ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी उपलब्धि है.

मैकमास्टर लेफ्टिनेंट जनरल रह चुके हैं और उन्हें युद्ध के मैदान का विशाल अनुभव है. उनकी समझ भी बहुत गहरी है और वे खरी-खरी कहने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार समिति से दक्षिणपंथी विचारों के पैरोकार और ट्रंप के सहयोगी स्टीव बैनन को निकाल बाहर करने में जरा भी वक्त नहीं गंवाया.

राष्ट्रपति के रुप में ट्रंप के अबतक के कार्यकाल को देखते हुए मान्यता बनी है कि विदेश नीति के मोर्चे पर किसी स्थायी सोच से काम नहीं हो रहा है बल्कि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं.

सांस्थानिक दायरे से बाहर जाकर सौदे हो रहे हैं और सियासी अदब-कायदे के भीतर रहकर बर्ताव करने की जगह निजी रिश्तों को ज्यादा तरजीह दी जा रही है.

भारत को अपनी अमेरिका-नीति के मामले में फूंक-फूंककर कदम रखना होगा और जरूरत जान पड़े तो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मैकमास्टर पर भारत को ज्यादा ध्यान चाहिए.

एक ऐसे वक्त में जब चीन के साथ हमारे रिश्तों में मिठास की जगह कड़वाहट घुल रही है, मैकमास्टर से उम्मीद बांधना ठीक है. उनकी बुद्धिमत्ता और दूरंदेशी भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है.

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