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अरुणाचल मामले पर चीन से 'बदला' लेने का ये आइडिया कमाल का है!

चीन लंबे समय से नाम रखने और बदलने की रणनीति पर काम करता रहा है

Prakash Nanda Updated On: Apr 24, 2017 04:39 PM IST

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अरुणाचल मामले पर चीन से 'बदला' लेने का ये आइडिया कमाल का है!

दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश के हाल के दौरे को लेकर चीन के तेवर एक बार फिर से आक्रमक दिख रहे हैं. चीन फिर से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से भारत को धमकियां दे रहा है.

ऐसे में मेरे पड़ोसी राजीव चंद्रा, जो एक बिजनेस कंसलटेंट हैं, इसे लेकर काफी नाराज रहते हैं. वो इस बात को लेकर हैरान हैं कि आखिर भारतीय मीडिया में इन धमकियों को इतनी प्रमुखता क्यों दी जाती है. क्योंकि चीन की इन धमकियों का संबंध ‘दक्षिण तिब्बत’ (हमारा अरुणाचल प्रदेश) के छह इलाकों के नाम बदलने से जुड़ा है.

इस पूरी प्रक्रिया में राजीव ने मुझे एक आइडिया सुझाया. जब मैंने फेसबुक पर इस आइडिया को अपने दोस्तों के साथ साझा किया तो मेरे दोस्तों ने इसे बहुत पसंद किया.

नौकरशाहों से लेकर डिप्लोमेट, सेना से जुड़े लोग, सुरक्षा एक्सपर्ट, प्रोफेसर और यहां तक कि सीनियर जर्नलिस्ट जो मेरे मित्र हैं, उन्होंने भी इस आइडिया पर अपनी सहमति जताई.

मेरे इन मित्रों में से एक ने इसे 'नया आइडिया' बताया. एक शीर्ष वैज्ञानिक ने इसे आज तक की सबसे 'रचनात्मक आइडिया' कहा ऐसा जिसके बारे में पहले कभी नहीं सुना'

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चीन से बदला लेने का सुझाव क्या था?

आखिर राजीव का सुझाव क्या था ? राजीव के मुताबिक 'अगर चीन, अरुणाचल प्रदेश के इलाकों का नाम बदलने पर आमादा है, तो इस संबंध में मेरे पास एक शानदार आइडिया है.

हमें शांतिपथ ( डिप्लोमेटिक इन्कलेव के बीचो बीच जो सड़क है) जो दिल्ली में है उसका नाम बदल कर दलाई लामा रोड रख देना चाहिए. इससे चीन की ये मजबूरी होगी कि उसे हर पते पर लिखना होगा – एम्बेसी ऑफ द पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, दलाई लामा रोड, न्यू दिल्ली.'

ये वाकई एक ऐसा सुझाव है जिस पर अमल किया जा सकता है. क्योंकि इससे चीन को मजबूत संदेश जाएगा. फ्रांस के दार्शनिक जैकस देरिदा ने साल 1974 में कहा था 'नाम बदलना भी एक तरह की रणनीति है, जो अपनी ताकत को जाहिर करने का ही एक जरिया होता है.'

पूरी दुनिया में स्थान, सड़क और बिल्डिंग के नाम को बदलने का ट्रेंड बेहद सामान्य है. खास कर ये काम वो करते हैं जिनके पास सत्ता होती है. जिनके पास प्रतिकूल प्रतिक्रिया के बावजूद अपनी राजनीतिक ताकत को अहसास कराने का हिम्मत होता है.

चीन लंबे समय से नाम रखने और बदलने की रणनीति पर काम करता रहा है. चीन ने पेकिंग का नाम बीजिंग तो कैंटन को गुनझाऊ, नैनिंग को नानजिंग, शियान को झियान और टिनशिन को तियानजिन कर दिया. ये सूची बेहद लंबी है.

अरुणाचल प्रदेश का मामला कुछ अलग है. यहां के 6 इलाके जो प्रशासनिक अधिकार के तहत नहीं आते हैं उसका नाम बदला है. इसलिए जमीनी स्तर पर इस बदलाव के कोई खास मायने नहीं हैं.

दरअसल इसका असल मतलब ये है कि चीन कई तरीकों से भारत को मुश्किल में डालने की जुगत में रहता है. यही वजह है कि भारत के साथ विवादित सीमा मामले पर चीन अपने तेवर कड़े करेगा.

भारत-चीन के बीच ऐसे कई मामले हैं जो दोनों देशों के बीच गतिरोध की वजह हैं. मसलन, कई दौर की बातचीत के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा हुआ है.

इसे लेकर चीन अपने तेवर को लगातार कड़े कर रहा है. साल 2005 में चीनी राष्ट्रपति वेन जियाबाओ के भारत दौरे के दौरान जिस समझौते पर सहमति हुई थी उसके तहत कहा गया था कि विवादित सीमा इलाके में जो आबादी बसी हुई है उसे किसी भी हाल में परेशान नहीं किया जाएगा.

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चीन का भारत को घेरने के बहाने

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चीन अब अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध अनुयायियों के पवित्र शहर तवांग पर अपना हक जता रहा है.

दूसरा, चीन लगातार भारत के पड़ोसी मुल्कों (श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान), जिनका सैन्य लिहाज से काफी अहमियत है, वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाकर भारत को घेरने की कोशिश में जुटा हुआ है.

चीन, पाकिस्तान को न्यूक्लियर हथियार और मिसाइल तैयार करवाने में मदद कर रहा है. तो भारत को केंद्रित कर कई हथियार विकसित करने में भी चीन, पाकिस्तान की सहायता कर रहा है.

दुनिया के वो तमाम देश जिनकी अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, उन्हीं देशों की तरह चीन भी भारत में पाकिस्तान की जमीन से प्रायोजित आतंकवाद को लेकर गंभीर नहीं है.

तीसरा, कश्मीर की स्थिति पर सवाल खड़े कर चीन लगातार भारत के अंदरुनी मामले में दखल देने में जुटा हुआ है. किसी कश्मीरी को वीजा जारी करने के दौरान चीन भारतीय पासपोर्ट के साथ एक अलग पेपर शीट को संलग्न करना नहीं भूलता है.

चीन ने भारतीय सेना के एक जनरल को सिर्फ इसलिए वीजा नहीं दिया क्योंकि उन्होंने कश्मीर में नौकरी की थी.

चौथा, भारत ने जिस सहजता से संयुक्त राष्ट्र में चीन की सिर्फ सदस्यता ही नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन किया था. उस भावना का भी चीन ने कभी ख्याल नहीं रखा. जबकि पश्चिमी देशों ने भारत को ये दर्जा सोने की थाल में परोस कर दिया था.

अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन की तरह चीन हमेशा से भारत की स्थायी सदस्यता के आधिकारिक दावे को विरोध करता रहा है. यहां तक कि चीन ने ही न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री का रास्ता रोके हुए है.

पांचवा, भारत के साथ चीन के व्यापारिक रिश्ते जिसका हवाला अक्सर भारत में चीन के मित्र दिया करते हैं, उसकी सच्चाई यही है कि अब तक ये एकतरफा दिखता है. ये व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह से चीन के पक्ष में हैं.

साल 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक बैलेंस ऑफ ट्रेड भारत के पक्ष में नहीं है और करीब 53 बिलियन डॉलर के बराबर है. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ता भी खास उत्साह पैदा करने वाला नहीं है. क्योंकि भारत जहां चीन को बहुमूल्य कच्चा माल खास कर लौह अयस्क निर्यात करता है, तो वहीं चीन तैयार माल भारत में बेचता है.

ये तब है जबकि ये सारा कच्चा माल चीन में प्रचूर मात्रा में मिलता है. चीन इसे स्ट्रैटेजिक रिजर्व के तौर पर सुरक्षित रखता है. यही नहीं व्यापार को लेकर असंतुलन इस वजह से भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि चीन लगातार अपना माल भारत के बाजार में डंप करता जा रहा है.

हालात ये है कि भारतीय बाजारों में चीन में बनी दिवाली के आइटम और भारतीय देवी देवताओं की मूर्तियां भरी हुई हैं. जबकि इसके उलट सूचना एवं प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर से जुड़े भारतीय उत्पाद जो गुणवत्ता की दृष्टि से बेहतर हैं, उसकी चीन में एंट्री पर चीनी अधिकारी कई तरह की अड़चनें पैदा करते हैं.

जबकि सच्चाई यही है कि चीन में इन उत्पादों की कमी है और चीन इसे दूसरे देशों से आयात करता है. ऐसी स्थिति के बावजूद चीन चाहता है कि भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट समझौते पर हस्ताक्षर कर दे.

छठा, चीन के पास 3.51 ट्रिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, और इसकी बदौलत वह दुनिया के तमाम देशों, खासकर विकासशील देशों में निवेश करने में लगा हुआ है.

जबकि भारत में निवेश करने को लेकर वो उत्साहित नहीं दिखता है. 2016 में एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 13 साल में 142 चीनी कंपनियों ने महज 27 बिलियन डॉलर का निवेश भारत में किया.

ये निवेश ऑटोमोटिव पार्टस और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में चीनी कंपनियों ने किया. लेकिन इसी दौरान चीन ने भारत में साफ्टवेयर और आईटी सेक्टर में 12 बिलियन डॉलर का निवेश किया.

दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते

पीएम मोदी और शी जिंगपिंग.

पीएम मोदी और शी जिंगपिंग.

व्यापारिक साझेदारी की इस कड़वी सच्चाई के बाद क्या भारत को डिप्लोमेटिक तर्ज पर चीन के रवैए का विरोध नहीं करना चाहिए?

साल 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत के मामले में भारतीय दावे को थोड़ा कमजोर करने का काम किया. क्योंकि तब 1954 में तिब्बत को लेकर हुई भारत चीन संधि के मुताबिक भारत ने तिब्बत पर चीनी अधिकार के दावे को स्वीकार कर लिया था.

हालांकि आठ सालों तक ही ये जायज था क्योंकि 1962 के बाद भारत को यह बात मानने की बाध्यता नहीं थी कि तिब्बत चीन का हिस्सा है.

साल 1988 में जब राजीव गांधी ने चीन का दौरा किया था तब उनके बयान इस तरह तैयार किया गया जिसका मतलब ये था कि अगर चीन तिब्बत की ऑटोनोमी को चुनौती देगा तो तिब्बत पर भारत भी अपने स्टैंड को बदलने के लिए स्वतंत्र होगा.

तब वाजपेयी ने अपने चीन के दौरे में इस बात को स्वीकार कर लिया कि 'तिब्बत ऑटोनोमस रिजन पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा है'. और तो और जो सबसे अहम बात है वो ये कि पहली बार प्रधानमंत्री स्तर पर इस तरह के दस्तावेज हस्ताक्षर किए गए.

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आखिर चीन के विरोधी रवैयों से भारत कैसे निपटे?

इसी मंच पर मैंने कुछ साल पहले तर्क दिया था कि गांधीवाद इसका सबसे बेहतर कूटनीतिक जरिया बन सकता है और यही तर्क आज मैं फिर दोहराना चाहूंगा.

दरअसल चीन की बढ़ती ताकत उसकी आर्थिक शक्ति है. खास कर चीन की बढ़ती विदेशी मुद्रा कोष और डॉलर का भंडार. जिसे चीन ने दुनिया भर में अपने उत्पादों को बेचकर अर्जित किया है. चीन इसे सस्ते मजदूरों के जरिए अपने देश में उत्पादन करता है.

ऐसे में गांधी जी के बताए रास्ते पर हमें चलना पड़ेगा. ये रास्ता है चीनी उत्पादों का बहिष्कार करना. हमें खुद से यह तय करना होगा कि हम बाजार में उपलब्ध चीनी उत्पादों को नहीं खरीदेंगे. इस कदम का चीनी शासकों पर दमदार असर होगा.

इस कूटनीतिक रास्ते पर कदम बढ़ाने के साथ ही दूसरा कूटनीतिक जरिया है – शांतिपथ का नाम बदलकर दलाई लामा रोड कर देना – जैसा कि मेरे पड़ोसी ने सुझाया था.

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