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चीन की नई चाल, दूसरे देशों को कर्ज के तले दबाकर सुपरपावर बन रहा है ड्रैगन

शी जिनपिंग की आक्रामक रणनीति से चीन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या चीन एक नई साम्राज्यवादी शक्ति बन कर उभर रहा है?

Updated On: Sep 30, 2018 11:26 AM IST

Naghma Sahar Naghma Sahar

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चीन की नई चाल, दूसरे देशों को कर्ज के तले दबाकर सुपरपावर बन रहा है ड्रैगन

मालदीव के चुनाव में चीन को झटका लगा, लेकिन वर्चस्व की जंग भारत और चीन के बीच जारी है. मालदीव में अपने प्रभाव को बढ़ाने के इस युद्ध में अभी फायदा भारत का है लेकिन मालदीव भी चीन के कर्ज के तले जिस तरह दबा है उससे सवाल उठ रहा है कि क्या वो नई सरकार बनने के बाद भी चीन के प्रभाव से बाहर आ पाएगा?

चीन की बेल्ट रोड परियोजना चीन के औपनिवेशिक इरादों का नया हथियार साबित हो रही है. बेल्ट रोड एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना है जिस के जरिए चीन एशिया से लेकर अफ्रीका तक में अपने व्यापार का जाल बिछा रहा है. सुपरपावर बनने की रेस में लगा चीन कुछ ज्यादा ही जल्दी करने लगा है. आजीवन शासन करने का अभयदान ले चुके शी जिनपिंग की चाल समय से पहले ही बहुत सारे छोटे देशों को समझ आ गई. चीन की चाल का पर्दाफाश सबसे पहले श्रीलंका में हुआ.

श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे के शासन में चीन ने हम्बंतोता बंदरगाह बनाने के लिए श्रीलंका को कर्ज दिया जब भारत इसमें हिचक रहा था. वो श्रीलंका को पैसे उसके इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के नाम पर देता गया. हम्बंतोता बंदरगाह बन तो गया लेकिन 2012 में यहां कुल सिर्फ 34 जहाज आए. इससे व्यवसायिक लाभ न मिलने पर चीन का विशालकाय कर्ज श्रीलंका चुका नहीं पाया और नतीजा ये हुआ कि हम्बंतोता और उसके आस-पास की 15 हजार एकड़ जमीन को उसे 99 सालों की लीज़ पर चीन को सौंपनी पड़ी. इस तरह चीन अपने प्रतिद्वंदी भारत के कुछ और करीब के क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बना पाया. श्रीलंका में चीन के खिलाफ सरकार बनने के बाद भी चीन की पकड़ से श्रीलंका बाहर नहीं आ सका.

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श्रीलंका से सीखा सबक

श्रीलंका का तजुर्बा उन बाकी देशों के लिए एक अलार्म की तरह है जिन पर चीन का विशालकाय कर्ज़ है. उन्हें डर है कि वो भी चीन के हाथों अपनी सामरिक संपत्ति खो देंगे और इसी डर से घबराकर वो चीन के साथ अपनी डील या तो रद्द कर रहे हैं, उसका आकर छोटा करने का प्रयास कर रहे हैं या फिर सौदे पर दोबारा बातचीत की कोशिश हो रही है मलेशिया के महातिर मोहम्मद ने पहले मलेशिया में चीन के निवेश के लिए राह बना दी थी लेकिन उनका बीजिंग दौरा 23 बिलियन डॉलर के चीन के प्रोजेक्ट को रद्द करने के साथ खत्म हुआ. बांग्लादेश, तंजानिया और हंगरी जैसे देशों ने भी BRI परियोजनाओं को या रद्द कर दिया है या फिर उनकी संख्या में कटौती कर दी है.

म्यांमार ने इसी डर से अपने कयौक्पू बंदरगाह की कीमत 7.3 बिलियन डॉलर से कम करके 1.3 बिलियन डॉलर कर दिया है. म्यांमार को डर है कि आधारभूत संरचना में निवेश के नाम पर कहीं वो भी चीन के कर्ज़ जाल में न फंस जाए. कमाल ये है कि चीन के सहयोगी देश जैसे पाकिस्तान जहां चीन महात्वकांक्षी चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बना रहा है वो भी अब चीन के कर्ज से सतर्क होने लगा है. पाकिस्तान चीन का सबसे नजदीकी सहयोगी है और लंबे समय से चीन के साथ मिलकर भारत के प्रभाव को सीमित करने में जुटा रहा है. BRI के तहत मिलने वाले पैसे का वो सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है.

फिर भी पाकिस्तान की नई सरकार ने चीन के प्रोजेक्ट्स पर फिर से विचार करने या दोबारा उस पर बातचीत की पेशकश की है, क्योंकि पाकिस्तान में क़र्ज़ का संकट बढ़ता गया है. इमरान खान ने जब वजीर ए आज़म की कुर्सी संभाली तो पाकिस्तान का कुल विदेशी क़र्ज़ कई ट्रिलियन डॉलर में पहुंच गया था.

कंबोडिया पर चीन का उपनिवेश बनने का डर

चीन के कर्ज़ का एक और लाभार्थी कंबोडिया है. वहां भी चीन का उपनिवेश बनने का डर बढ़ा है. चीन की दादागिरी के खिलाफ प्रतिक्रिया बाकी क्षेत्रों में भी हो रही है. प्रशांत महासागर में दुनिया का सबसे छोटा गणतंत्र है नॉरू जहां सिर्फ 11 हजार की आबादी है. हाल ही में दक्षिणी प्रशांत सागर में चीन के अहंकार भरी मौजूदगी को चुनौती देते हुए वहां के नेता ने कहा था कि चीन हमें नहीं बता सकता हमें क्या करना है.

ये संकेत है कि चीन की सुपरपावर की रेस को सिर्फ अमेरिका ही चुनौती नहीं दे रहा, ये दुनिया के कई छोटे देशों से आ रही हैं जो चीन का उपनिवेश बनने को तैयार नहीं.

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जहां तक व्यापार की बात है ट्रंप का चीन के खिलाफ ट्रेड वॉर सुर्खियां बटोर रहा है लेकिन ये बता दें कि चीन की आलोचना में ट्रंप अकेले नहीं हैं. चीन कई देशों का सबसे बड़ा व्यापार पार्टनर है और इसी व्यापार को हथियार बनाकर चीन ने उन देशों को सजा भी दी है जो उसकी मर्जी के खिलाफ जाते हैं, कभी उन देशों के आयात पर प्रतिबंध लगाकर, कभी किसी खास वास्तु का निर्यात रोककर. विदेशी कारोबार को स्थानीय चीनियों द्वारा बायकाट करवाकर या फिर उनके विरुद्ध प्रदर्शन कर के. चीन ने अपने एक बाघी एक्टिविस्ट को नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किए जाने पर नॉर्वे से चीनी बाज़ार में आने वाले सीफूड, खास तौर पर सामन के आयत पर रोक लगा दी, नतीजा ये हुआ कि नॉर्वे को इस से भारी नुकसान उठाना पड़ा. फिर बातचीत के बाद चीन ने इस प्रतिबंध को हटाया और कारोबार फिर से शुरू हो पाया.

चीन के इरादों की दुनिया को भनक

सच ये है कि चीन अपनी वर्तमान स्थिति तक कई अंतराष्ट्रीय कारोबार के नियम तोड़कर पहुंचा है, लेकिन अब पलटवार का वक़्त आ गया है. कई देश अब चीन के सामान पर एंटी डंपिंग कर लगा रहे हैं. साथ ही जब से देशों को ये डर हो गया है कि चीन उन्हें कर्ज़ जाल में फंसा आ रहा है, तब से चीन के BRI के लिए भी राह मुश्किल होती जा रही है.

नतीजा ये हुआ कि सर्वशक्तिमान शी जिनपिंग को अब अपनी खास परियोजना बेल्ट रोड पहल का बचाव भी करना पड़ रहा है और घरेलू आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है. हालांकि आजीवन शासन करने का लाइसेंस हासिल कर चुके शी की आलोचना बहुत ही दबे स्वर में ही संभव है फिर भी ये चर्चा है कि शी जिनपिंग ने अपनी वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं को, ग्लोबल लीडर बनने के सपनो को बहुत जल्दी दुनिया के सामने ला दिया.

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नतीजा ये हुआ कि अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया भर से चीन के खिलाफ प्रतिक्रिया आने लगी. ऐसा करके शी जिनपिंग पूर्व चीनी शासक डेंग शिओपिंग की उस बात को भूल गए जो अब तक चीन का चरित्र रहा.. 'अपनी ताकत को छुपाओ, सही समय का इंतजार करो'. लेकिन इस राह पर चलने के बजाय शी जिनपिंग ने खुलकर एक बेहद आक्रामक रणनीति अपनाई जिस से अब कई देश चीन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या चीन एक नई साम्राज्यवादी शक्ति बनकर उभर रहा है?

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