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क्या मीडिया के सामने आकर SC जजों ने न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है?

सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी विधायिका और कार्यपालिका यानी सरकारों के गलत कदमों से संविधान को बचाने की है

Raghav Pandey Updated On: Jan 19, 2018 12:59 PM IST

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क्या मीडिया के सामने आकर SC जजों ने न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है?

सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच हुए विवाद के बाद पूरा देश और खास तौर से कानून के जानकार दो हिस्सों में बंटे हुए हैं. कुछ लोगों का मानना है कि मीडिया से बात करने वाले 4 जजों को प्रेस कांफ्रेंस नहीं करनी चाहिए थी. इसके बजाय उन्हें पर्दे के पीछे रहकर ही विवाद को सुलझाना चाहिए था. वहीं कुछ लोगों की राय ये है कि जब ये 4 जज सुप्रीम कोर्ट में कुछ गड़बड़ी होते देख रहे थे, तो उनके पास इसे उजागर करने के सिवा कोई और चारा नहीं था.

मेरा खुद यही मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे सीनियर जजों में से 4 के प्रेस कांफ्रेंस करने के पीछे मजबूत कारण रहे होंगे. किसी छोटी बात पर उन्होंने जजों का 'कोड ऑफ कनडक्ट' नहीं तोड़ा होगा.

डी. राजा और चेलमेश्वर से मुलाकात

लेकिन, जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद की घटनाएं विचलित करने वाली हैं. प्रेस कांफ्रेंस के कुछ देर बाद ही सीपीआई के नेता डी. राजा, प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जजों में से एक जे चेलमेश्वर से मिले. मीडिया ने डी. राजा के चेलमेश्वर के घर से निकलते हुए तस्वीरें दिखाईं. बाद में राजा ने सफाई दी कि उन्होंने जस्टिस चेलमेश्वर को फोन करके प्रेस कांफ्रेंस की बाबत पूछा था, तो जज चेलमेश्वर ने उन्हें खुद ही घर आने को कहा था.

इससे भी बढ़कर परेशान करने वाली बात तब हुई जब गुरुवार को जस्टिस चेलमेश्वर ने एक मीडिया हाउस से बात की. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के विवाद को सुलझाने की कोशिशें जारी हैं.

इन बागी जजों के बरक्स, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने पूरे विवाद पर बहुत संयमित बर्ताव दिखाया है. उन्होंने प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्रा से मिलने से इनकार करके मिश्रा को अपने दरवाजे से बैरंग लौटा दिया. जस्टिस मिश्रा ने केस का बंटवारा ठीक तरीके से किया या गलत तरीके से, ये बाद की बात है. मगर, इस पूरे विवाद में चीफ जस्टिस का रवैया बहुत शानदार रहा है. उन्होंने ठीक वैसा ही व्यवहार किया, जैसा किसी जज से उम्मीद की जाती है.

कोड ऑफ एथिक्स का उल्लंघन

1997 में सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के लिए 'कोड ऑफ एथिक्स' तय किए थे. इन्हें The Restatement of Values of Judicial Life के नाम से जाना जाता है. इस कोड के 16 प्वाइंट के जरिए ये बताया गया है कि भारत के न्यायिक अधिकारियों को सार्वजनिक जीवन में कैसा बर्ताव करना चाहिए. इनमें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज शामिल हैं.

इस कोड का नौवां बिंदु कहता है कि किसी भी जज को मीडिया को इंटरव्यू नहीं देना चाहिए, 'किसी भी जज को खुद बोलने के बजाय अपने फैसलों के जरिए अपनी बात सामने रखनी चाहिए. उसे मीडिया को इंटरव्यू नहीं देना चाहिए'. इसी कोड ऑफ इथिक्स का प्वाइंट 6 कहता है कि, 'एक जज को समाज से थोड़ी दूरी बनाकर रखनी चाहिए, ताकि उसके पद की मर्यादा बनी रहे'.

सुप्रीम कोर्ट ने जजों के बर्ताव के लिए ये कोड इसीलिए बनाए हैं ताकि न्यायपालिका की निष्पक्षता और ईमानदारी के प्रति लोगों का सम्मान बना रहे. किसी जज को मीडिया को इंटरव्यू इसलिए नहीं देना चाहिए ताकि उसके फैसलों का मीडिया ट्रायल न हो.

सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी विधायिका और कार्यपालिका यानी सरकारों के गलत कदमों से संविधान को बचाने की है. ऐसे में संविधान के संरक्षकों यानी माननीय जजों का बर्ताव ऐसा होना चाहिए, जो दूसरों के लिए मिसाल बने. साथ ही उन्हें समाज के बाकी तबकों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. जजों की समाज से दूरी इसलिए जरूरी है ताकि किसी भी याचिकाकर्ता से उनकी निजी जान-पहचान न हो.

जजों का अलग रहना जरूरी

डी. राजा ने मीडिया को बताया कि वो जस्टिस चेलमेश्वर को निजी तौर पर जानते हैं. यही वजह है कि उन्होंने जस्टिस चेलमेश्वर से फोन पर बात की थी. किसी नेता का जज से मिलना और उनको जानना सरासर गलत बात है. क्योंकि नेता सरकारी मशीनरी का हिस्सा होते हैं. और सरकार या कार्यपालिका, देश में सबसे ज्यादा मुकदमे लड़ती है. अक्सर न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका के बर्ताव पर रोक लगानी पड़ती है, ताकि संविधान और लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सके.

मौजूदा हालात में हम सुप्रीम कोर्ट के जजों के बाकी लोगों से दूरी बनाने के नियम का पालन करते हुए नहीं देख रहे हैं. यहां ये भी जरूरी था कि सुप्रीम कोर्ट के जज और नेताओं के बीच निजी संबंध न हों. इससे संविधान की रक्षा की न्यायपालिका की बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में मुश्किल आ सकती है. हम इसी बात को आगे बढ़ाएं और ये सोचें कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज टीवी चैनलों पर प्राइमटाइम डिबेट में शामिल हो रहे हैं. जजों को पता होना चाहिए कि मीडिया से बात करके वो अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी करेंगे. फिर उन्हें इस बात के लिए तैयार होना चाहिए कि उनके हर फैसले पर सवाल उठेंगे. उनकी नीयत और इरादे सवालों के कठघरे में होंगे. फिर उनका फैसला न्यायिक हो, प्रशासनिक या फिर कोई निजी काम.

हमें लगता है कि जज इस बात के लिए तैयार नहीं होंगे. देश का कोई भी समझदार नागरिक ये नहीं चाहेगा कि हमारे देश की न्यायपालिका इस दिशा में आगे बढ़े.

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