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माओवादियों और सरकार के टकराव से माहौल खराब

छत्तीसगढ़ भारत का वह हिस्सा है जहां पर क्या चल रहा है इससे बाकी देश को तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता है.

Updated On: Nov 17, 2016 09:20 AM IST

T S Sudhir

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माओवादियों और सरकार के टकराव से माहौल खराब

सलवा जुडूम मुर्दाबाद. बस्तर संघर्ष समिति जिंदाबाद

बस्तर संघर्ष समिति मुर्दाबाद. सामाजिक एकता मंच जिंदाबाद

सामाजिक एकता मंच मुर्दाबाद. अग्नि (एक्शन ग्रुप फॉर नेशनल इंटीग्रिटी) जिंदाबाद

हम विलियम शेक्सपीयर के मशहूर कथन में छत्तीसगढ़ के हिसाब से बदलाव करें तो यह होगा कि अगर किसी माओवाद विरोधी समूह का नाम बदल भी जाय तब भी वह माओवाद विरोधी समूह ही होगा. उपर जिन चार समूहों का जिक्र किया गया है इन चारों समूहों को वर्दी वाले लोगों यानी पुलिस का संरक्षण मिला हुआ है. यह ऐसा मुखौटा है जो दर्शाता है कि नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) चाहती हैं कि बस्तर माओवाद मुक्त हो. इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन नागरिकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करके लगातार हिंसात्मक कार्रवाईयों को अंजाम दिया जा रहा है.

आधिकारिक भाषा में इसे मिशन 2016 कहा जा रहा है. इसका मकसद दक्षिणी छत्तीसगढ़ में स्थित बस्तर को इस साल दिसंबर तक माओवादियों से मुक्त कर देना है. जमीनी हकीकत यह है कि जैसे—जैसे वक्त बीत रहा है आदिवासियों पर दबाव डाला जा रहा है कि वह बस्तर के गांवों से नक्सलियों को बाहर करें. इसके अलावा उन सभी पत्रकारों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर भी निशाना साधा जा रहा है जो नक्सल के साथ लड़ाई में सुरक्षा बलों द्वारा अपनाये जा रहे इस गैरसंवैधानिक तरीके के विरोध में खड़े थे.

पिछले कुछ दिनों में दक्षिणी छत्तीसगढ़ में तीन अलग—अलग तरह की बातें सामने आई. यह भारत का वह हिस्सा है जहां पर क्या चल रहा है इससे बाकी देश को तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता है जब तक सुरक्षाबल या माओवादी एक दूसरे को बड़ी संख्या में मार नहीं देते हैं.

आंख के बदले आंख का कानून अंधा बना देगा

हाल में माओवादी हिंसकों और उनके समर्थकों के खिलाफ नवनिर्मित समूह अग्नि ने 'ललकार' नाम की एक रैली का आयोजन किया था. इस दौरान आयोजक यह तथ्य छिपा पाने में असमर्थ रहे कि अग्नि सामाजिक एकता मंच का ही नया अवतार है. पुराना माओवाद विरोध नए बोतल में पेश किया गया है. इसका माई—बाप सीआरपीएफ और पुलिस है. इसका रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथों में होगा.

दूसरी बात वरिष्ठ माकपा नेता मनीष कुंजम को लेकर है. कुंजम ने 2012 में नक्सलियों द्वारा अपहृत सुकमा जिले के डीएम एलेक्स पॉल मेमन की रिहाई को लेकर माओवादियों के साथ होने वाले बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. हिंदू देवी को लेकर की गई उनकी एक आपत्तिजनक फेसबुक टिप्पणी को लेकर जनता में आक्रोश फैल गया. यह देखते हुए कि कुंजम माओवादी विचारधारा से सहानुभूति रखते हैं, उनके विरोधियों ने इस टिप्पणी को उनके खिलाफ खूब इस्तेमाल किया.

तीसरी बात दांतेवाड़ा के पत्रकार प्रभात सिंह से गायब होने की थी. हालांकि प्रभात अब दांतेवाड़ा से बाहर निकलने में सफल हो गए हैं. उनके दोस्तों के मुताबिक उन्हें गिरफ्तार कर लिए जाने का डर था. अब सुरक्षित रहने के लिए वह कानूनी राय की तलाश में हैं. प्रभात को इस साल की शुरुआत में व्हाट्सएप समूह में एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने पर गिरफ्तार किया जा चुका है. फिलहाल अभी वह जमानत पर बाहर हैं.

छत्तीसगढ़ में सरकार और माओवादियों के बीच आंख के बदले आंख की भावना से सिर्फ घृणा का माहौल बन रहा है. संयुक्त आंध्र प्रदेश ने 2005—06 में माओवादियों को अपने राज्य से बाहर निकालने के लिए अभियान चलाया था. इसके बाद माओवादियों ने गोदावरी नदी की दूसरी तरफ पनाह लिया. पिछले एक दशक से माओवाद समर्थकों का दावा है कि दक्षिणी छत्तीसगढ़ का 70 प्रतिशत हिस्सा उनके कब्जे में है.

नक्सल विरोध आंदोलन को हवा

वास्तव में जब आप आंध्र प्रदेश से छत्तीसगढ़ में आते हैं तो कोंटा से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 30 की शुरुआत होती है लेकिन यह सिर्फ नाम का राजमार्ग है. वैसे यह यह राजमार्ग धूल, अत्यधिक गरीबी और सरकार की उपेक्षा का प्रमाण है. जैसे ही आप इस राजमार्ग के पांच किमी अंदर जाएंगे आपको माओवादी सरकार के निशान दिख जाएंगे. छत्तीसगढ़ सरकार इस बात को स्वीकार करती है. सरकार के मुताबिक कोंटा के करीब 15 ग्राम पंचायतों में माओवादियों का कब्जा है. बहुत सारे अन्य गांवों में आप कड़ी सुरक्षा के बीच ही जा सकते हैं. पुलिस के अनुसार दक्षिणी छत्तीसगढ़ के सात जिलों में करीब 5000 सशस्त्र माओवादी हैं और करीब 20 हजार समर्थक हैं जो उनके लिए आंख—कान का काम करते हैं.

नक्सलियों ने हर दस गांव के लिए क्षेत्रीय राजनीतिक परिषदों का गठन किया है. इसमें हर गांव के 14 से ज्यादा प्रतिनिधि होते हैं जो देसी हथियारों से लैस होते हैं. इन सबके चलते यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ छेड़ा गया सबसे लंबे समय तक चलने वाला युद्ध है. इस युद्ध के खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं. सुरक्षा बलों के लिए यह थकाने वाला है और वह चाहते हैं कि यह जल्द खत्म हो. अत्यधिक आलोचना के कारण जब सामाजिक एकता मंच को बंद किया गया उसके बाद छत्तीसगढ़ में राष्ट्रद्रोही बनाम राष्ट्रप्रेमी की बहस पर विराम लगा था. अब फिर से सरकार ने ‘अग्नि’ नाम से अभियान की शुरुआत की है. बहुत संभावना है कि इससे छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद विरोधी आंदोलन को फिर से हवा मिल सकती है. हो सकता है कि अब फिर उपनाम दिए जाने का सिलसिला शुरू हो जाए. और बस्तर की जमीन पर आगे भी युद्ध चलता रहेगा.

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